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भारत का निलंबन: अब क्या होगा आगे?

 बुधवार, 5 दिसंबर, 2012 को 09:16 IST तक के समाचार

कब तक भारत की अनदेखी कर पाएगी अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक समिति

भारत को डरने की ज़रूरत नहीं है. अगर अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) ने भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) को निलंबित भी कर दिया है तो भी भारतीय खिलाड़ी निश्चित तौर पर 2016 में रियो में होने वाले ओलंपिक खेलों में शामिल होंगे.

रियो में खिलाड़ियों की परेड में आपको भारतीय एथलीट तिरंगे के साथ मार्च पास्ट करते हुए ज़रूर दिखेंगे. इसका मतलब साफ़ है कि समय के साथ निलंबन वापस भी हो जाएगा.

अभी अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति तो भारतीय ओलंपिक संघ को निलंबित करने का जोखिम उठा सकता है लेकिन ओलंपिक खेलों के दौरान दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मुल्क की उपेक्षा आईओसी नहीं करना चाहेगा. अगर दूसरे शब्दों में कहें तो वह ऐसा करने का जोखिम नहीं उठा सकता.

खेल की दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार

भारत की अपनी मुश्किलें ज़रूर हैं लेकिन यह एक निरकुंश देश तो नहीं है.

दुनिया के कोने कोने से खेल संस्थाएं भारत में आकर बेहतर प्रदर्शन करना चाहती हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि यहां बेहतर काम करने पर देखने वाले भी मिलेंगे.

ओलंपिक खेलों का प्रत्येक प्रायोजक भारतीय बाज़ार का मुरीद है. क्योंकि ये वो बाज़ार है जहां सबसे ज़्यादा कैमरा, टीवी सेट, बर्गर और ना जाने कितने तरह के उत्पाद बिकते हैं.

हम अपनी हार जाने वाली टीम के ख़िलाफ़ फतवा जारी नहीं करते. हम महिलाओं को खेलों में हिस्सा लेने की इजाज़त देते हैं और वो हमारे लिए पदक भी जीतती हैं.

हमारे यहां मानवाधिकार की स्थिति उन मुल्कों से कई गुना बेहतर है जिनके ख़िलाड़ी थोक में पदक जीतते हैं.

हम बस अपने यहां खेलों की दुनिया को साफ़ सुथरा बनाना चाहते हैं और इसमें कहीं कोई ख़राबी नहीं है.

गली नुक्कड़ में ऐसे आम आदमी ज़रूर मिलेंगे जो सरकार को नापसंद करते हों, महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी को लेकर उसकी तमाम शिकायतें हो सकती हैं. लेकिन यह स्थिति तो पूरी दुनिया की है.

वास्तविकता यही है कि भारत दुनिया के कई देशों की तुलना में कहीं ज़्यादा मुक्त देश है. इसके बावजूद हमें सरकार को उसके उत्तरदायित्वों की याद दिलाते रहना चाहिए. हमारी न्यायपालिका ऐसा समय-समय पर करती है और मीडिया भी ऐसा करता है.

सवालों के घेरे में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति भी

इसके बाद भी आईओसी ने हमें निलंबित कर दिया है, तो इसकी एक वजह है. दरअसल आईओसी यह ख़ुद नहीं चाहता है कि कोई उसकी स्वायत्तता पर सवाल उठाए चाहे वो सवाल किसी देश की सरकारी व्यवस्था के ही क्यों ना हों.

भारतीय ओलिंपिक संघ में दशकों से काबिज़ हैं राजनेताओं की जमात

आईओसी के अध्यक्ष को अलग- अलग देशों के राष्ट्रपतियों को इंतज़ार कराने की आदत पड़ चुकी है.

आईओसी की कोशिश यही रही है कि खेल को राजनीति से दूर रखा जाए. आईओसी का मानना है कि राजनीति के निकट जाने से सरकार का दख़ल बढ़ सकता है.

एक ओर तो आईओसी ऐसा कहती है दूसरी ओर वह भारतीय खेल संघों में दशकों से चले आ रहे राजनेताओं के वर्चस्व की अनदेखी भी नहीं कर सकती. आईओसी को इस मसले पर गंभीरता से ध्यान देने की ज़रूरत है.

हमारे देश में खेल संघों को राजनेता अपनी जागीर समझते है. इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण हाल फ़िलहाल तक आईओए के कार्यकारी अध्यक्ष रहे विजय कुमार मल्होत्रा हैं जो तीरंदाज़ी संघ पर 40 से ज़्यादा सालों से क़ाबिज़ हैं. वे फिर से चुनाव जीत गए हैं.

ऐसे तमाम खेल संघ हैं जिसमें बीते 12 से 15 सालों से एक ही शख्स का क़ब्ज़ा है.

लेकिन इस पर आईओसी ध्यान नहीं देती. आईओसी के पहले अध्यक्ष पियरे डी क्यूबर्तने अपने पद पर 1896 से 1925 तक बने रहे. इसके बाद 1952 से 1972 तक आईओसी के मुखिया एवरी ब्रुंडागे रहे, जिन्होंने ओलंपिक खेलों में किसी तरह के पेशेवर रवैये का विरोध किया था.

2001 से अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक समिति के मुखिया हैं जैक्स रोगे.

ब्रुडांगे के समय में ही आईओसी ने दो अश्वेत धावकों टॉमी स्मिथ और जॉन कॉर्लोस को निलंबित किया था. उन्होंने 1972 के म्यूनिख़ ओलंपिक में 11 इसराइली एथलीटों की हत्या किए जाने के बाद खेल को जारी रखा था.

