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अपने पराए से दूर है भारत-पाक साहित्यकार

 शनिवार, 26 जनवरी, 2013 को 01:15 IST तक के समाचार
जयपुर महोत्सव

जयपुर साहित्य महोत्सव में भारत पाकिस्तान के साहित्यकार हिस्सा ले रहै हैं

भारत पाक में दरकते रिश्तो की छाया जयपुर साहित्य उत्सव पर भी पड़ी है.

मगर विरोध की आवाजो को दरकिनार कर पाकिस्तान के साहित्यकार इस उत्सव में बड़े उत्साह के साथ शिरकत कर रहे है.

लेकिन इस बार भारत ने पाकिस्तानी राजनयिकों को इस समारोह में भाग लेने की इजाजत नहीं दी.

भरत और पाकिस्तान दोनों मुल्को के साहित्यकारों ने इस उत्सव को संबधो का सेतु बताया है. लेखको की बिरादरी दोनों देशों के बीच तनाव के लिए राजनीति को दोष देती है.

हांलाकि जब कुछ लोगो ने पाकिस्तानी लेखको का विरोध करने की धमकी दी तो थोड़ी देर के लिए तनाव पैदा हो गया था.

अमन की ख़ातिर

कराची से जयपुर पहुंची अमीना सैयद ने जयपुर उत्सव में भागीदारी की और कहा “दोनों देशों का जनता दोस्ती चाहते है,मगर कोई है जो इस रास्ते में दरार पैदा करना चाहता है.”

कराची में ऑक्सफ़ोर्ड प्रेस की प्रबंध निदेशक अमीना खुद कराची में ऐसे ही अदब के मेले से जुडी रही है.

वो कहती हैं कि शुरू में तो थोडा डर लगा.मगर यहाँ आने के बाद जैसा स्वागत सत्कार हुआ ,उससे वो अभिभूत हैं.

"दोनों देशों का जनता दोस्ती चाहते है,मगर कोई है जो इस रास्ते में दरार पैदा करना चाहता है.दरअसल लेखको और साहित्यकारो से रानीतिज्ञ डरते है ,यकीनन लेखको की आजाद सोच होती है जो राजनीतिज्ञ पसंद नहीं करते, इसीलिए ऐसे कार्यक्रमों में रूकावट पैदा की जाती है"

अमीना सैयद

अमीना उर्दू अदब की मशहूर हस्ती कुर्तुल ऍन हैदर की भांजी है.

अमीना को विरोध प्रदर्शन की खबर तब मिली जब वो पाकिस्तान से अमृतसर पहुंची.

अमीना कहती है दरअसल लेखको और साहित्यकारो से रानीतिज्ञ डरते है ,यकीनन लेखको की आजाद सोच होती है जो राजनीतिज्ञ पसंद नहीं करते, इसीलिए ऐसे कार्यक्रमों में रूकावट पैदा की जाती है.

डर जैसी चीज नही

पाकिस्तान की फहमिदा रियाज ने पाकिस्तान में फौजी हुकूमत का कोप भी देखा है और कई साल भारत में निर्वासन में भी गुजारे है.

वो बेफिक्री के साथ कहती है –“अरे हमें नहीं डर नहीं लगता .क्या हो जायेगा .मुझे काहे का डर ,इतनी लम्बी जिन्दगी बीत गई है .वैसे भी हमने अपनी शर्तो से जीवन जिया है.इस तरह के आयोजन से अवाम न सही मगर बुद्धिजीवी वर्ग को तो करीब ला रहे है न.”

पाकिस्तान से आये एक साहित्यकार एम ऐ फारूकी कहते है ऐसे सम्मेलनों से परायेपन का भाव दूर होता है.''जब मिलते नहीं तो एक अजनबीपंन महसूस होता है ,मिलने से एक दुसरे को सुनने में समझने में मदद मिलती है, जब मिलेगे तभी तो पहचान बढ़ेगी”

भारत पाक राजीनीति

इसी तरह भारत के लेखक अनिल खन्ना कहते है ये सियासत है जो मेल मिलाप पसंद नहीं करती. दरसल टीवी ,सिनेमा और लेखन- साहित्य बड़ा प्रभावी माध्यम है.ये सब समाज पर प्रभाव रखते है.लिहाजा सियासत इन्हें अपने काबू में रखना चाहती है.ये हकीकत है हिन्द ओ पाक में बहुत कुच्छ साझा है ,साझा धरोहर है ,संस्कृति है ,ऐसे आयोजन में लोग करीब आते है.पर कई बार राजनीति इसे पसंद नहीं करती .

पिछले कुछ सालो में बाते हुई ,मुलाकाते हुई. सरहद पर सन्देशे आने जाने लगे और संगीनों का साया कम हुआ.अब फिजा में तनाव है.

लेकिन कोई इसे समय का फेर बताता है कोई सियासत का.

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