पनाह देने वाले पनाह के मोहताज

  • 18 दिसंबर 2012
कोस मिनार
बीकानेर की ये कोस मिनार अब अच्छी हालत में नहीं है.

भारत में मुग़ल सल्तनत के दौरान आगरा से अजमेर के बीच जगह-जगह शाही राजमार्ग पर बनीं कोस मीनारें अपने वजूद के लिए हालात से लोहा ले रही हैं.

ये उस दौर में मील का पत्थर थीं. ये वो समय था जब बादशाह अकबर इसी रास्ते से चलकर अजमेर जाते और ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में हाजरी लगाते थे.

ये कोस मीनारें अकबर की ही देन हैं, लेकिन अब इनमें से कुछ मीनारें घनी आबादी में फंस गई हैं. राज्य सरकार ने इन मीनारों की सुरक्षा और संरक्षण की बात कही है.

शाही फरमान से रियासत के शिल्पकारों के हाथों बनी इन कोस मीनारों ने वो लम्हे देखे हैं जब सल्तनत की फ़ौजें, हाथी-घोड़े और लश्कर इस राह से गुजरते थे.

अकबरे-आज़म को इन मीनारों ने पैदल जाते देखा है. सल्तनतें जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर के सामने झुकती थीं, लेकिन जिल्ले इलाही अकबर अजमेर में एक फ़कीर की सरकार के सिजदे में सर झुकाते थे.

ये कोस मीनारें उस दौर में मुग़ल बादशाहत की शानो-शौक़त और ताक़त की याद दिलाती हैं. इनमें से कुछ सलामत हैं. वे राजमार्ग के इर्द-गिर्द किसी प्रहरी की तरह समय को तकती रहती हैं और कुछ अपनी हिफाजत के लिए प्रार्थना की मुद्रा में खड़ी नजर आती हैं.

जयपुर के मोहम्मद असलम खान इन कोस मीनारों की सुरक्षा को लेकर अदालत तक गए और हालत पर चिंता जाहिर की.

कोस मिनार
ये उन चंद कोस मिनारों में से एक है जो अच्छी हालत में हैं.

उनके वकील राम कपिल कहते हैं, ''हम चाहते हैं कि इस धरोहर को सुरक्षा मिले, इन पर रोशनी हो, रंग-रोगन हो. ये ऐतिहासिक धरोहर हैं, इन्हें देखकर नई पीढ़ी को इतिहास की जानकारी मिले. कुछ स्थानों पर अतिक्रमण भी है. सरकार को इन सभी को ही संरक्षित स्मारक घोषित करना चाहिए. अभी इनमें से कुछ को ही संरक्षित माना गया है.''

राजमार्ग की अवधारणा

पुरातत्व विभाग के पास कोई पचास से ज्यादा मीनारें सूचीबद्ध हैं. विभाग ने इनमें से कुछ को ही संरक्षित स्मारक घोषित किया है. विभाग का कहना है कि ये सभी मीनारें महत्वपूर्ण हैं. पिछले कुछ समय में सरकार ने इन मीनारों के रखरखाव पर खर्चा भी किया है.

पुरातत्व विभाग के अनुसार, अकबर ने ये मीनारें अजमेर दरगाह की जियारत करने वाले श्रद्धालुओं, राहगीरों और व्यापारियों के लिए बनवाई थीं. अकबर ने इन्हें आगरा से अजमेर बरास्ता जयपुर प्रत्येक कोस पर तामीर करवाई थीं.

चूने-पत्थर से चौकोर धरातल पर बनीं ये मीनारें एक ही सांचे में ढली दिखती हैं. नीचे से ये अष्टकोणीय हैं और गोलाई लेते हुए जब ऊपर उठती हैं तो थोड़ी देर बाद ही अपना आकार त्रिशंकु कर लेती हैं.

राजस्थान के मुख्य सचिव रहे सलाउद्दीन अहमद की इतिहास में गहरी दिलचस्पी है. वे कहते हैं, ''ये मीनारें इस बात की पुष्टि करती हैं कि राजमार्ग बनाने और विकसित करने की परिकल्पना केवल पश्चिम में ही नहीं थी. हमारे यहां भी राजमार्ग बनाए गए थे.''

वे कहते हैं, ''इनके साथ सराय और कुएं भी बनवाए गए थे. आजकल जो हम राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक निशान बनाते हैं, जिन्हें मील का पत्थर कहते हैं, उस समय के राष्ट्रीय राजमार्ग पर भी इसी तरह के माइल-स्टोन बने हुए थे. ये राहगीर को दूरी की जानकारी देते थे. साथ ही कुएं और सराय भी बनवाई गईं ताकि राहगीर रात में या धूप में थोड़ा विश्राम कर सकें. अगर राजमार्ग पर माइल-स्टोन के साथ कुएं और सराय बनी थीं तो दुकाने भी होंगी. ये साबित करता है कि उस समय राजमार्ग की अवधारणा भारत में भी प्रचलित थी.''

गुजरे दौर में कोई व्यापारी, श्रद्धालु या राहगीर इस मार्ग पर कदम बढ़ाता तो ये मीनारें उनके लिए मील का पत्थर थीं. बादशाह अकबर भी इस राजमार्ग का एक मुसाफिर था. इन मीनारों ने एक शहंशाह को अजमेर शरीफ के प्रति गहरी आस्था के सबब पैदल चलते देखा है.

सरकार की पहल

अजमेर में खादिमों की संस्था अंजुमन के नायब सदर सैयद कलीमुदीन कहते हैं, ''जैसे एक बादशाह की सवारी होती थी, वैसे ही अकबर हाथी- घोड़े, रथ, ऊंट और कफिले की शक्ल में रास्ते में रुकते हुए आता था. लंगर चलते थे और फिर गरीब नवाज के यहां हाजिरी देता था. ये कोस मीनारें उसी वक्त की दलील है कि बादशाह किन रास्तों से आते थे, उस ज़माने में कोई नक्शे नहीं थे, ऐसे रास्ते नहीं थे, ये मीनारें ही थीं जो राहगीरों की मदद करती थीं. इससे राहगीर भटकते नहीं थे और रास्तों को पहचान लेते थे.''

जयपुर-अजमेर राजमार्ग के बीचों-बीच खड़ी एक कोस मीनार ऐसे सजी-संवरी नजर आती हैं जैसे बादशाह- सलामत अभी-अभी उसके पास से गुजरे हों.

राजस्थान की कला और संस्कृति मंत्री बीना काक कहती हैं, ''कई जगह कोस मीनारें शहरों के बीच आ गई हैं. आबादी बढ़ने से भी कुछ समस्याएं पैदा हुई हैं. कहीं-कहीं कोस मीनारें राजमार्गो के बीच आ गईं. सरकार की ये कोशिश है कि कोस मीनारें बरक़रार रहें, हमने केंद्र सरकार से बात कर उसे न केवल सुरक्षित करवाया, बल्कि उसका जीर्णोद्धार भी करवाया. इसी तरह जयपुर शहर में भी जो मीनारें हैं, उनकी भी देखभाल की जा रही है.''

इन कोस मीनारों ने वक्त को बदलते देखा है.

उस दौर में जाड़े की सर्द रात और सहरा की तपती दुपहरी में कभी कोई व्यापारी, कभी कोई जायरीन तो कभी कोई राहगीर इनमें पनाह लेता था. मगर ये समय का फेर है, अब कोस मीनारें खुद पनाह की मोहताज हो गई हैं.