गैंगरेप मामले पर सरकार की पांच नाकामियां

  • 24 दिसंबर 2012
दिल्ली प्रदर्शन
प्रदर्शनकारियों ने सरकार मांग की है कि बलात्कार की घटनाओं पर तुरंत रोका जाए

सरकार सभी आंदोलनों के साथ ऐसे ही व्यवहार करती है कि मानो वो विपक्षी दलों के स्वार्थ से प्रेरित और कुछ किराए के लोगों द्वारा किया गया आंदोलन हो.

रविवार को सरकार ने आंदोलनकारियों से जिस तरह से व्यवहार किया, वैसा आमतौर पर किराए के आंदोलनकारियों के साथ व्यवहार किया जाता है.

मेरे ख़्याल से इस पूरे मसले में सरकार की पाँच गलतियाँ निम्नांकित हैं-

1. सरकार को जनांदोलनों से संवाद स्थापित करना और उनके साथ कैसे संबंध बनाने चाहिए, ये समझ नहीं आ रहा है.

2. सरकार ने आंदोलन के चरित्र को समझने में भूल की. अभी भी आंदोलन में आधे से ज्यादा लोग ऐसे हैं, जो किसी भी संगठन द्वारा लाए गए लोग नहीं हैं.

3. सरकार ऐसा समझ रही है कि ये पूरा आंदोलन दिल्ली में हुए एक गैंगरेप के बारे में है. जबकि कई सालों से लोगों के मन में बलात्कार को लेकर आक्रोश है. इस देश में महिलाएँ, चाहे वो गरीब हो या अमीर, खुद को असुरक्षित समझती हैं. दिल्ली की घटना देश के रोष का प्रतीक बन गई है. सरकार इस समस्या को आठ कांस्टेबलों को निलंबति करके सुलझा लेना चाहती है.

4. सरकार के पास व्यवस्था को सुधारने का कोई प्रभावी तरीका नहीं है. सरकार ने एक कमेटी बनाकर सबसे सकारात्मक कदम उठाया है. इसमें थोड़ी साख वाले लोग भी हैं. लेकिन उस कमेटी के पास ये अधिकार नहीं है कि वो इस समस्या की जड़ तक जाए. उसे बहुत सीमित काम सौंपा गया है.

5. कई लोगों ने मांग की है कि देश में नया कानून बने. इस देश में बलात्कार के कानून बेहद पुराने जमाने के और बहुत अजीब किस्म के हैं जिनमें बदलाव की जरूरत है. बदलाव का प्रस्ताव संसद के सामने आ चुका है. सरकार को उस विधेयक पर तुरंत चर्चा करवा कर उसे पास करना चाहिए.

स्पष्ट मांग?

गैगरेप मामले से भड़का आम मध्यम वर्ग का आक्रोष

इस तरह के आंदोलन दुनिया में जहाँ भी होते हैं, उनकी कोई एक स्पष्ट मांग नहीं होतीं क्योंकि जितने मुँह उतनी बातें. कोई फांसी चाहता है, कोई नपुंसक बना देना चाहता है. जिसके मन में जो विचार आता है, उसे उड़ा रहा है. इसलिए ऐसे आंदोलनों का राजनीतिकरण होना जरूरी होता है. राजनीतिकरण का मतलब है कि सभी विचारों को जोड़कर एक स्पष्ट दिशा बनाना.

आंदोलनकारियों और युवाओं के प्रतिनिधियों को मिल बैठकर सोचना पड़ेगा और अपनी मांगों को व्यवस्थित करना होगा. उन्हें ये सोचना होगा कि वो किस मांग पर टिकना चाहते हैं.

मुझे लगता है कि फांसी या दूसरी बातों पर जोर देना बहुत समझदारी की बात नहीं है. इस देश में बलात्कार इसलिए होते क्योंकि बलात्कारी को लगता है कि मामला अगर अदालत में पहुँच गया तो सालों के लिए लटक जाएगा.

सजा को बढ़ाने की बजाए जरूरी ये है कि बलात्कार की घटनाओं में जाँच समयबद्ध तरीके से हो और मुकदमा समय सीमा में पूरा हो.

मध्यम वर्ग का आंदोलन?

पिछले दो तीन दिनों में जो लोग बाहर निकले हैं वो खाते-पीते घरों के हैं. महिलाओं में असुरक्षा का सवाल किसी एक वर्ग की सुरक्षा से जुड़ा नहीं है.

ये दुनिया में हर जगह होता है कि अगर आपको लगता है कि ये घटना मेरे साथ, मेरे परिवार के साथ हो सकती थी, तो आप ज्यादा उद्वेलित होते हैं.

ये बात सही है ये घटना एक मध्यमवर्गीय महिला के साथ हुई, इसी के कारण ये घटना इतनी बड़ी हुई. अगर ये बलात्कार की घटना सीमापुरी की किसी बस्ती में हुई होती तो हमें इस घटना का पता भी नहीं चलता.

लेकिन इस बात से ये कहना कि ये प्रदर्शन गंभीर नहीं हैं, ऐसा निष्कर्ष अप्रासंगिक और अतार्किक होगा.

मध्यमवर्गीय महिला की त्रासदी से उठा हुआ मामला वो आज देश में समान वर्गों की महिलाओं की असुरक्षा के सवाल उठा रहा है.

मेरे ख्याल से जब श्रीनगर के दुख दर्द को लोग बयान करते हैं तो बयान करने वाला श्रीनगर का मध्यम वर्ग होता है.

आंदोलनों में अधिकांश ऐसे लोग आते हैं जो अपने भूख और खाने की समस्या न्यूनतम रूप में सुलझा सकते हैं.

लेकिन यह मानना कि जो व्यक्ति बस्तर, छत्तीसगढ, के दर्द को नहीं समझता, वो दुनिया का और कोई दर्द नहीं समझ सकता, ये कहना थोड़ी ज्यादती होगी.