कुंभ में क्यों जुटते हैं कल्पवासी?

 मंगलवार, 15 जनवरी, 2013 को 07:00 IST तक के समाचार
कल्पवासी

चंद्रकला अकेली कल्पवासी नहीं हैं, उनके जैसे कई लोग कल्पवास के लिए आते हैं

कुंभ मेले में संगम की चकाचौंध, पुलिसिया तामझाम और मीडिया के कैंपों से दूर कुछ साधारण कैंप भी लगे हैं जो सही मायने में कुंभ की आत्मा कहे जा सकते हैं.

ये न तो नागा साधु हैं, न ही किसी अखाड़े से जुड़े हैं, न ही बड़े नेता हैं और न ही इनके पास कोई चमक-दमक हैं. ये कल्पवासी हैं जो अगले लगभग दो महीनों तक हर रोज़ संगम में स्नान करके पुण्य कमाने आए हैं.

चंद्रकला देवी की उम्र कितनी है, उन्हें भी नहीं पता. वे कहती हैं, ''ये मेरा पांचवां कुंभ है. साल 1954 के कुंभ में भी थी जब भगदड़ हुई थी, इसी पुल के नीचे बहुत लोग मरे थे.''

चंद्रकला इलाहाबाद की हैं और हर कुंभ में वो महीनों कल्पवास के लिए संगम पर आती हैं. लेकिन आखिर क्या रखा है संगम पर?

चंद्रकला कहती हैं, ''संगम पर हर दिन नहाना संभव नहीं है घर से. ये कुंभ का समय है तो कल्पवास होता है. कल्पवास यानी हम एक बार खाएंगे. हर दिन गंगा में नहाएंगे. संयमित जीवन जिएंगे और भगवान से प्रार्थना करेंगे कि मरने के बाद कष्ट न हो.''

सेवा और शुद्धि का संगम

"पहले जो संन्यासी होते थे, वो चुपचाप आते थे. कहीं मड़ैया बनाई और बैठ गए. तब लोग जाते थे. अब तो बैंड बाजा़ में ज्यादा खर्च-वर्च है. दिखावा बहुत हो गया है. बाबाजी लोग गाड़ी और पैसा दिखाते हैं."

चंद्रकला, कल्पवासी

चंद्रकला अकेली कल्पवासी नहीं हैं. उनके जैसे हज़ारों लोग कल्पवास के लिए आते हैं.

बालकृष्ण अग्रवाल का तो पूरा परिवार ही तंबू में रह रहा है. वो बताते हैं कि मामला सिर्फ सेवा का है और अपनी शुद्धि का.

वह कहते हैं कि पूरे दो महीने वो मेला स्थान में रहते हैं और कोशिश करते हैं कि लोगों की मदद कर सकें.

पंडा राजकुमार शर्मा लोगों की कल्पवास में मदद करते हैं. वे कहते हैं, ''जो कल्पवास है एकदम मूल वो तो 26 जनवरी यानी पूर्णिमा से शुरु होगा लेकिन कई लोग मकर संक्रांति के स्नान के मद्देनज़र यहां आते हैं.''

वे कहते हैं, ''ये कायाकल्प की एक प्रक्रिया है. अगला जन्म बेहतर करने की कोशिश होती है. आध्यात्म की तरफ मुड़ने का एक तरीका है. इसके ज़रिए आदमी अपनी शुद्धि करता है. संयम बरतता है कुछ महीने.''

मामला श्रद्धा का

कल्पवासियों के तम्बू

कल्पवासियों के तंबुओं में कोई चमक दमक नहीं और न ही कोई तामझाम

बनारस से आई एक महिला अपना नाम बताते शर्माती हैं. लेकिन कल्पवास के बारे में कहती हैं, ''श्रद्धा का मामला है. मुक्ति मिल जाए यही इच्छा है. हमारी पोती भी है. हम चार साल से कर रहे हैं और आठ साल करेंगे. तभी मुक्ति मिलेगी.''

कल्पवासियों के लिए मेले का बहुत कौतुक नहीं है. चंद्रकला तो मेले की बढ़ती चकाचौंध से नाराज़ भी दिखती हैं.

वो कहती हैं, ''पहले जो संन्यासी होते थे, वो चुपचाप आते थे. कहीं मड़ैया बनाई और बैठ गए. तब लोग जाते थे. अब तो बैंड बाजा़ में ज्यादा खर्च-वर्च है. दिखावा बहुत हो गया है. बाबाजी लोग गाड़ी और पैसा दिखाते हैं.''

क्या वो किसी बाबा के दर्शन करने जाती हैं?

इस सवाल पर चंद्रकला कहती हैं, ''बिल्कुल नहीं. ये सब बाबाजी लोग दिखावे वाले हैं. जो असली बाबा हैं वो तो गंगा जी हैं. संगम है और हम उसी को मानते हैं.''

इन कल्पवासियों के तंबू छोटे, कोई चमक दमक नहीं और न ही कोई तामझाम, तभी शायद मीडिया इन्हें छोड़ नगा साधुओं और संगम की बाकी चीज़ों पर ध्यान देता है.

लेकिन अगर गौर से देखें तो संगम में स्नान कर मोक्ष प्राप्ति का जो मूल उद्देश्य है, उसके लिए यही कल्पवासी सही रास्ता अपना रहे हैं.

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