क्या राहुल कथनी को करनी में बदलेंगे?

  • 22 जनवरी 2013
चिंतन बैठक के बाद भावुक भाषण देते हुए राहुल गांधी.

कांग्रेस के चिंतन बैठक में राहुल गांधी की पदोन्नति और उनके भाषण ने निश्चित तौर पर पार्टी को नई उर्जा और मजबूती से भर दिया होगा.

एक शर्मीले और यदा कदा बोलने वाले नेता, जो संसद में भी बहुत कम मौकों पर बोलते हैं, जिन्होंने आज तक शायद ही किसी मीडिया को पूरा साक्षात्कार दिया है, उसने पार्टी ने नया पद दिए जाने के बाद बहुत ही दिल छूने वाला भाषण दिया.

यह पदोन्नति और चर्चा में मौजूद भाषण ठीक उस वक्त में आया है जब पार्टी बुरे दौर से गुजर रही है.

महत्वपूर्ण राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी को ख़ास कामयाबी हासिल नहीं हुई है और केंद्र में उसकी सरकार भ्रष्टाचार और कुछ न करने के आरोपों के दबाव में है.

गुजरात विधानसभा चुनाव में जिस तरह से हिंदूवादी राष्ट्रवादी नेता नरेंद्र मोदी को चौथी बार जीत हासिल हुई है उससे उनकी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर दावेदारी लगभग तय सी हो गई है.

सर्वेक्षणों के मुताबिक़ काफी बड़ी संख्या में लोग राहुल गांधी की तुलना में नरेंद्र मोदी को पसंद करते हैं.

हालांकि इन सबके बावजूद राहुल गांधी प्रशंसा के पात्र हैं. जैसा कि एक भारतीय अंग्रेजी दैनिक दि हिंदू ने लिखा भी है, ‘मुश्किल समय पर मुश्किल रास्ते का चयन’

'भारत का दुर्भाग्य'

राहुल गांधी अपने भाषण में कहते हैं, “आपके पास कितना ज्ञान है, अगर आपके पास पद नहीं है तो आप कुछ नहीं हैं और यही भारत का दुर्भाग्य है. फर्क पड़ता है कि आप किस पद पर हैं.”

कुछ लोग कुलीनवाद, वर्गभेद और भाई-भतीजावाद जैसी बातों से असहमत हों, लेकिन भारत के विकास में ये बातें कहीं ना कहीं आड़े आती हैं और राजनीति इससे इतर नहीं है.

भारतीय राजनीति जहां अधिकांश नेता बड़ी उम्र के है 42 साल के राहुल गांधी युवा ही माने जाएंगे. राहुल देश के युवाओं और राजनीति के बीच बनी गहरी खाई का भी जिक्र करते हैं.

राहुल की चिंता इस बात को लेकर भी दिखी कि भारतीय राजनीति में उपजे अहंकारी वर्ग की वजह से युवा राजनीति से घृणा करते हैं. उनका कहना है कि ये वर्गभेद भारत की समस्याओं की ज़द में है.

विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी को दिया गया नया पद और भाषण ने कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं को उस वक्त में नई ऊर्जा दी है, जब पार्टी इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों और 2014 के चुनाव में बिना किसी बाधा के जीत दर्ज करना चाहती है.

लेकिन एक अहम सवाल है कि क्या वो पार्टी को बदल पाएंगे जिस पार्टी में राजवंश और चापलूसी का बोलबाला है? राहुल के पिता राजीव गांधी ने भी 1985 में इसी तरह के भाषण में बदलाव की बात की थी, लेकिन बदलाव नज़र नहीं आया.

विश्लेषकों ने इस बात पर भी जोर दिया है कि क्या राहुल गांधी भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के मसले पर अपने विचार व्यक्त करेंगे जिसका भारत की जनता लंबे समय से इंतज़ार कर रही है.

क्या राहुल गांधी आर्थिक व्यवस्था को स्थिर कर पाने में सफल होंगे और क्या वो माओवादियों के बढ़ते प्रकोप को खत्म कर पाएंगे? ऐसे कई मसले हैं जिसपर भारत की जनता राहुल का जवाब जानना चाहती है.

राहुल गांधी कहते हैं कि वो पार्टी को प्रजातांत्रिक बनाना चाहते हैं और लोगों को मजबूत. विश्लेषक मानते हैं कि इसकी शुरुआत उन्हें खुद की पार्टी से करनी होगी.

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