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सावधान! जानलेवा नशामुक्ति केंद्रों से

 शनिवार, 29 दिसंबर, 2012 को 09:49 IST तक के समाचार
नशा

भारत में मादक पदार्थ खोजना आसान है अच्छा नशा मुक्ति केंद्र खोजना कठिन

जब मैंने दिल्ली में नशा मुक्ति केन्द्रों को तलाशना शुरू किया तो परेशान हो गया. आमतौर पर ज़्यादातर में दिए गए पते पर कोई बोर्ड या बैनर नहीं होता.

आपको अड़ोस-पड़ोस के लोगों से पूछना पड़ता है. जब मैं अपने आपको पत्रकार घोषित करके गया तो कई बार संचालक मिलने के वायदे के बावजूद गायब मिले. जहाँ मिले, वहां उन्होंने मुझे नशा मुक्ति केंद्र के अंदर नहीं जाने दिया.

हाँ, जब झूठ बोलकर बिना अपनी पहचान बताए अंदर गया तो कई जगह मिली भयानक गंदगी, कहीं छोटे-छोटे कमरों में जानवरों की तरह ठुँसे हुए लोग.

एक और चीज़ जो आमतौर पर नशा मुक्ति केन्द्रों में दिख जाती है वो है हट्टे-कट्टे, मुस्टंडे किस्म के यहां-वहां से झांकते लोग.

सबके नशा छुड़ा देने के लंबे-चौड़े वादे, महीने में 5,000 रुपए से लेकर 25,000 रुपए तक की मांग.

खोजने पर पता लगा कि हालात जैसे दिखते हैं, उससे कहीं ज़्यादा बुरे हैं.

आपबीती

"मैंने अपनी आखों से देखा कि जब एक आदमी ने खुद को ब्लेड से काट लिया तो उसके ज़ख्म पर दवा की जगह मिर्च का पाउडर भर दिया गया"

गोविन्द सरवन मुत्थू

"मैंने अपनी आंखों से देखा कि जब एक आदमी ने खुद को ब्लेड से काट लिया तो उसके ज़ख्म पर दवा की जगह मिर्च का पाउडर भर दिया गया," यह बताते हुए गोविन्द सरवन मुत्थू उत्तेजित हो जाते हैं.

मुत्थू की उम्र 67 साल है और वो एक उच्च-मध्यमवर्गीय परिवार के मुखिया हैं. वो किसी ज़माने में भारतीय नौसेना के जहाज़ पर गनर थे और उसके बाद उन्होंने एयर इंडिया में नौकरी की.

वो समझते हैं कि अगर उन्हें नशा छोड़ना है तो उन्हें कितनी मेहनत करनी होगी.

भारत की गलियों और नुक्कड़ में चल रहे नशा मुक्ति केन्द्रों के डरावने किस्सों को सुनकर किसी भी आम आदमी की रूह काँप जाएगी.

मुत्थू बैंगलोर और दिल्ली के केन्द्रों में वक्त काट चुके हैं. मुत्थू की तरह ही 58 साल की अनामिका के बड़े भाई भी 35 सालों से कई नशा मुक्ति केन्द्रों में धक्के खा रहे हैं.

यही नहीं उनकी युवा बेटी भी पिछले पांच सालों से अपने तीसरे नशा मुक्ति केंद्र में हैं. उन्हे नहीं मालूम कि अगर उन्हें कोई शिकायत है तो वो कहाँ जाएँ, किसका दरवाजा खटखटाएं.

अनामिका का कहना है कि एक नशा मुक्ति केंद्र में जब उनके भाई ने यौन शोषण का विरोध किया तो उन्हें बुरी तरह से मारपीट कर केंद्र से निकाल दिया गया.

अनामिका कहती हैं कि वो हमेशा अपने माता-पिता से पूछती थीं कि भाई इतने सालों से पुनर्वास कन्द्रों में हैं तो ठीक क्यों नहीं होते.

वो बताती हैं, "जब मेरी बेटी नशे की शिकार हुई तब मुझे पता लगा कि आप उन नशा-केंद्रों को उँगलियों पर गिन सकते हैं जहाँ आपको केंद्र के अन्दर नशा नहीं मिलता."

आंदोलनकारी

नशा

भारत सरकार ने नशा मुक्ति केन्द्रों को सामाजिक न्याय मंत्रालय के अधीन रखा गया है.

भारत में नशा मुक्ति केन्द्रों के बारे में बात करते हुए विजय सिम्हा कहते हैं, "भारत में चल रहे 80 फ़ीसदी नशा मुक्ति केंद्र अवैध हैं. 20 फीसदी जो वैध हैं, वहां भी साफ़सफाई और खुली जगह नहीं होती है."

सिम्हा बताते हैं, "केंद्रों में नशा पीड़ितों के साथ मारपीट होती हैं क्योंकि इन्हें पता ही नहीं कि इस बीमारी से कैसे निपटें. यह एक धंधा है, वो छह महीने के लिए पैसे लेते हैं और एक महीने में भाग जाने पर मजबूर करते हैं. अगर किसी के पास कोई शिकायत है तो उसके पास कोई जगह नहीं हैं जहाँ वो उसे दर्ज करा सके."

"भारत में चल रहे 80 फ़ीसदी नशा मुक्ति केंद्र अवैध हैं. जो वैध हैं, वहां भी साफ़सफाई और खुली जगह नहीं होती है."

विजय सिम्हा

सिम्हा जो कि खुद कई सालों तक नशे में डूबे रहने के बाद नशा छोड़ चुके हैं, वो अब भारत के उन प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं में से एक हैं जो इस बारे में भारत सरकार का नज़रिया बदलने के लिए लड़ रहे हैं.

वो दावा करते हैं कि अगर पश्चिमी देशों के मापदंडों को भारत में लागू कर दिया जाए तो भारत में 24 घंटों के भीतर ही सारे नशा मुक्ति केंद्र बंद हो जाएंगे.

बुराई नहीं बीमारी

भारत सरकार ने नशा मुक्ति केन्द्रों को सामाजिक न्याय मंत्रालय के अधीन रखा है. ऐसा नहीं कि भारत में अच्छे नशा मुक्ति केंद्र नहीं हैं, अच्छे नशा मुक्ति केंद्र भी हैं लेकिन वो आपको मिल सकते हैं केवल भाग्य भरोसे.

सामाजिक न्याय मंत्रालय छूआछूत और बुजुर्गों से जुड़ी समस्याओं से भी निपटता है, उसकी प्राथमिकता सूची में नशा मुक्ति सातवें स्थान पर हैं. भिखारियों से जुड़ी समस्याएं प्राथमिकता सूची में आठवें स्थान पर हैं.

लंदन स्कूल ऑफ़ हाईजीन में प्रोफ़ेसर विक्रम पटेल इस बात पर कहते हैं, "यह सोचना कि नशे की समस्या कोई नैतिक समस्या है, यह बहुत ही दकियानूसी ख्याल है. अब हमें यह वैज्ञानिक तौर से पता है कि यह एक बीमारी है और इसलिए इसे स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत होना चाहिए."

डॉक्टर पटेल कहते हैं, "नशे को बायो-साइको-सोशल तरीके से देखा जाना चाहिए, जिस तरह से इसे ब्रिटेन और दूसरे देशों में देखा जाता है. बायो यानी शारीरिक, साइको यानी मानसिक और सोशल यानी सामजिक बीमारी के रूप में."

(अनामिका एक काल्पनिक नाम है और महिला की पहचान को उनकी इच्छानुसार सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है.)

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