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'...वो हमारी आखिरी बातचीत थी'

 बुधवार, 2 जनवरी, 2013 को 12:54 IST तक के समाचार
बलात्कार पर विरोध

पूरे देश में कानून में बदलाव की मांग उठ रही है

दिल्ली सामूहिक बलात्कार की पीड़ित लड़की को लेकर पूरे देश में रोष है. पीड़िता के सगे भाई ने अपनी बहन के बारे में अपनी यादों को बीबीसी से साझा किया.

''उनका आखिरी फोन सात बजे आया था. मैंने ही उनका फोन उठाया था.

उस दिन फोन पर उन्होंने बोला कि मैं थोड़ी देर में आ जाऊंगी. जब मैने आठ बजे के बाद उनका नंबर डायल करना शुरू किया तो उनका नंबर नहीं मिला.

वैसे आठ बजे तक वो घर आ जाती थीं, अगर आठ से ज्यादा बज जाते थे तो वो खुद फोन करती थीं. ज्यादा देर होने पर वो खुद ही बता देती थीं कि वो कब और कैसे आएंगी.

क्रिसमस के दिन जब उन्हें दिल्ली के अस्पताल में होश आया तो इशारे से उन्होंने मुझसे कहा कि "मैं ऊपर जा रही हूँ. बाय. वो हमारी आखिरी बातचीत थी."

उससे पहले जब वो वेंटिलेटर पर नहीं थीं तो वो मुझसे पूछती थीं– "स्कूल जाता है? खाना खाता है? पढ़ाई करता है?"

गणित में थी तेज

उनमें एक खासियत थी कि वो किसी से डरती नहीं थी. सोचा भी नहीं था कि उनके साथ ऐसा हो सकता है. उन्होंने खुद नहीं सोचा था.

मेरी दीदी मुझे डाँटती भी थी लेकिन प्यार भी बहुत करती थी. चाहे वो कितनी भी दूर हो, हर रक्षा बंधन में ज़रूर मिलने आती थीं.

अगर उनकी परीक्षा दो दिन बाद भी होती थी, तब भी वो जरूर आती थी. सुबह आती थीं, शाम को चली जाती थीं.

आखिरी बार रक्षा बंधन में मैने उन्हें 101 रुपए दिए थे.

हमारा हमेशा झगड़ा होता था. ज्यादातर झगड़ा टीवी देखने को लेकर होता था. उनको ज्यादातर सीरियल्स पसंद थे. उन्हें 'बिग बॉस' बहुत पसंद था.

अगर मैं किसी से थोड़ा बदतमीजी से बात करता था तो वो उस वक्त मुझे डाँटती थी. फिर सही से बातचीत करने को कहती थीं.

बलात्कार पीड़ित का गांव

पीड़ित के गांव में सन्नाटा पसरा है

दीदी पढ़ने में बहुत अच्छी थी, खासकर गणित में. मुझे याद है कि 10वीं कक्षा में उनके गणित में 95 अंक आए थे. लेकिन मैने कभी उनसे गणित पढ़ाने को नहीं बोला.

वो रात में चार-चार बजे तक पढ़ती थीं. उन्हें लगता था कि हम भाइयों का भविष्य बनाने की जिम्मेदारी उन्हीं पर है.

'सब ठीक हो जाएगा'

वो सबसे कहती थीं कि दो साल आप सभी लोग और तकलीफ सह लीजिए उसके बाद सब ठीक हो जाएगा.

मैं वैज्ञानिक बनना चाहता हूँ जबकि भैया इंजीनियर बनना चाहता है.

वो डांटती तो थी, लेकिन समझाती भी थी. उसे खाने में पेठे बहुत पसंद थे.

दीदी के जाने के बाद मम्मी पापा का अब बहुत ध्यान रखना पड़ेगा.

मार्च में मेरी बोर्ड की परीक्षा है. मैं खुद नहीं जानता कि इस परिस्थिति में मैं खुद को कैसे संभालूँगा. जो होगा देखा जाएगा.

दिमाग बिल्कुल सुन्न सा है. जैसे सोचने-समझने की शक्ति चली गई है.''

(बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत पर आधारित)

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