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नाबालिग की माँ ने कहा, "...तो कड़ी सज़ा मिले"

 सोमवार, 28 जनवरी, 2013 को 20:49 IST तक के समाचार

अभियुक्त की मां का कहना है कि दिल्ली जाने से पहले उनका बेटा बेहद मासूम था

बदायूं से लगभग 50 किलोमीटर दूर एक गांव में एक छप्पर वाले कच्चे घर के बाहर भीड़ लगी है.

सभी गांव वाले दूर से एक महिला पर नज़रें गड़ाए बैठे हैं जो बीमारी के चलते बिस्तर से उठ नहीं पा रही है.

इस महिला के तीन बच्चे असहाय चेहरा लिए उनके पास बैठे हैं. उनका सबसे छोटा बेटा अपनी मां के कांपते हुए हाथों को थाम लेता है और दूसरा बेटे की आंखों से आंसू थम नहीं रहे हैं.

उनकी 15 वर्षीय बेटी बताती है कि जब से मां ने अपने सबसे बड़े बेटे के बारे में खबर सुनी है, उनकी हालत ऐसी ही है.

दरअसल इस दुखी माँ का सबसे बड़ा बेटा दिल्ली गैंगरेप मामले में छठा अभियुक्त है जिसे किशोर न्याय बोर्ड ने नाबालिग क़रार दिया है.

उसके कुल छह बच्चे हैं. एक बेटी की उम्र 16 बरस से अधिक है और वो काम करने बाहर गई हुई है. सबसे छोटा बेटा दो साल का है और वो हमारे आसपास फटक ही नहीं रहा है.

मजबूरी

"उसके दिल्ली जाने से पहले जब आखिरी बार हमारी बात हुई, तो उसने मुझसे कहा कि मैं अपना ख्याल रखूं और फिर वो बस पकड़ कर शहर के लिए रवाना हो गया. वहां जाने के बाद दो-तीन साल तक उसने अपनी कमाई का पैसा हमें भेजा, लेकिन उसके बाद उसका कोई पता नहीं मिला. मुझे लगा कि मेरा बेटा अब ज़िंदा ही नहीं बचा होगा"

नाबालिग अभियुक्त की मां

घर में दो कमरे हैं. एक कमरे में बिस्तर के नाम पर एक चारपाई है. दूसरे कमरे में एक भैंस बंधी हुई है. वो दूध नहीं देती लेकिन इस उम्मीद में रखा गया है कि वो जल्द ही दूध देना शुरू करेगी.

इस बेचारी माँ के पति की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है और उनकी दो जवान बेटियों को कभी-कभी मजदूरी का काम मिल जाता है जिसकी बदौलत घर में कभी-कभी चूल्हा जल जाता है.

अपने परिवार को ग़रीबी के इस चक्रव्यूह से निकालने की उम्मीद में उसने सबसे बड़े बेटे को 11 साल की उम्र में दिल्ली भेजा था.

लेकिन अब वे ये भी भूल चुकी हैं कि उनका बेटा दिखता कैसा है. उसे ये भी याद नहीं कि कितने वर्ष पहले वो दिल्ली गया था. याद करने पर ज़ोर दीजिए तो कहती है, छह-सात साल हो गए होंगे.

वो बताती है, “उसके दिल्ली जाने से पहले जब आखिरी बार हमारी बात हुई, तो उसने मुझसे कहा कि मैं अपना ख्याल रखूं और फिर वो बस पकड़ कर शहर के लिए रवाना हो गया. वहां जाने के बाद दो-तीन साल तक उसने अपनी कमाई का पैसा हमें भेजा, लेकिन उसके बाद उसका कोई पता नहीं मिला. मुझे लगा कि मेरा बेटा अब ज़िंदा ही नहीं बचा होगा.”

लेकिन पिछले महीने जब दिल्ली पुलिस उनके घर पूछताछ करने आई तो आबिदा को उनकी बात पर यक़ीन नहीं हुआ.

ग़ुस्सा

छठे अभियुक्त का परिवार बेहद गरीब परिस्थिति में बदायूँ के एक गांव में रहता है

वो कहती है, “पुलिस ने मुझे बताया कि मेरे बेटे ने किसी लड़की के साथ कुछ कांड किया है. मुझे सुनकर ग़ुस्सा आया, लेकिन साथ ही दिल भी टूटा. मेरा बेटा बहुत ही सहमा हुआ सा बच्चा था. गांव में कभी उसने किसी से बहस तक नहीं की. मुझे यक़ीन है कि दिल्ली जाकर वो किसी बुरी संगत में पड़ गया होगा, जिसके प्रभाव में आकर उसने ये सब किया होगा.”

ज़ोर-ज़ोर से सिर हिलाते हुए आबिदा कहती हैं कि भले ही गांव में रोज़गार न हो, लेकिन वे अपने बाक़ी दो बेटों को कभी शहर नहीं भेजेंगी.

वो याद करती है कि दिल्ली जाने के बाद उसका बेटा छोटे-मोटे काम कर वो अपना गुज़ारा करता था.

दिल्ली पुलिस के आरोप पत्र में छह अभियुक्तों में से उसके इसी बेटे को सबसे ज़्यादा बर्बर बताया गया है.

इस घटना के बाद दिल्ली की सड़कों पर जबर्दस्त आक्रोश देखने को मिला था और जनता ने मांग की थी कि पांच अभियुक्तों के साथ-साथ नाबालिग अभियुक्त को भी कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए.

नाबालिग अभियुक्त की मां के पास अपने बेटे की सही उम्र साबित करने के लिए कोई सबूत तो नहीं है, लेकिन वो कहती है कि अगर उसने ये जुर्म किया है तो उसे कड़ी सज़ा होनी चाहिए.

“हमारे घर में भी दो बेटियां हैं. अगर मेरे बेटे ने किसी लड़की के साथ ऐसा किया है तो उसे सज़ा होनी चाहिए. पता नहीं मैं उसे माफ कर सकती हूं या नहीं, लेकिन उसकी वजह से हमारी बहुत बदनामी हुई है. मुझे अब यही चिंता खाए जा रही है कि मेरी बेटियों से ब्याह कौन करेगा?”

चिंता

जब उनसे पूछा कि उनका बेटा नाबालिग है तो कम सज़ा काटकर गांव वापस आ जाएगा, तो ग़ुस्से से उन्होंने कहा, "इतनी बदनामी के बाद गांव वाले उसे यहां कदम भी नहीं रखने देंगे."

हालांकि गांव वालों को अभी इस बात का पता नहीं है कि मामला है क्या, लेकिन मीडिया और पुलिस के वहां आने से उन्हें शक है कि कुछ गड़बड़ ज़रूर है.

बहरहाल, माँ की तबीयत फिर से बिगड़ने लगी है और उनके बच्चे बेसब्री से गांव के इकलौते डॉक्टर के आने का इंतज़ार कर रहे हैं.

डॉक्टर हर शाम चार बजे गांव में आता है और जिस घर में उनकी ज़रूरत होती है, वहां इलाज के लिए पहुंच जाता है.

वहाँ बैठी उसकी बेटी कहती है, “बीते दिन पड़ोसी ने डॉक्टर की 30 रुपए की फीस उधार के तौर पर हमें दे दी थी, लेकिन आज शायद बड़ी बहन को 50 रुपए की मज़दूरी मिली होगी, जिससे डॉक्टर की फीस का जुगाड़ हो जाएगा.”

फिलहाल उन्हें अपने भाई से ज़्यादा इस बात की चिंता है कि आज घर में चूल्हा जल पाएगा या नहीं?

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