कब्रों के झगड़े में दफ़न हो गईं पुश्तें

  • 2 फरवरी 2013
सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट कई बार दोनों पक्षों से बीच का रास्ता निकालने को कह चुका है लेकिन कोई प्रभाव पड़ा है.

बनारस के दोषीपुरा में एक मैदान का मुकदमा जब पहली बार उठा था तब लॉर्ड लिटन भारत के गवर्नर जनरल थे और रदरफोर्ड हेस अमरीका के उन्नीसवें राष्ट्रपति और राईट बंधुओं का बचकाना हवाईजहाज़ 25 साल दूर था.

आज अमरीका में बराक ओबामा 44 वें राष्ट्रपति हैं और भारत में 15 गवर्नर जनरलों के बाद प्रणब मुख़र्जी 13 वें राष्ट्रपति है और आदमी के चाँद की छाती पर चढ़ने की बात अब बहुत पुरानी हो गई है.

सब बदल गया. लेकिन दोषीपुरा का मुकदमा चल रहा है.

ज़फर इमाम के पिता, दादा, परदादा, लक्कड़दादा और उनके भी पिता इस मुक़दमे को लड़ चुके हैं वो कहते हैं "ज़रुरत पड़ी तो अभी और लड़ेंगे." इमाम शिया है.

दूसरी तरफ खलीलउर्रहमान है उनकी उम्र 80 साल है वो कहते हैं "हम लड़ना नहीं चाहते लेकिन कोई आ कर मारे तो क्या करें."

मुकदमा

बनारस के दोषीपुरा में 2 एकड़ जमीन के लेकर शिया और सुन्नी के बीच विवाद अपने आप में भारत के सबसे पुराने मामलों में से एक है. ये केस 1878 में शुरू हुआ और अब तक इसका कोई सर्वमान्य हल नहीं निकल सका है.

ज़मीन के मूल मालिक थे महाराजा बनारस. शिया और सुन्नी दोनों इस पर अपना हक़ जताते हैं.

शिया कहते हैं कि महाराजा बनारस ने उन्हें धार्मिक कामों को संपन्न करने के लिए दान में दिया था. सुन्नियों का कहना है कि ये उनका पुराना कब्रिस्तान है लिहाजा शियाओं को इसपर किसी भी तरह के धार्मिक आयोजनों को करने का अधिकार नहीं हैं.

सुन्नी समुदाय के लोगों ने इस भूखंड पर उन्हीं के समुदाय के दो लोगों की कच्ची कब्रें होने का दावा भी किया. हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों कब्रों के सही होने की बात को खारिज कर दिया.

मुकदमा दसियों अदालतों में चला सुलह सफाई की हर कोशिश नाकाम हुई. भारत की आज़ादी के पहले और उसके बाद भी यह चलता रहा. ज़्यादातर अदालतों में शिया सही माने गए सुन्नी गलत.

साल 1976 में सुन्नी इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट चले गए. तीन नवंबर 1981 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाया और एक बार फिर सुन्नी हार गए .

सुप्रीम कोर्ट ने बनारस के प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश दिए कि वो बाउंडी वॉल बनवाएं और मैदान में मौजूद दो कब्रों को हटवाए. तत्कालीन यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि कब्रों को हटाने की कोशिश करने से कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है. तब से लेकर अब इस मुद्दे पर कोई कार्रवाई नहीं हुई .

तारीखें आगे बढ़ती गईं. अब जाकर एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार से पूछा है कि आखिर क्यों देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले को 32 सालों तक लटका कर रखा गया. साथ ही अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को आपसी बातचीत से सुलझा लेने की राय भी दी है.

अब भी नहीं राज़ी

खलीलउर्र रहमान
खलीलउर्र रहमान की उम्र 80 बरस है और झगड़े के लिए शियाओं को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

शियाओं की तरफ से मुकदमा लड़ने वाले ज़फर इमाम कहते हैं कि हर तरफ जब सुन्नी हारे हैं तो अदालत के कहे अनुसार उनको ज़मीन का कब्ज़ा दिलाया जाए.

सुन्नी कहते हैं कि हमारी कब्रें हट नहीं सकतीं. शिया कहते हैं कि मुग़ल बादशाह शाहजहाँ अपनी बेगम मुमताज़ महल को पहले बुरहानपुर में दफनाया बाद में ताज महल में. जब उनकी कब्र हट सकती हैं तो यह कब्रें क्यों नहीं.

सुन्नी खलीलउर्र रहमान कहते हैं, "अदालतों ने शुरू से इस मामले में गुस्से से काम लिया है. हम तैयार हैं कि इस भूखंड पर शिया और सुन्नी दोनों अपने अपने धार्मिक काम करें".

जबकि शिया जफर इमाम कहते हैं, "देश की सर्वोच्च अदालत का भी सम्मान यहां नहीं हो रहा है. हम किसी भी कीमत पर सुन्नियों को इस भूखंड पर धार्मिक काम की इजाजत नहीं देंगे. दरअसल हम सूक्ष्म अल्पसंख्यक है और यहाँ लाखों सुन्नी हैं इसलिए हमारी कोई सुनता नहीं लेकिन हमें अदालत पर यकीन है."

यानी झगडा चला आ रहा है.