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क्या हैं राहुल गांधी की पाँच चुनौतियाँ?

 सोमवार, 21 जनवरी, 2013 को 15:44 IST तक के समाचार
राहुल गाँधी

अगर सत्ता ज़हर है, जैसा कि राहुल गाँधी ने जयपुर में हुए चिंतन शिविर में कहा, तो आने वाले एक साल में उन्हें इस ज़हर को साधने के उपाय खोजने होंगे. उन्हें ये दिखाना पड़ेगा कि वो इस ज़हर को पियेंगे ज़रूर पर विषपायी नीलकंठ की तरह गले से नीचे नहीं उतरने देंगे.

पर राजनीति में डगमगाते क़दम बढ़ा रहे गाँधी-नेहरू परिवार के इस उत्तराधिकारी के लिए ये आसान नहीं होगा.

ख़ुद राहुल गाँधी के ही मुताबिक़ सत्ता के इस ज़हर के प्रति उन्हें उनकी माताजी सोनिया गाँधी ने आगाह किया और ऐसा करते हुए वो रो पड़ीं.

राहुल के इस बयान से चिंतन शिविर में मौजूद कई काँग्रेसी नेताओं की आँखें भीग गईं. पर आख़िर अपनी माताजी के रो पड़ने की घटना उजागर करके राहुल गाँधी कहना क्या चाहते थे?

दरअसल, सत्ता के बारे में उनका ये बयान सीधे-सीधे उस शहरी और युवा मध्यवर्ग के लिए था जो सत्ता का राजनीति से उकता चुके हैं. ये वो शहरी मध्यमवर्ग है जो दिल्ली गैंगरेप के बाद राजपथ पर उतर आया था. राहुल गाँधी ने सत्ता को ज़हर बता कर इस उग्र-युवा पीढ़ी को बताने की कोशिश की है कि सत्ता के केंद्र में रहने के बावजूद वो असल में उनके साथ खड़े हैं.

ये सन 2014 में होने वाले चुनावों की तैयारी है. राहुल गाँधी और काँग्रेस के मैनेजरों को मालूम है कि खुदरा व्यापार में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सीधा पैसा लगाने की छूट देने या स्पेशल इकॉनॉमिक ज़ोन बनाने की नीतियों से चुनाव नहीं जीता जाता. भारत में चुनाव अब भी ग़रीब-समर्थक छवि से जीता जाएगा. आइए देखते हैं कि काँग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष के तौर पर राहुल गाँधी के सामने कौन कौन सी सात चुनौतियाँ हैं.

1- नरेंद्र मोदी के बढ़ते क़दम

राहुल गाँधी

राहुल गाँधी के सामने आने वाले दिनों में कई चुनौतियाँ पेश आएँगी.

जिस तरह गुजरात में तीसरी बार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा चुनाव जीता है उससे दिल्ली के तख़्त पर मोदी का दावा और मज़बूत हुआ है. विश्लेषक मानते हैं कि अब अगला आम चुनाव राहुल गाँधी और नरेंद्र मोदी के बीच लड़ा जाएगा.

मोदी की चुनौती से निपटने के लिए राहुल गाँधी के पार्टी मैनेजर ‘धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील’ पार्टियों के महा-गठबंधन के बारे में गंभीरता से सोच रहे हैं.

इसमें वामपंथी पार्टियों की भूमिका के बारे में भी सोचा जा रहा है. काँग्रेस पार्टी का एक पक्ष मानता है कि वामपंथी पार्टियों के साथ किसी न किसी स्तर पर राजनीतिक समझदारी बनानी होगी, चाहे प्रकट में कोई गठबंधन बने या न बने.

