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बलात्कार के वो मामले जिन्हें भुला दिया गया

 रविवार, 6 जनवरी, 2013 को 08:01 IST तक के समाचार
दिल्ली बलात्कार विरोध

दिल्ली सामूहिक बलात्कार के बाद दोषियों को फांसी और रसायन से नपुंसक किए जाने की मांग उठ रही है

पिछले माह दिल्ली में एक युवती के सामूहिक बलात्कार के बाद देश भर में लोगों का ग़ुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा है. ऐसे बहुत से मामले हैं जिन्हें लेकर कुछ समय तो बहुत हंगामा होता रहा लेकिन धीरे-धीरे वो लोगों के मानसपटल से हट गए.

उस देश में जहां हर 21 मिनट में बलात्कार की एक घटना होती है, वहां भयंकर से भयंकर अपराध को भी लोग जल्द ही भूल जाते है. इसकी यादें बची रहती हैं तो सिर्फ़ पीड़ित के परिवार वालों या सगे-संबंधियों के दिल में.

उन्हें न्याय के लिए भी अकेले ही लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है, और ज़्यादातर ऐसे मामलों में न्याय नहीं मिल पाता है.

जो मामले ज़ेहन में आते हैं उनमें सबसे दर्दनाक है मुंबई की नर्स अरूणा शानबाग का मामला.

दयनीय स्थिति

अरूणा शानबाग जिस अस्पताल में काम करती थीं वहां के क्लीनर ने उनके साथ गुदा मैथुन किया.

अरूणा शानबाग

अरूणा शानबाग बहुत ही दैन्य स्थिति में जीवन गुज़ार रही हैं.

सोहन लाल वाल्मीकि नाम के इस व्यक्ति ने ज़ंजीर से उनका गला घोंटने की कोशिश की और फिर उन्हें बुरी हालत में छोड़कर चला गया.

हालाँकि वो जीवित बच गईं लेकिन पिछले 39 साल से वो अस्पताल में हैं, उनका दिमाग़ काम नहीं करता, वो किसी को पहचानती नहीं हैं, न ही वो बोल सकती है, और अपनी दिनचर्या का काम तक नहीं कर पातीं.

अरूणा के जीवन पर किताब लिख चुकीं लेखिका पिंकी विरानी कहती हैं, "उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ बलात्कार का मामला भी दर्ज नहीं किया गया."

नतीजा ये हुआ कि वाल्मीकि को लूटपाट और हत्या के प्रयास के लिए सात साल की क़ैद हुई.

पिंकी विरानी कहती हैं कि उन्होंने वाल्मीकि को ढूंढ़ने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाईं.

"न तो अस्पताल ने उनकी तस्वीर रखी है, न ही वो अदालत के काग़ज़ात में मौजूद है."

भारत शर्मसार

साल 2003 में दो लोगों ने राजधानी दिल्ली के दक्षिणी इलाक़े में एक राजनयिक को उनकी कार में ही घुसने को मजबूर किया. बाद में उनमें से एक ने उनके साथ बलात्कार किया.

मणिपुर में साल 2004 में असम राइफ़ल्स के जवान मनोरमा नाम की महिला को उनके घर से ये कहकर ले गए कि वो चरमपंथियों की मदद कर रही हैं.

कुछ घंटों के बाद उनका छत-विक्षत शरीर सड़क के किनारे मिला. उनके कुल्हों के पास की जगहों पर दर्जनों गोलियां मारी गई थीं.

उत्तर प्रदेश के एक पुलिस स्टेशन में पिछले साल ही सोनम नाम की एक 14 साल की लड़की का बलात्कार कर उसका क़त्ल कर दिया गया.

"मुल्क का वर्तमान बलात्कार संबंधी क़ानून इस तरह के मामलो से निपटने के लिए काफ़ी नहीं है और न्याय व्यवस्था बहुत धीमी है और अधिकांशतर मामलों में सज़ा नहीं हो पाती."

