इस बार कुंभ में मिलेगा विशेष पुण्य

  • 13 जनवरी 2013
इस महाकुम्भ की शुरुआत चौदह जनवरी से हो रही है

कड़ाके की सर्दी में सदी के दूसरे पूर्ण कुंभ में शामिल होने के लिए संगम की रेत पर एक लघु भारत उभर आया है.

संतों का कहना है कि गंगा नदी ने इस बार प्रयाग पश्चिम वाहिनी होकर पूर्ण कुंभ के लिए एक अनोखा संयोग बनाया है.

इस बार कुंभ मेला चौदह जनवरी, मकर संक्रांति से शुरू होकर पचपन दिनों यानि शिवरात्रि दस मार्च तक चलेगा , जिसमे सात- आठ करोड लोगों के आने का अनुमान है.

मकर संक्रांति से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण जाते हैं, इसलिए हिंदू संस्कृति में इस दिन का विशेष महत्त्व है.

हिमालय के गंगोत्री ग्लेशियर से उतरी गंगा ने प्रयाग में प्रवेश के बाद सीधे पूरब जाने के बजाय वापस पश्चिम की ओर रुख करके किलाघाट के पास यमुना को गले लगाया है.

यमुना से मिलने से पहले संगम पर गंगा की दो धाराएँ हो जाने से बीच में रेत का टापू उभर आया है. इससे पहले से अधिक श्रद्धालु एक साथ संगम पर स्नान करके अपने कल्याण और मोक्ष की प्रार्थना कर सकेंगे.

नगा साधुओं के जूना अखाड़े के संत हरि गिरि ने एक बातचीत में कहा “हमेशा गंगा जाती हैं हिमालय से सागर की ओर. लेकिन इस बार गंगा ने समुद्र की बजाय हिमालय की तरफ प्रस्थान करने का मूड बनाया है. इसलिए गंगा स्नान का विशेष फल मिल रहा है. कई सदियों बाद यह अवसर आता है.”

कुंभ योग

ज्योतिष के विद्वान पंडित राम नरेश त्रिपाठी का कहना है कि पश्चिम वाहिनी गंगा का महत्व महाभारत और पद्मपुराण में भी बताया गया है. इस बार गंगा ने थोड़ा आगे बढकर यमुना को गले लगाया है और फिर बनारस की ओर गयी हैं.

प्रयाग में बारह साल बाद इस महाकुम्भ शुरुआत चौदह जनवरी मकर संक्रांति से हो रही है. मकर संक्रांति से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण जाते हैं, इसलिए हिंदू संस्कृति में इस दिन का विशेष महत्त्व है.

कुंभ मेले प्रयाग, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में बारी- बारी से बारह साल बाद आयोजित होते हैं.

लेकिन हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रयाग को तीर्थराज का दर्जा होने से यहाँ का पूर्ण कुंभ सबसे अधिक महत्वपूर्ण और फलदायी माना जाता है.

चारों कुंभ मेले ज्योतिष के आधार पर अलग अलग गृह नक्षत्रों के संयोग पर होते हैं. यह संयोग बारह साल बाद ही आते हैं. सूर्य, चंद्र और बृहस्पति ये नक्षत्र अपनी निश्चित गति से विभिन्न बारह राशियों के चक्कर लगाते रहते हैं.

धर्म शास्त्रों में तय है कि माघ महीने में जब सूर्य मकर राशि में हों और वृहस्पति वृष राशि में हों तब प्रयाग कुंभ का योग होता है.

हिंदू समुदाय का विश्वास है कि प्रयाग के त्रिवेणी संगम में जब सूर्य चन्द्र और बृहस्पति के संयोग से कुंभ का संयोग होता है तो उससे गंगा जल में कुछ सकारात्मक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक ऊर्जा उत्पन्न होती है. इसलिए उस समय संगम में स्नान करने वालों को एक अलौकिक आनंद की अनुभूति होती है.