2- ग़रीबों और दलितों का सवाल

बढ़ती महँगाई, पेट्रोल और डीज़ल के दामों में हुई बढ़ोत्तरी और विदेशी कंपनियों को खुदरा व्यापार के लिए सीधे निवेश करने की छूट आदि कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनके कारण मनमोहन सिंह सरकार को बड़े उद्योगपतियों के पक्षधर के तौर पर देखा जाता है. जयपुर की चिंतन बैठक में शामिल कुछ काँग्रेसी बुद्धिजीवियों के मुताबिक अगले एक साल में इस छवि को बदलने की कोशिश होगी और सीधे सीधे संदेश दिया जाएगा कि मनमोहन सिंह, पी चिदंबरम और मोंटेक सिंह आहलूवालिया की नीतियाँ दरअसल खारिज कर दी गई हैं. इस सिलसिले में कुछ ठोस क़दम उठाए जा सकते हैं.

i- शिल्पकारों को महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोज़गार योजना में शामिल करना.

ii- मनरेगा को शहरी बेरोज़गारों तक पहुँचाना.

iii- रोज़गार के अधिकार को मूलभूत संवैधानिक अधिकारों में शामिल करना.

iv- नक्सलवाद प्रभावित इलाक़ों में आदिवासियों की सहकारी संस्थाएँ खोलना और स्थानीय ठेके इन्हीं सरकारी संस्थाओं को देना.

3- हिंदी क्षेत्र में काँग्रेस की जड़ें जमाना

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले राहुल गाँधी ने दलितों के घरों में जाकर खाना खाना और वहीं रात काटने से लेकर अपनी ज़मीन के लिए लड़ रहे भट्टा-पारसौल के किसानों के साथ एकजुटता ज़ाहिर की.

लेकिन उनकी कड़ी मेहनत के बावजूद काँग्रेस को कोई खास चुनावी फ़ायदा नहीं हुआ. उत्तर प्रदेश में लेकिन अगर काँग्रेस को अगला चुनाव जीतना है तो उत्तर प्रदेश में उसे कम से कम 20 सीटें और बिहार में दस का आँकड़ा छूना होगा.

इसलिए ये देखना बहुत महत्वपूर्ण होगा कि काँग्रेस समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से कैसा चुनावी रिश्ता बनाने में कामयाब होगी.

4- शहरी नौजवान पर निगाह

दिल्ली में हुए गैंगरेप और इसकी शिकार छात्रा की मृत्यु को बाद जिस तरह से 18 से लेकर 24 साल की उम्र के क्रोधित नौजवान और नवयुवतियों ने इंडिया गेट पर उग्र प्रदर्शन किए, उससे काँग्रेस की नींद हराम हो गई.

काँग्रेस के चिंतन शिविर में इस मुद्दे पर गहराई से विचार विमर्श किया गया. इसमें शामिल सूत्रों के मुताबिक ये महसूस किया गया कि पढ़ा लिखा शहरी नौजवान राजनीति से उचाट होने लगा है और उसमें ग़ुस्सा है.

उसे लगता है कि सत्ता को कुछ नेताओं ने अपनी जागीरदारी समझ लिया है. इसके लिए राहुल गाँधी उनके खिलाफ़ नहीं बल्कि उनके साथ खड़े होते दिखना चाहते हैं. तभी ‘सत्ता के ज़हर’ वाला बयान सामने आया.

5- नया नेता, नया नारा

काँग्रेस को अगले चुनाव में उतारने के लिए काँग्रेसी नेताओं को एक नए नारे की तलाश है.

शर्त है कि ये नया नारा पहले के नारों से अलग हो और राहुल गाँधी को लान्च करने वाला हो. इंदिरा गाँधी का नाम ग़रीबी हटाओ से जुड़ा था, राजीव गाँधी ने भारत को 21वीं शताब्दी में ले जाने की बात कही थी.

सोनिया गाँधी ने काँग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ कहा था और अब राहुल गाँधी का लक्ष्य है नई पीढ़ी. ऐसी पीढ़ी जो उग्र है, महत्वाकांक्षी है और जिसने दबना नहीं सीखा.

इस नए नारे के लिए कांग्रेस के भीतर मंथन जारी है.

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