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आशीष नंदी के बयान पर सोशल मीडिया में हलचल

 रविवार, 27 जनवरी, 2013 को 00:09 IST तक के समाचार
आशीष नंदी

बीबीसी हिन्दी के फेसबुक पेज पर आशीष नंदी के बयान से जुड़ी पोस्ट पर सैकड़ों प्रतिक्रियाएं आई हैं

जयपुर में चल रहे साहित्य महोत्सव में समाज वैज्ञानिक आशीष नंदी के विवादित बयान पर जहां दिन भर मीडिया में चर्चा चलती रही, वहीं सोशल मीडिया भी इससे अछूता नहीं रहा.

बीबीसी हिन्दी के फेसबुक पेज पर आशीष नंदी के बयान से जुड़ी पोस्ट पर कई प्रतिक्रियाएं आई हैं जिनमें कुछ तो उनके बयान का समर्थन करते हैं और कुछ बेहद तल्खी के साथ विरोध कर रहे हैं.

फेसबुक पर विजय कुमार मलिक लिखते हैं, “सही बात बोलने पर बवाल कोई नई बात नहीं है, ये आज की राजनीति की परम्परा सी हो गई है.”

वहीं राजेंद्र कुमार पांडेय की प्रतिक्रिया है, “हमारे देश में ब्राह्मण और दूसरे सवर्णों को गाली देने पर ताली मिलती है और संवैधानिक अधिकारों के तहत अपने विचार व्यक्त करने वाले की गिरफ्तारी की मांग की जाती है.”

जबकि अंजलि वर्मा की टिप्पणी है, “सच तो ये है कि कितने शर्म की बात है कि भ्रष्टाचार जैसे राष्ट्रीय मुद्दे को भी जाति के आधार पर जोड़ा जा रहा है जो कि बहुत ही भयावह है. हम कभी नहीं सुधर सकते, इससे तो कम से कम यही साबित होता है.”

एक अन्य पाठक भारत भूषण के विचार कुछ अलग तरह के हैं. वो लिखते हैं, “इस वर्ग के लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाकर चपरासी भी नहीं बना सकते एवं सरकारी अस्पताल में इलाज कराकर कौन मरना चाहेगा, तो भला वो ऊपरी आमदनी का जुगाड़ क्यों न करे?"

वो कहते हैं, "एक चीज और. कुछ लोगों की अकूत सम्पत्ति देश के सभी शहरों में है क्योंकि इनके पुरखे गुलाम भारत में भी सत्ता के करीब थे, तो फिर गरीबी में पले-बढ़े लोग यदि मौका मिलने पर थोड़ा गलत कर लेते हैं तो पकड़ाते भी है, जबकि अकूत सम्पदा वालों का ये पुश्तैनी धंधा है और वर्तमान परिवेश में वे ईमानदार माने जाते हैं.”

योगेश चौधरी टिप्पणी करते हैं, “ये हम सब जानते हैं कि क्या सही है और क्या गलत. ये इंडिया है, यहां जिसका जो मन कर रहा है, बोले जा रहा है. मेरे हिसाब से तो हम लोगों को इस मसले पर बहस करने की बजाय अपने मकसद पर ध्यान देना चाहिए. समाज में शिक्षा और जागरूकता जितनी बढ़ेगी, देश को उतना ही फायदा होगा.”

शंकर मेघवाल कहते हैं, “ये बयान गलत है, बेईमानों की कोई जाति नहीं होती.”

तो चंद्रेश खरे लिखते हैं, “यदि हिदुओं को एकजुट करना है तो आरक्षण की राजनीति बंद करनी पड़ेगी और यदि देश को एकजुट करना है तो अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की राजनीति छोड़कर सबको अपनाना पड़ेगा, क्योंकि बहुसंख्यक और ऊँची जाति के बच्चे भी गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी से बेहाल हैं आज के भारत में.”

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