लखनऊ में बिजली की फ़िजूलखर्ची

  • 17 जनवरी 2013

बिजली की कमी से एक ओर गाँवों में खेती और कारखानों को जरूरत भर की बिजली नहीं मिल पा रही है, दूसरी ओर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सरकारी इमारतों में बिजली की खपत लगातार बढ़ती जा रही है.

राज्य सचिवालय के शास्त्री भवन में हर महीने करीब साढ़े तीन लाख यूनिट बिजली की खपत होती है.

शास्त्री भवन में मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, औद्योगिक उत्पादन आयुक्त और प्रमुख सचिव गृह जैसे महत्वपूर्ण अधिकारियों के कार्यालय हैं.

पास में सचिवालय की दूसरी इमारत बापू भवन में हर महीने करीब पौने दो लाख यूनिट बिजली खर्च होती है. इसमें भी कई मंत्रियों और बड़े अफसरों के दफ्तर हैं.

भारत सरकार के ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी की ओर से कराए गए एक अध्ययन से पता चला है कि अगर इन इमारतों में सही उपकरण लगाए जाए तो करोड़ों रुपयों की बिजली बचाई जा सकती है.

भारत में बिजली के दस तथ्य

इस अध्ययन के बाद राज्य सरकार ने दोनों इमारतों की रौशनी और कूलिंग की व्यवस्था में सुधार किया है.

इस सुधार से सचिवालय की केवल इन दो इमारतों शास्त्री भवन और बापू भवन में बिजली के बिल में हर महीने नौ लाख रूपये की बचत हो रही है.

उत्तर प्रदेश पॉवर कॉर्पोरेशन के प्रबंध निदेशक एपी मिश्र का कहना है, ''एक तो अब बिजली की बचत करने वाले एनर्जी एफिशिएंट उपकरण लगाए जा रहे हैं. दूसरे पहले जो ज्यादा बिजली खपत वाले ट्यूब-लाइट्स और बल्ब लगे थे, उनके स्थान पर सीएफएल लाइट लगाई गई हैं. एयर कंडीशनिंग के जो नए उपकरण लगे, वो बिजली की बचत करने वाले लगे हैं. उससे यह फायदा हुआ कि बिजली की खपत अपने आप काम हो गई.''

बिजली बचत

उत्तर प्रदेश में एक महीने में करीब बीस करोड़ यूनिट बिजली खर्च होती है.

उत्तर प्रदेश पॉवर कॉर्पोरेशन के प्रबंध निदेशक एपी मिश्र का अनुमान है कि यह स्कीम अगर पूरे उत्तर प्रदेश में लागू की जाए तो कम से कम पांच फीसदी बिजली बचत हो सकती है.

बिजली बोर्ड के अधिकारियों का कहना है कि अकेले लखनऊ में 18 ऐसी सरकारी इमारतों की सूची बनाई गई है, जिनमें बिजली की खपत बहुत अधिक है.

इनमें बिजली बोर्ड का मुख्यालय शक्ति भवन, जवाहर भवन, इंदिरा भवन, वीवीआईपी गेस्ट हाउस, सिविल अस्पताल और लखनऊ विकास प्राधिकरण के कार्यालय आदि शामिल हैं.

जानकारों का कहना है इनमें से कई सरकारी इमारतों में सेन्ट्रल एयर कंडीशनिंग व्यवस्था होने के बावजूद अधिकारियों ने अलग से भी दो-दो, तीन-तीन एयर कंडीशनर लगवा रखे हैं.

उनका कहना है कि खिड़कियों को पूरी तरह पर्दे से ढक दिया जाता है जिससे दिन में प्राकृतिक रौशनी उपलब्ध होने के बावजूद अंदर बल्ब या ट्यूब लाइट जलानी पड़ती हैं.

बिजली बोर्ड के अधिकारियों का कहना है कि बाजारों और गैर-सरकारी इमारतों में भी बिजली की खपत बहुत बढ़ गई है.

लखनऊ में बिजली कटौती नहीं लागू है, इसलिए यहाँ खपत और भी बढ़ती जा रही है.

ग्रामीण इलाकों में करीब दस लाख ट्यूब वेल्स हैं. बिजली बोर्ड अधिकारियों का कहना है कि इनमें भी बिजली की खपत कम करने की काफी गुंजाइश है.

अधिकारियों का कहना है कि विशेषकर जहां मीटर नहीं लगे हैं और हर महीने बिजली के लिए एक निर्धारित भुगतान करना होता है, वहाँ लोग बिजली का गैर जरूरी इस्तेमाल करते हैं. ऐसी जगह लोग धड़ल्ले से हीटर का इस्तेमाल करते हैं.

संसद ने करीब-करीब एक दशक पहले ऊर्जा संरक्षण अधिनियम पारित किया था. भारत सरकार ने इस अधिनियम के तहत ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी का गठन किया.

लेकिन जब सरकारें अपने कार्यालयों में ही बिजली की बचत के प्रति गंभीर नही हैं, तो वह निजी क्षेत्र पर कैसे अंकुश लगाएंगी.

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