उन्होंने नस्लवादी नीतियों को लागू करने वाले रोडेशिया को ओलंपिक से बाहर किए जाने का विरोध किया था और यहां तक की 'टीम खेल' को ख़त्म करने का प्रस्ताव भी रखा था.

आधुनिक समय में जुआन एंटोनियो सामारांच 1980 से 2001 तक आईओसी के अध्यक्ष रहे. उन्होंने आईओसी को सबसे ज़्यादा धनी बनाया. दुर्भाग्य यह रहा कि इसी दौरान आईओसी में भ्रष्टाचार भी काफ़ी बढ़ गया.

2001 से जैक्स रोगे आईओसी के मुखिया हैं और उन्हें सबसे बड़े संकट डोपिंग का सामना करना पड़ रहा है.

पिछले कुछ दशकों से आईओसी अपने क्लब से उन लोगों को बाहर निकालने की कोशिश करता रहा है जो उनके मन मुताबिक़ नहीं है. अगले ओलंपिक खेलों की मेज़बानी के वक़्त वोट देने के लिए सदस्यों को प्रभावित करने के लिए तोहफ़ों के लेन-देन संबंधित ख़बरें और रिपोर्ट भी आती रही हैं.

खिलाड़ी से ज़्यादा खेल संघ की चिंता

बहरहाल, भारत के लिहाज़ से यह वाक़ई में एक दुखद ख़बर तो है. लंदन ओलंपिक खेल को समाप्त हुए अभी महज़ 100 दिन बीते हैं और इस खेल में छह पदकों के साथ हमने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था.

इस प्रदर्शन के बाद उम्मीद बंधी थी कि 2016 और 2020 के ओलंपिक खेलों में हम इससे भी बेहतर करेंगे.

लेकिन मौजूदा स्थिति में भारतीय खेल जगत आगे बढ़ने की कोशिशों पर बात नहीं कर रहा क्योंकि चारों तरफ़ भारतीय ओलंपिक संघ के भविष्य पर चर्चा हो रही है.

ओलंपिक में व्यक्तिगत स्पर्धा में भारत की ओर से पहला गोल्ड मेडल जीतने वाले निशानेबाज़ अभिनव बिंद्रा (जो भारतीय खिलाड़ियों में सबसे ज़्यादा मुखर भी हैं) ने दाग़ी अधिकारियों के फिर से आईओए पर क़ाबिज़ होने की काफ़ी आलोचना की है.

दूसरे एथलीटों के भी ऐसे ही विचार हैं लेकिन वे सामने आकर अपनी बात कहने से हिचक रहे हैं क्योंकि ये अधिकारी उनके करियर से खेल सकते हैं.

ओलिंपिक में गोल्ड मेडल जीत चुके अभिनव बिंद्रा दागी अधिकारियों की वापसी से नाराज हैं.

जिन लोगों को खेल के बारे में बहुत ज़्यादा नहीं मालूम वही यह कह सकते हैं कि सरकार, खेल संघ और आईओए के अधिकारियों ने भारतीय खेल की काफ़ी मदद की है.

यह सही है कि वे प्रभावी लोग होते हैं, लेकिन सुविधाएं तो कॉरपोरेट सेक्टर ही जुटाता है जो खेल को अपने 'कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसबलिटी' के दायरे में मानता है.

खेल संघों में पारदर्शिता की ज़रूरत

हम सरकार की उदारता को भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. इस उदारता के चलते कई तरह के वर्ल्ड चैंपियनशिप, एशियाई चैंपियनशिप, कॉमनवेल्थ और ओलंपिक खेलों के लिए हमारी कई टीमें तैयारी रहती हैं और प्रतियोगिता में हिस्सा ले पाती हैं.

इस लिहाज़ से देखें तो सरकार अगर खेल संघो से पारदर्शिता और जवाबदेही बरतने की मांग कर रही है तो उसकी मांग सही है. क्योंकि वह जो पैसा खेल संघों को दे रही है वह टैक्स देने वाले आम लोगों का पैसा है.

इसलिए सरकार की खेल संघों के अधिकारियों की पद पर बने रहने की अवधि को तय करना चाहती है तो वह तर्कसंगत है.

भारतीय खेल की दुनिया में मुश्किलें कई हैं. हम ओलंपिक आंदोलन में बने रहना चाहते हैं लेकिन हम अपने इन खेल अधिकारियों को नहीं चाहते.

वैसे यहां यह जानना दिलचस्प है कि अगर एक देश अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति से बाहर हो भी जाए तो भी उसके खिलाड़ी ओलंपिक में हिस्सा ले सकते हैं. क्योंकि आईओसी में स्वतंत्र ओलंपिक एथलीटों के हिस्सा लेने की व्यवस्था है.

ये वैसे एथलीट होते हैं जिनके देशों को आईओसी की मान्यता नहीं होती या फिर निलंबित होती है. पहली बार 1992 में 52 एथलीटों ने इस वर्ग के तहत ओलंपिक में हिस्सा लिया था. इसमें यूगोस्लाविया (सर्बिया और मोंटेनेग्रो) और मैकडोनियन गणतंत्र के खिलाड़ी शामिल थे.

लंदन ओलंपिक में चार एथलीट ऐसे वर्ग में शामिल थे, जिनमें एक दक्षिण सूडान का था. ऐसे में 2016 में कोई भारतीय एथलीट इस सूची में हिस्सा लेगा, इसकी उम्मीद कम ही है.

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