इंदिरा जयसिंह, अतिरक्त महान्यायवादी

साल 2002 में हुए गुजरात दंगों के दौरान मुस्लिम औरतों के बलात्कार के काफ़ी मामले सामने आए हैं.

मानवधिकारों के लिए काम करने वाले समूहों का कहना है कि भारत-प्रशासित कश्मीर और उत्तर-पूर्व के राज्यों में सुरक्षाबल इसे पूरे समुदाय को सज़ा देने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं.

भारत-प्रशासित कश्मीर के शोपियान में तीन साल पहले दो औरतों के पुलिस के हाथों बलात्कार और हत्या के आरोप के बादल 47 दिनों का बंद रहा था.

हालांकि जम्मू-कश्मीर सरकार ने बीबीसी को भेजे गए एक बयान में कहा है कि सीबीआई जांच में ये पाया गया कि दोनों महिलाओं की मौत डूबने की वजह से हुई थी.

बयान में ये भी कहा गया है कि जांच के मुताबिक़ इनका बलात्कार नहीं किया गया था और न ही हत्या हुई थी.

न्याय का इंतज़ार

छत्तीसगढ़ में सोनी सोढ़ी नाम की आदिवासी महिला को पुलिस ने अक्टूबर 2011 से माओवादियों के संदेशवाहक होने के नाम पर बंद कर रखा है.

सोढ़ी ने सुप्रीम कोर्ट के सामने ये इल्ज़ाम लगाया है कि पुलिस हिरासत में उनके साथ बलात्कार किया गया और उनके गुप्तांगों में पत्थर की टुकड़ियां घुसेड़ी गईं.

ये सभी पीड़ित न्याय मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं.

कई बार अपराधियों को मामूली सज़ा देकर इसलिए छूट जाते हैं क्योंकि अदालतें उनके इस तर्क को मान लेती हैं कि अपराध करते समय वो नशे में थे, वो लंबे समय से परिवार से दूर रह रहे थे, या कई बार ये भी कह दिया जाता है कि अभियुक्त ऊंची जाति से ताल्लुक रखता है और वो किसी दलित का बलात्कार कर ही नहीं सकता.

साकते अदालत

मामले में पुलिस ने चार्जशीट दाख़िल कर दिया है जिसकी सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में होगी.

भारत की अतिरिक्त महान्यायवादी इंदिरा जयसिंह का मानना है कि देश का वर्तमान बलात्कार-संबंधी क़ानून इस तरह के मामलो से निपटने के लिए काफ़ी नहीं है और न्याय व्यवस्था बहुत धीमी है और अधिकांशतर मामलों में सज़ा नहीं हो पाती.

वो कहती हैं कि बहुत सारे केस पुलिस तक पहुंचते ही नहीं है क्योंकि बलात्कार को लेकर समाज में एक ख़ास क़िस्म की मानसिकता है जिसकी वजह से पीड़ित को शर्म का एहसास करवाया जाता है.

उनका कहना है कि हालांकि इससे निपटने के लिए कोई मैजिक फार्मूला नहीं है.

उम्मीद की किरण

वर्ष 1972 में एक पुलिस थाने में दो पुलिसकर्मियों ने मथुरा नाम की एक 16-साल की युवती के साथ बलात्कार किया था.

लेकिन बाद में अदालत ने अभियुक्तों को इसलिए छोड़ दिया क्योंकि बलात्कार होते समय महिला ने हंगामा नहीं किया था, वो घायल नहीं हुई थी और उसके पहले भी यौन संबंध रह चुके थे. कहा गया वो इसके लिए ख़ुद से तैयार हुई होगी.

इसके बाद बलात्कार के क़ानून में तब्दीली लाई गई जिसके बाद ये हुआ कि अगर महिला कहती है कि उसके साथ बलात्कार हुआ है तो उसकी बात सच मानी जाएगी.

उम्मीद की जा रही है कि दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामले के बाद हो रहा हंगामा भी इस क़ानून में बेहतरी लाएगा.

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