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बाल ठाकरे के बिना मुंबई कैसी ?

 सोमवार, 31 दिसंबर, 2012 को 07:33 IST तक के समाचार

बाला साहब ठाकरे मुंबई की राजनीति के उन चंद चेहरों में से हैं जिन्होंने राजनीति की दिशा तय की.

पिछले लगभग पचास सालों से बॉम्बे या मुंबई और बाल ठाकरे का नाम एक ही सांस में लिए जाता रहा, लेकिन 2013 ऐसा पहला साल होगा जब मुंबई के साथ बाल ठाकरे का नाम नही जोड़ा जा सकेगा.

इस साल उनकी मौत से पूरा मुंबई शहर सदमे में आ गया क्योंकि मुंबई और महाराष्ट्र में एक पूरी पीढ़ी बाल ठाकरे की तेज़ तर्रार राजनीति की आदी सी हो गयी थी.

कुछ उनसे खौफ खाते थे तो कुछ उनकी पूजा करते थे, लेकिन कोई उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता था.

उन्होंने ही 1966 में शिव सेना की स्थापना की थी और तभी से वो मुंबई और महाराष्ट्र की राजनीति के बेताज बादशाह बने रहे. कभी चुनाव नहीं लड़ा लेकिन हमेशा सियासी अखाड़े में अपना मुकाम बना कर रखा.

विवादस्पद कद्दावर व्यक्तित्व

तो नए साल में कदम रखने पर बाल ठाकरे के एक इशारे पर पूरी तरह से बंद हो जाने वाला मुंबई शहर राहत की सांस लेगा या उनके क्लिक करें विवादास्पद लेकिन कद्दावर व्यक्तित्व को मिस करेगा?

कुछ लोगों का मानना है कि उद्धव ठाकरे अपने पिता जैसी लोकप्रियता कभी नहीं हासिल कर सकते.

उनके समर्थकों को उनकी कमी तो ज़रूर खलेगी लेकिन उनके विरोधी नेताओं को भी उनकी कमी का एहसास होगा.

कुछ लोगों का ख्याल है कि क्लिक करें उद्धव ठाकरे अपने पिता जैसी लोकप्रियता कभी नहीं हासिल कर सकते.लेकिन, उनके भतीजे राज ठाकरे को एक दबंग नेता माना जाता है.

जिस दिन से राज ठाकरे शिव सेना और बाल ठाकरे से बगावत कर के अलग हुए हैं उन्होंने अपनी सियासत को अपने चाचा की राजनीति के अंदाज़ में ढालने की कोशिश की है जिससे उन्हें सीमित सफलता मिली है.

राजनीतिक हलचल

क्लिक करें बाल ठाकरे अब नहीं रहे लेकिन महाराष्ट्र में साल 2013 में राजनीति हलचल की कमी नहीं होगी.

2014 में न सिर्फ संसद का चुनाव होगा बल्कि महाराष्ट्र विधान सभा का भी चुनाव होने वाला है. कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठबंधन 1999 से विधान सभा का चुनाव जीतता चला आ रहा है.

इनकी कोशिश होगी चौथी बार चुनाव जीतने की.

सवाल है कि क्या बाल ठाकरे की अनुपस्थिति में शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी का गठजोड़ कांग्रेस और एनसीपी के गठजोड़ को ऐसा करने से रोक सकेगा? क्या बाल ठाकरे की मौत से उनकी पार्टी को चुनाव में हमदर्दी का वोट मिलेगा?

फिलहाल इन सवालों का जवाब ढूँढना मुश्किल है लेकिन साल 2013 में इनके संकेत ज़रूर मिलने लगेंगे.

मुंबई का विकास

पिछले दस सालों में दिल्ली शहर बुनयादी ढाँचे में मुंबई से काफी आगे निकल चुका है.

शिव सेना चाहती थी कि शिवाजी पार्क मे ही बाल ठाकरे की समाधि बने.

मेट्रो का जाल हो या फिर फ़्लाईओवरो का निर्माण दिल्ली मुंबई के मुकाबले कहीं अधिक विकसित हो चुकी है.

लेकिन बुनयादी ढाँचे के मैदान में साल 2013 मुंबई का साल होगा. तीन चरणों में तैयार होने वाले मेट्रो के पहले चरण का उद्घाटन मार्च में होने वाला है.

और इसी महीने में ही मोनो रेल भी चलने लगेगी. अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को शहर से जोड़ने वाला एक लम्बा फ्लाईओवर भी अगले साल के चंद महीनों में ट्रैफिक के लिए तैयार हो जाएगा.

मुंबई अगर दिल्ली से बुनयादी ढाँचे में पीछे है तो आर्थिक गतिविधियों में और शेयर बाज़ार की हलचल में उससे कहीं आगे.

पिछले दो सालों से शेयर बाज़ारों में कुछ अधिक उछाल देखने को नहीं मिला लेकिन शेयर दलाल को उम्मीद है कि 2013 में शेयरों में निवेश करके पैसे कमाने वालों के लिए अच्छा साल होगा

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