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अल्लाह की मर्जी है कि भगवान राम हमें रोटी दें..

 रविवार, 13 जनवरी, 2013 को 10:18 IST तक के समाचार

नवाब मुसलमान हैं लेकिन वर्षों से राम के नाम की चादर बना रहे हैं.

इलाहाबाद से करीब तीस किलोमीटर पहले लखनऊ रोड पर एक कस्बा है लाल गोपाल गंज. यहाँ पर एक मोहल्ला है अहलादगंज. इस मोहल्ले की अपनी अलग पहचान है. आस्था के नाम पर यहां धर्मों का बंटवारा नहीं होता.

अहलादगंज गाँव की आबादी कोई बहुत ज्यादा नही है. इस गाँव के करीब 30 से 35 परिवार ऐसे हैं, जो हिंदुओं के राम नामी दुपट्टे और चुनरी बनाने का काम करते हैं.

मगर राम नामी दुपट्टे बनाने वाले ये परिवार कोई साधारण हिंदू परिवार नही हैं बल्कि ये मुस्लिम परिवार है.

अपनी आस्था और विश्वास से अलग ये हिंदुओं की आस्था के लिए काम करते हैं.

आस्था का नाम 'राम'

" अल्लाह की मर्ज़ी यही है कि उन्हें भगवान राम रोटी दें"

नवाब

ऐसा भी नही है कि ये परिवार अचानक ही हिंदुओं के धार्मिक अनुष्ठानों, रीति रिवाजों और संस्कारों में काम आने वाले सामान बनाने लगे हों, बल्कि वो इस काम को सालों से अंजाम देते आ रहे हैं.

अहलादगंज में एक छोटी सी मस्जिद है और उसके पीछे की खाली जगह का इस्तेमाल फरिया, चुनरी सुखाने मे किया जाता है. ये चुनरी, वही चुनरी है जो कि नारियल के साथ मंदिरों में पूजा के लिए चढ़ाई जाती है.

मस्जिद के सामने सूख रही है देवी नाम की चादरें

यूँ तो यहाँ साल भर ये काम होता रहता है, लेकिन कुंभ के चलते इस काम में खासी बढ़ोत्तरी हो गई है.

इसी गाँव में चुनरी रंग रहे वसीम कहते हैं कि मज़हब का पेट से कोई वास्ता नही होता. पेट को तो रोटी चाहिए चाहे वो कोई भी मज़हब उसे दे. किसी के आगे हाथ फैलाने से अच्छा है कि राम के आगे हाथ फैला लो.

नवाब और उनका परिवार पिछले कई सालों से इस काम को करते आ रहे है.

भगवा रंग के बने बनाए दुपट्टे पर राम नाम छापते हुए उनके हाथ बड़ी तेज़ी से चलते हैं.

पेट भरना बड़ी बात

"मज़हब का पेट से कोई वास्ता नही होता. पेट को तो रोटी चाहिए, चाहे वो किसी भी मज़हब सेमिले. किसी के आगे हाथ फैलाने से अच्छा है कि राम के आगे हाथ फैला लो"

वसीम,राम नाम की चुनरी बनाने वाले

नवाब कहते हैं कि वो और उनके परिवार की सभी महिलाएं 20 सालों से इस काम को करते आ रहे हैं. क्योंकि इसके अलावा उनके पास कोई काम नही है.

ये पूछे जाने पर कि ये तो हिंदुओं का सामान है, नवाब कहते हैं कि काम तो काम है, चाहे जैसा भी हो, पेट के लिए करना ही पड़ेगा.

नवाब आगे कहते हैं, “अल्लाह की मर्ज़ी यही है कि उन्हें भगवान राम रोटी दें.”

इस गाँव में काम करने वाले छोटे छोटे बच्चे भी ये जानते हैं कि वो किसके लिए काम कर रहे हैं और उन्हें इस बात से कोई फर्क भी नही पड़ता कि ये काम हिंदुओं का है या फिर मुसलमान का.

वो हिंदू जो बाज़ार से खरीद कर धार्मिक अनुष्ठानों में इनका इस्तेमाल करते हैं, उन्हें भी इस बात का कभी पता ही नही चल सकता कि इन्हें किन हाथों ने बनाया है.

और अगर पता चल भी जाए तो शायद उन्हें भी कोई फर्क न पड़े.

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