रविशंकर के संगीत विद्यालय में सितार ही नहीं!

 बुधवार, 12 दिसंबर, 2012 को 17:08 IST तक के समाचार

बुधवार सुबह जब सुबह नौ बजे पंडित रविशंकर के निधन की खबर मिली तब न्यूज़रूम में सभी का विश्वास अटल था कि ये बहुत बड़ी खबर है.

बात सोलह आने सच भी थी क्योंकि रविशंकर एक ऐसी शख्सियत थे जिन्होंने सितार या सितार से जुड़े संगीत के सभी रसों को भारत से बाहर निकाल कर दूर विदेशों तक पहुंचाया.

चाहे वो उनकी मशहूर बीटल्स संगीतकार जॉर्ज हैरिसन के साथ की जुगलबंदी हो या फिर वॉयलिन के शहंशाह कहे जाने वाले येहुदी मेनुहिन का साथ हो.

बीबीसी न्यूजरूम में मेरे साथ-साथ लगभग सभी की राय यही थी कि हमें तुरंत दिल्ली में स्थित 'रविशंकर म्यूज़िक सेंटर' की तरफ कूच करना चाहिए.

देर किस बात की थी, मैंने अपना सामान उठाया और सीधे पहुंचा दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित उनके संगीत विद्यालय पर.

थोड़ी हैरानी ज़रूर हुई ये देख कर कि वहां सन्नाटा पसरा हुआ था.

बहराल मन को दिलासा देते हुए वहां लॉन में काम करने वाले माली से पूछा, "क्या किसी से बात हो सकती है ?".

जवाब मिला, "साढ़े बारह बजे आना, गुरूजी की याद में एक प्रार्थना सभा होने वाली है. अभी और कोई नहीं है."

कौतूहल

रविशंकर

रविशंकर के निधन की खबर आने के घंटों बाद तक उनका संगीत विद्यालय वीरान पड़ा रहा.

बहराल किसी तरह घड़ी में साढ़े बारह बजे और तब तक वहां अच्छे-ख़ासे पत्रकारों का जमावड़ा भी हो चुका था.

संगीत विद्यालय में भी रविशंकर के लगभग दस शिष्य या कार्यकर्ता पहुँच चुके थे.

मेरे उर्दू सेवा के सहयोगी सुहैल हलीम ने इस संगीत विद्यालय के प्रमुख अध्यापक परिमल सराफल से गुज़ारिश भर की थी कि हमें उनकी तस्वीर किसी सितार के इर्द गिर्द खींचनी है.

परिमल साहब का जैसे चेहरा ही मुरझा गया.

जवाब मिला, "अभी तो कोई सितार नहीं है क्योंकि आमतौर पर छात्र अपना सितार साथ लेकर आते हैं और चले जाते हैं. ये शोक समाचार इतनी तुरंत आया कि हम सब स्तब्ध हैं."

हैरानी के साथ काफी निराशा भी हाथ लगी.

क्योंकि जिस शख्स को पूरी दुनिया में उसके सितारवादन के लिए जाना जाता है, उसी के इतने विशालकाय संगीत शिक्षा केंद्र में एक भी सितार नहीं दिख सका.

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