क्या हैं मोदी के प्रधानमंत्री की राह की मुश्किलें?

 गुरुवार, 20 दिसंबर, 2012 को 18:03 IST तक के समाचार

2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं नरेंद्र मोदी

गुजरात में लगातार तीसरी बार नरेंद्र मोदी चुनाव जीत चुके हैं. इससे उनके समर्थकों के हौसले बुलंद हैं. अहमदाबाद में बड़ी संख्या में ऐसे पोस्टर दिखाई पड़े हैं जिनमें साफ-साफ लिखा है कि 2012 में मुख्यमंत्री, 2014 में प्रधानमंत्री.

हालांकि अभी तक नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय राजनीति में सीधे तौर पर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है लेकिन गुजरात में प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी दावेदारी के पोस्टरों को देखकर कहा जा रहा है कि मोदी की सहमति के बिना ये संभव नहीं था.

ऐसे में क्या मोदी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा अब उड़ान भरेगी?

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पिछले कुछ समय से मोदी गुजरात दंगों वाली छवि से पीछा छुड़ाने की कोशिश करते नजर आए हैं. नई दिल्ली स्थित वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार स्मिता गुप्ता कहती हैं, “गुजरात के भीतर उन्होंने अपना हिंदुत्व वाला चेहरा बनाए रखा है लेकिन गुजरात के बाहर उनकी कोशिश है कि लोग दंगे भूल जाएं और उन्हें विकास पुरुष के तौर पर देखें.”

गुजरात स्थित वरिष्ठ पत्रकार अजय उमठ कहते हैं, “बीते दो साल से मोदी ख़ुद को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर ही तैयार कर रहे हैं. उन्होंने अपनी इमेज की ब्रांडिंग इसी लिहाज से की है कि ताकि आगे आने वाले लोकसभा चुनाव के दौरान वे भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनें.”

अतीत का अड़ंगा

"बीते दो साल से मोदी ख़ुद को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर ही तैयार कर रहे हैं. उन्होंने अपनी इमेज की ब्रांडिंग इसी लिहाज से की है कि ताकि आगे आने वाले लोकसभा चुनाव के दौरान वे भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनें."

अजय उमठ, गुजरात स्थित वरिष्ठ पत्रकार

कहा जाता है कि इंसान का अतीत कभी पीछा नहीं छोड़ता. गोधरा के दंगे भी मोदी का पीछा नहीं छोड़ रहे हैं. वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार नीना व्यास कहती हैं, “गुजरात में मोदी भले ही जितनी भी सीटें जीत लें, या जितने भी लोकप्रिय नेता हो जाएं, उन्हें दूसरे दल स्वीकार नहीं करेंगे.”

मौजूदा समय में गठबंधन की राजनीति का दौर है. ऐसे में वही नेता प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार हो सकता है जिसमें सबको एक साथ लेकर चलने की काबिलियत हो. लेकिन मोदी की ऐसी छवि नहीं है.

भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी जनता दल-यूनाइटेड नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुले आम नरेंद्र मोदी का विरोध कर चुके हैं. इसके अलावा राष्ट्रीए जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल बीजू जनता दल के नेता नवीन पटनायक भी मोदी के विरोधी माने जाते हैं.

गुजरात के मोदी समर्थक चाहते हैं मोदी 2014 में प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी करें

तमिलनाडु में अपने मुस्लिम वोट बैंक को देखते हुए एन चंद्रबाबू नायडू भी मोदी से दूरी बनाए रखने के पक्ष में हैं. स्मिता गुप्ता कहती हैं, “मोदी ऐसी सूरत में ही प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं जब भारतीय जनता पार्टी अकेले दम पर 272 सीटें ले आए.”

पार्टी में भी समर्थन नहीं

हालांकि नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी के अंदर भी स्वीकार्य हों ऐसा पूरी तरह नहीं कहा जा सकता. कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के तौर पर अपना सार्वजनिक जीवन शुरू करने वाले मोदी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का समर्थन नहीं मिल रहा है.

"गुजरात में मोदी भले ही जितनी भी सीटें जीत लें, या जितने भी लोकप्रिय नेता हो जाएं, उन्हें दूसरे दल स्वीकार नहीं करेंगे."

नीना व्यास, वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार

बिना आरएसएस के समर्थन के वे भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार नहीं बन सकते. अगर मोदी आरएसएस को किसी तरह मनाने में सफल भी हो गए तो भारतीय जनता पार्टी के अंदर भी घमासान छिड़ सकता है.

मोदी ने खुद कभी भारतीय जनता पार्टी की केंद्रीय समिति की परवाह नहीं की. ऐसे में भारतीय जनता पार्टी की केंद्रीय समिति में मौजूद सुषमा स्वराज और अरुण जेटली जैसे नेता मोदी की राह में रोड़े अटका सकते हैं.

इन सबके अलावा मोदी की मुश्किल ये भी है कि वे अब तक अखिल भारतीय नेता नहीं बन पाए हैं. गुजरात के बाहर उनका शायद ही कहीं कोई असर दिखता है. स्मिता गुप्ता कहती हैं, “यही वजह है कि उन्हें उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे प्रदेशों में चुनाव प्रचार के लिए कोई ख़ुशी से नहीं बुलाता. भारतीय जनता पार्टी के अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं का जो कद था, मोदी अब भी उससे बहुत दूर हैं.”

हाइप से नुकसान

इसके अलावा मोदी के व्यक्तित्व की एक और खामी उन्हें प्रधानमंत्री पद के होड़ से दूर कर सकती है.

प्रधानमंत्री बनने की राह में मोदी के सामने मुश्किलें भी कम नहीं

यह खामी है मोदी का वह रवैया जो उन्हें मोदी बनाता है. मोदी अपने सामने किसी की परवाह नहीं करते. वे एक तानाशाह की तरह पेश आते हैं. ये छवि उनके ख़िलाफ़ जा सकती है. स्मिता गुप्ता कहती हैं, “मोदी इस तरह पेश आते हैं मानो जैसा वे कहेंगे वैसा ही चलेगा. इससे उनका ही नुकसान हो रहा है. ”

वैसे मोदी की लगातार तीसरी कामयाबी भी उनकी मुसीबतें बढ़ा सकती हैं. गुजरात के मुसलमानों का रवैया भले मोदी के ख़िलाफ़ बदल रहा हो लेकिन देश के दूसरे राज्यों के मुसलमान मोदी पर भरोसा करने का जोखिम नहीं उठा सकते. ऐसे में मोदी के प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को कांग्रेस एक राजनीतिक मुद्दा बना सकती है.

राजनीतिक पत्रकार नीना व्यास कहती हैं, “प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी की उम्मीदवारी का जितना हाइप होगा, उतना ही मोदी का नुकसान हो सकता है.”

वैसे मोदी अब तक अपनी राजनीतिक लड़ाई अकेले लड़ते आए हैं. देर सबेर वे प्रधानमंत्री पद के मोह से खुद को दूर नहीं रख पाएंगे. ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में वे किस तरह अपने कदम बढ़ाते हैं. वैसे मौजूदा समय में भारतीय जनता पार्टी के अंदर मोदी इकलौते ऐसे नेता हैं जो मतदाताओं में पार्टी के लिए उत्साह पैदा करने में सक्षम हैं. लेकिन कोई इतने भर से प्रधानमंत्री नहीं बन जाता. लालकृष्ण आडवाणी का उदाहरण मोदी नहीं भूले होंगे.

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