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मौत की सज़ा के सब ख़िलाफ़: जस्टिस वर्मा

 गुरुवार, 24 जनवरी, 2013 को 05:19 IST तक के समाचार
महिलाओं की सुरक्षा की मांग

महिलाओं की सुरक्षा पर तीखी बहस छिड़ी है

बलात्कार संबंधी कानून में बदलाव के बारे में हमने जो सुझाव पेश किए हैं, मैं उन्हें लेकर आशावादी हूं और सरकार को उन्हें लागू करना चाहिए.

आशावादी हूं इसीलिए मैंने ये जिम्मेदारी ली.

आगे अब सिविल सोसायटी और मीडिया का काम है कि वो दबाव कायम रखे ताकि सरकार इस पर अमल करे.

दुनिया भर में लोग अगर महिलाओं की सुरक्षा और उनके ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों से निपटने के कानूनों में दिलचस्पी रखते है तो उम्मीद यही करनी चाहिए कि भारत में भले ही कोई भी सरकार में हो, उसकी भी इसमें दिलचस्पी होगी.

बलात्कार का आरोप चाहे पुलिस वाले पर हो, मंत्रालय से जुड़े व्यक्ति पर हो या आम आदमी पर हो, सब को मुकदमे का सामना करना चाहिए.

भारत में कई बार सशस्त्र बल विशेषाधिकार प्राप्त सुरक्षा बलों पर आरोप लगते हैं कि वो इस कानून का उल्लंघन करते हैं और महिलाओं का बलात्कार किया जाता है. हमने यही कहा है कि अगर कोई ऐसा करता है तो फिर उसे सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून के तहत संरक्षण क्यों मिलना चाहिए.

कोई भी ऐसा सरकारी काम नहीं है जहां बलात्कार की अनुमति हो या ये उसका हिस्सा हो.

बलात्कार जो भी करता है तो उसके खिलाफ मुकदमे की अनुमति लेने की जरूरत क्यों पड़नी चाहिए.

मौत की सज़ा क्यों नहीं?

"आंकड़े बताते हैं कि मौत की सजा से जुर्म कम नहीं हुए हैं. इसलिए हमने आजीवन कारावास की सजा की सिफारिश की है. "

जस्टिस जेएस वर्मा

जहां तक ऐसे मामलों में मौत की सज़ा की बात है तो सभी महिला संगठनों का कहना है कि मौत की सज़ा कोई समाधान नहीं है.

इसलिए हमने उम्रकैद की सिफारिश की है. यहां उम्रकैद का मतलब होगा कि गुहनगार को आजीवन जेल में रखा जाए.

दुनिया भर में मौत की सज़ा के खिलाफ आवाज उठाई जा रही है, उसे कैसे अनदेखा किया जा सकता है.

ज्यादातर देशों में मांग उठ रही है कि मौत की सज़ा को खत्म किया जाना चाहिए, तो हम एक नया जुर्म तैयार करके उसमें इसका प्रावधान कैसे कर दें.

आंकड़े बताते हैं कि मौत की सज़ा से जुर्म कम नहीं हुए हैं. इसलिए हमने आजीवन कारावास की सज़ा की सिफारिश की है.

हमने बहुत सारे लोगों की बातें सुनी. लगभग 70 हजार लोगों ने अपनी राय भेजी. 20-30 साल से काम कर रहे महिला संगठनों की बात भी हमने सुनी.

सार्वजनिक सुनवाई में भी 100-150 लोगों की बातें सुनी गई और सभी का कहना था कि मौत की सज़ा नहीं होनी चाहिए.

(बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत पर आधारित)

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