कहीं हैदराबाद का दिल धड़कना बंद न कर दे

 बुधवार, 26 दिसंबर, 2012 को 08:55 IST तक के समाचार

हैदराबाद का हुसैन सागर झील का आकार बिल्कुल दिल की तरह है.

दिलनुमा हुसैन सागर झील दशकों से हैदराबाद की पहचान है, लेकिन अब इस पहचान को किसी की नज़र लगती जा रही है. इस दिल ने धड़कना बंद कर दिया है.

450 वर्ष पुरानी यह झील अब एक बार फिर चर्चा में है. संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन ने इस झील को सारी दुनिया में दिल के आकार की सबसे बड़ी झील की मान्यता दे दी है.

दूसरी ओर राज्य सरकार ने भी इस झील की सफाई करने और उसमें नई जान डालने की अनूठी कोशिश शुरू की है. इसके तहत पहली बार आम नागरिकों और गैर-सरकारी संगठनों को भी शामिल किया जा रहा है.

हैदराबाद महानगर विकास प्राधिकरण और हुसैन सागर को सुंदर बनाने की परियोजना के प्रमुख अधिकारी एमजे अकबर ने बीबीसी को बताया, "हमें उम्मीद है कि इस प्रयास के अच्छे परिणाम निकलेंगे, क्योंकि अगर देखा जाए तो झील में प्रदूषण के जिम्मेदार भी हम-आप जैसे लोग हैं. चाहे वो करीबी इलाकों के निवासी हों, जो इसमें कचरा फेंकते हैं या उद्योगपति जिनके कारखानों से निकलने वाला प्रदूषण झील के विनाश का कारण बन रहा है."

इस 'दिल' की बात अलग है

हुसैन सागर झील को जो बात सबसे अलग करती है वो ये कि ये मानव निर्मित विश्व की सबसे बड़ी झीलों में से एक है.

क़ुतुबशाही दौर के बादशाह इब्राहिम क़ुतुबशाह के ज़माने में एक इंजीनियर हुसैनशाह वली ने पानी की किल्लत दूर करने के लिए इस झील का निर्माण कराया था.

हैदराबाद और कुतुबशाही दौर के एक विशेषज्ञ मोहम्मद सफीउल्लाह कहते हैं, "यह झील वर्ष 1559 से 1562 तक केवल दो लाख 54 हज़ार रुपए के खर्च से बनाई गई थी. इस काम में लगभग 3500 मजदूर लगे थे. उस समय इस झील का आकार 1600 हेक्टेयर था."

हैदराबाद की ये झील चार मीनार से भी 30 वर्ष पुरानी है. जब हैदराबाद नगर बसा तो लगभग चार शताब्दियों तक इस झील से हैदराबाद को पीने का पानी मिलता रहा और आसपास के इलाकों में सिंचाई के लिए भी इसका उपयोग होता था.

तबाही की कहानी

झील में गणपति विसर्जन

इस झील की तबाही का सिलसिला 70 के दशक से शुरू हुआ. सरकार की अनदेखी की वजह से झील में गंदगी बढ़ने लगी और दूसरी ओर खुद प्रशासन अनेक परियोजनाओं के लिए झील की जमीन पर कब्ज़ा करने लगी.

ये झील नगर के बीचों-बीच हैदराबाद और सिकंदराबाद को अलग करती है, इसलिए इस इलाके में भूमि की जबर्दस्त मांग थी.

झील के एक ओर राज्य सचिवालय है जहाँ पहले महबूब महल था तो वहीं दूसरी ओर राजभवन है जहाँ पहले हैदराबाद के प्रधानमंत्री रहा करते थे.

झील के किनारे चौड़ी सड़कें और फ्लाई-ओवर बनाए गए जिससे झील का इलाका सिकुड़ता चला गया और साथ ही प्रदूषण बढ़ता गया.

आज हालात ये हैं कि झील के आस-पास से गुजरना भी मुश्किल हो गया है. बदबू के मारे जान निकलती है. झील के इर्द-गिर्द बनी सड़कों से गुजरने वालों को नाक और मुंह पर कपड़ा रखना पड़ता है.

इससे पहले भी प्रदूषण को रोकने की कई कोशिशें हुईं और उसके लिए विदेशों से मदद ली गई. लेकिन कुछ परिणाम नहीं निकल सका. पर इस बार यह प्रयास कई मोर्चों पर हो रहा है.

सुधार के प्रयास

झील तक गंदगी पहुंचाने वाले चार नालों की दिशा बदलने के लिए ज़रूरी इंतजाम किए जा रहे हैं. झील में पानी का स्तर बढ़ाने के साथ ही ट्रीटमेंट प्लांट' पर भी ध्यान दिया जा रहा है.

इसी परियोजना के अंतर्गत जापान ने 370 करोड़ रूपए की मदद दी है और झील से कीचड़-मिट्टी साफ़ करने का काम भी शुरू हो गया है.

अनुमान है कि झील में 60 लाख क्यूबिक फुट कीचड़ भरा है. इस परियोजना को पूरा होने में दो वर्ष लगेंगे.

कुतुबशाही दौर के विशेषज्ञ मोहम्मद सफीउल्लाह कहते हैं, "मुझे उम्मीद है कि जब यह काम पूरा हो जाएगा, तो झील का पानी बेहद साफ़ हो जाएगा और हम वहां खुली सांस ले सकेंगे.''

झील को साफ रखने के लिए सरकार ने जागरूकता अभियान भी चलाया है.

इसके लिए 'क्लीन हुसैन सागर फोरम' बनाया गया है जिसमें कोई भी नागरिक और संस्था शामिल हो सकती है और इस काम में अपना योगदान दे सकती है. इसके लिए फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स का भी इस्तेमाल किया जा रहा है.

चुनौतियां अभी बाक़ी हैं. सरकार गणेश-मूर्तियों के विसर्जन से होने वाले प्रदूषण को रोकने की कोशिश कर रही है, लेकिन राजनीतिक कारणों से इसमें सफलता नहीं मिल रही है. कुछ संगठन इस बात पर तैयार नहीं है कि मूर्तियों का विसर्जन झील में ना किया जाए.

अधिकारियों और विशेषज्ञों का कहना है कि जब झील के महत्व के संबंध में जागरूकता बढ़ेगी, तो गणेश की मूर्तियों के विसर्जन की समस्या भी हल हो जाएगी.

सफीउल्लाह का कहना है कि झील का संरक्षण केवल एक ऐतिहासिक विरासत को बचाना नहीं है बल्कि ये शहर के लिए ज़िन्दगी और मौत का सवाल है.

वो कहते हैं, ''झील का पानी इतना प्रदूषित है कि इसमें जीवन का कोई संकेत नहीं, मछलियां मर चुकी हैं, पक्षी आते नहीं हैं और झील के इर्द-गिर्द आठ किलोमीटर के इलाके में भूमिगत पानी भी प्रदूषित हो चुका है. अगर अभी भी झील को साफ़ नहीं किया गया तो आगे जाने क्या होगा, यह सोचकर ही डर लगता है.''

वैसे हुसैन सागर दम तोड़ने वाली अकेली झील नहीं है, हैदराबाद में क़ुतुब शाही और आसिफ ज़ाही राजाओं ने जिन एक हज़ार झीलों का निर्माण कराया था, उनमें से अधिकतर अब नहीं रहीं और बची हुई झीलों के इर्द-गिर्द फांसी का फंदा तंग होता जा रहा है.

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