‘भारत ढोंग छोड़े और ईंट का जवाब पत्थर से दें’

  • 9 जनवरी 2013
2008 के मुंबई हमलों के बाद भारत-पाक शांतिवार्ता बहाली में काफी समय लगा था

भारत-पाक सीमा पर नियंत्रण रेखा पर युद्धविराम का उल्लंघन होने के बाद दोनों देशों के बीच वाकयुद्ध शुरू हो गया है.

जहां भारत ने पाकिस्तान पर दो भारतीय सैनिकों की ‘अमानवीय हत्या’ का आरोप लगाया है, वहीं पाकिस्तान का आरोप है कि भारतीय सैनिकों ने युद्धविराम का उल्लंघन कर उसके एक सैनिक को मार गिराया.

विश्लेषकों का कहना है कि इस घटना का दोनों देशों के रिश्तों पर बुरा असर पड़ेगा और साथ ही शांतिवार्ता की गति पर भी ब्रेक लग सकता है.

रक्षा मामलों के विश्लेषक मारूफ़ रज़ा ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि भारत को युद्धविराम का ‘ढोंग’ खत्म करना चाहिए.

उनका कहना था, “भारत युद्धविराम जैसी योजनाओं से खुद को झूठी दिलासा देना चाहता है. पाकिस्तान की लगातार गुस्ताखी के बावजूद भारत शांतिवार्ता, बॉलीवुड और क्रिकेट के ज़रिए रिश्तों को बहाल करने की कोशिश में लगा है. लेकिन इसका कोई फायदा नहीं है. लोहे को केवल लोहा ही काट सकता है.”

सब्र से चलेगा काम?

लेकिन दूसरी ओर कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अगर इस घटना का असर शांति वार्ता पर पड़ता है तो वो दोनों देशों की बदकिस्मती होगी.

पाकिस्तान की रक्षा मामलों की विश्लेषक आयशा सिद्दीकी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “युद्धविराम का उल्लंघन तो होता रहता है, लेकिन दोनो पक्षों को सब्र से काम लेना चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि शांति वार्ता पर कोई असर न पड़े. जहां तक इस मामले की बात है, तो दोनो पक्षों को एक संयुक्त जांच करनी चाहिए.”

जब मारूफ रज़ा से पूछा गया कि भारत के कड़े रुख का दोनों देशों के रिश्ते पर क्या असर होगा, तो उनका कहना था कि भारत को हिंसा का जवाब हिंसा से देना चाहिए.

उन्होंने कहा, “पाकिस्तान भारत के नरम रवैये का फायदा उठाता रहा है और आगे भी उठाता रहेगा. भारत को शांति वार्ता का मुद्दा सीमापार हिंसा से अलग नहीं रखना चाहिए. लोहा ही लोहे को काटता है और भारत को अब दिखा देना चाहिए कि उसके शब्द खोखले नहीं है.”

दोस्ती या दुश्मनी?

मारूफ रज़ा का मानना है कि भारत अंतर्राष्ट्रीय दबाव में आकर पाकिस्तान की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाता है, लेकिन जब तक पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी और सेना अपना एजेंडा नहीं बदलती, तब तक भारत की कोशिशों का कोई फायदा नहीं.

लेकिन आयशा सिद्दीकी मानती हैं कि आपसी इल्ज़ाम लगाने से स्थिति में कोई बदलाव या सुधार नहीं आ सकता.

उनका कहना था, “शांतिवार्ता में जो तेज़ी आई थी उसे खो देना दोनो देशों के लिए घातक साबित हो सकता है. पाकिस्तान में आने वाले चुनावों की वजह से वैसे भी शांति वार्ता का मुद्दा नरम पड़ गया है, लेकिन अगर इस दिशा में रिवर्स गियर लगता है तो वो दोनो देशों की बदकिस्मति होगी.”

विपक्षी दलों के साथ-साथ कुछ विश्लेषकों का कहना है कि भारत ने पाकिस्तान को पहचानने में हमेशा गलती की है औऱ भारत को ये मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाना चाहिए.

लेकिन दूसरी ओर कुछ विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने से पाकिस्तान को फायदा हो सकता है क्योंकि वो हमेशा से ही नियंत्रण रेखा को अंतरराष्ट्रीय रेखा के रूप में देखना चाहता है.

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