ऐतिहासिक

इस साल प्रयाग का पारंपरिक कुंभ योग मौनी अमावस्या दस फरवरी को होगा. उस दिन ढ़ाई तीन करोड़ लोगों के आने का अनुमान है. इससे पहले पौष पूर्णिमा से यानि सत्ताईस जनवरी से कई लाख कल्पवासी भी पहुँच जायेंगे

सदियों से लोगों में यह आस्था है कि गंगा स्नान, विशेषकर कुंभ में स्नान से उनके मन के पाप धुल जाते हैं और जन्म मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है.

यह आस्था और विश्वास तर्क की कसौटी पर भले खरा न उतरे, लेकिन तमाम वैज्ञानिक और इंजीनियर भी इस तरफ खिंचे चले आते हैं.

हाल के वर्षों में शहरी मध्यम वर्ग, नौजवानों और गैर हिंदू विदेशियों का आकर्षण भी इस तरफ बढ़ा है.

यजुर्वेद में चार कुंभ मेलों का उल्लेख होने से माना जाता है कि यह पर्व वैदिक कला से चला आ रहा है.

सातवीं शताब्दी में चीनी बुध यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तान्त में भी प्रयाग में इस मेले का जिक्र होता है.

कुम्भ में कई विदेशी नागरिक भी शिरकत कर रहे हैं

माना जाता है कि जगत गुरु शंकाराचार्य ने इसे नए सिरे से परिभाषित करके सनातन वैदिक धर्म को पुनर्जीवन दिया.

यह मेला भारतीय जन मानस में इतना गहरे बैठा है कि मुग़ल और ब्रिटिश शासन के दौरान भी इसके आयोजन में सहयोग मिलता रहा है.

कुंभ में लघु भारत

भारत के कोने कोने से तीर्थयात्रियों का पहुंचना लगातार जारी है, लाखों पहुँच चुके हैं जबकि कई लाख लोग और अभी रास्तों पर हैं.

संन्यासियों के तेरह अखाड़ों के कई हजार साधु संत सोमवार को पहले शाही स्नान के लिए अपनी तैयारियों को अंतिम रूप दे रहे हैं. साथ ही प्रशासन भी अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटा है.

नगा साधुओं के इस शाही स्नान के दर्शन और उनकी “चरण रज” लेने के लिए के लिए बड़ी संख्या में तीर्थयात्री पहुँच रहे हैं. इस बार तीर्थयात्रियों में युवाओं और विदेशियों की अधिक भागीदारी साफ़ दिख रही है.

साधु संन्यासियों ने भी विदेशियों और नयी टेक्नोलॉजी को अपना लिया है. पहले कैमरे से चिढ़ने वाले नगा साधु इस बार वीडियो कैमरे और लैप टाप साथ लेकर चल रहे हैं, जिससे देश विदेश के अपने भक्तों से संपर्क जुड़ा रहे.

प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े उपाय किए हैं

मेला आयुक्त देवेश चतुर्वेदी ने बताया कि दुनिया के इस सबसे बड़े धार्मिक और सांस्कृतिक मेले में कुल मिलाकर सात आठ करोड़ लोगों के शामिल होने की संभावना है.

तैयारी

इतने बड़े मेले की व्यवस्था के लिए कुल मिलाकर लगभग दो लाख कर्मचारियों की सेवाएं ली जा रही हैं. इस व्यवस्था पर सार्वजनिक कोष से लगभग बारह सौ करोड रूपए खर्च किए जाएंगे.

चतुर्वेदी ने बताया, “हमलोगों की तैयारियां लगभग पूरी हो गयी हैं. यह तैयारियां इस उद्देश्य से की गयी हैं कि चौदह जनवरी का स्नान नियंत्रित रूप से पूरा हो जाए और हम तीर्थयात्रियों को गंगा नदी और संगम पर स्नान करा सकें.”

दरअसल गंगा में पानी के घटते बढ़ने के साथ ही नदी की धारा भी बदलती रहती है , इसलिए सिंचाई विभाग के इंजीनियरों को लगातार घाटों के आकार प्रकार में बदलाव करते रहना पड़ता है.

मेले में यातायात प्रबंध और सुरक्षा के लिए करीब तीस हजार पुलिस फ़ोर्स लगायी गयी है. इन्हें तीर्थयात्रियों को गाइड करने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित किया गया है.

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