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अयोध्या: कैसे बचा हिंदुस्तान हिंदू कट्टरपंथ से

 गुरुवार, 6 दिसंबर, 2012 को 12:03 IST तक के समाचार
बाबरी मस्जिद ढाहने की कोशिश में कारसेवक

इस एक घटना ने भारत की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया

1992 के छह दिसंबर को अयोध्या में हाथों में भगवा झंडा लिए हुए बाबरी मस्जिद के टूटे हुए गुंबद पर खडे कुछ हिंदू युवा बहुत ख़ुश नज़र आ रहे थे लेकिन इस एक तस्वीर ने भारतीय राजनीति को बदल दिया.

ऐसे बुद्धिजीवियों को खोजना मुश्किल नहीं था जो उस समय कह रहे थे कि कट्टरपंथी हिंदुत्व विचारधारा ही भविष्य की राजनीति की दिशा तय करेगी.

हिंदूओं की एक बड़ी संख्या ये कह रही थी कि अगर कट्टरपंथी हिंदू चाहें तो वे स्वतंत्रता के समय जिस विविध और बहुभाषी देश की कल्पना की गई थी उससे बिल्कुल अलग एक नया राष्ट्र बना सकते हैं.

भारत में करोड़ों स्कूली बच्चे हर सुबह गाते हुए सुने जा सकते हैं, ''मैं अपने देश से प्यार करता हूं और इसकी शानदार और विविध परंपरा पर मुझे गर्व है.''

'फ़ासीवाद का ख़तरा'

लेकिन उस घटना के कुछ महीनों बाद भारतीय इतिहासकार सर्वपल्ली गोपाल ने आशंका जताते हुए लिखा था, ''भारत में धर्मनिरपेक्षता का गला घोंट दिया जाएगा और ये देश फ़ासीवाद की तरफ़ बढ़ रहा होगा. जिन मूल्यों के आधार पर आज़ाद भारत की नींव रखी गई थी उनको कमज़ोर करने की कोशिश की जा रही है.''

"भारत में धर्मनिरपेक्षता का गला घोट दिया जाएगा और ये देश फ़ासीवाद की तरफ़ बढ़ रहा होगा. जिन मूल्यों के आधार पर आज़ाद भारत की नींव रखी गई थी उनको कमज़ोर करने की कोशिश की जा रही है."

इतिहासकार सर्वपल्ली गोपाल

बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद इस तरह के डर के कई कारण थे. पूरे भारत में अलग-अलग जगह हुए सांप्रदायिक दंगों में हज़ारों लोग मारे गए जिनमें ज़्यादातर मुसलमान थे.

दुंबई में बैठे माफ़िया सरग़ना भारत के दाऊद इब्राहिम ने मुंबई में बम धमाके करवाए और पाकिस्तान के शहर कराची में अल्पसंख्यक हिंदूओं को निशाना बनाया गया.

उसी समय अंग्रेज़ी के जाने माने लेखक और नोबेल विजेता वीएस नायपॉल ने कहा था कि जिन लोगों ने मस्जिद को तोड़ा था उनके लिए वो भारत की अस्मिता को दोबारा हासिल करने जैसा था.

सांप्रदायिक दंगे

बाबरी विध्वंस के बाद देश के कई इलाक़े में सांप्रदायिक दंगे हुए थे.

नायपॉल ने उस समय कहा था, ''आने वाले वर्षों में मस्जिद के तोड़े जाने को एक महान पल की तरह याद किया जाएगा और संभव है कि इस दिन को राष्ट्रीय अवकाश भी घोषित कर दिया जाए.''

लेकिन सच्चाई तो ये है कि समय बीतने के साथ ही भारतीय राजनीति ने इस तरह की विध्वंसक कार्रवाई को पूरी तरह नकार दिया.

हिंदुत्व बनाम जातिवाद

1992 में भारत में दो राजनीतिक विचारधारा उभर रही थीं. एक तरफ़ हिंदूओं में पिछड़ी जाति के लोग अपने अधिकारों के लिए मुखर हो रहे थे और दूसरी तरफ़ हिंदुत्व के नाम पर हिंदू वोटरों को एक प्लेटफॉर्म पर लाने की कोशिश की जा रही थी.

"आने वाले वर्षों में मस्जिद के तोड़े जाने को एक महान पल की तरह याद किया जाएगा और संभव है कि इस दिन को राष्ट्रीय अवकाश भी घोषित कर दिया जाए."

लेखक वीएस नायपॉल

पिछड़ी जाति के आंदोलन ने तो भारतीय राजनीति में एक क्रांति पैदा कर दी लेकिन चुनावी राजनीति में हिंदुत्व के नाम पर ज़्यादा लाभ नहीं उठाया जा सका.

शायद यही वजह है कि हिंदुत्व के नाम पर राजनीति करने वाले भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और गुजरात के मौजूदा मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अब अपनी ऐसी छवि पेश करना चाहतें हैं कि वो कट्टरपंथी नहीं हैं.

2005 में पाकिस्तान दौरे पर गए आडवाणी ने तो पाकिस्तान के राष्ट्रपिता मोहम्मद अली जिन्ना की ख़ूब तारीफ़ भी की थी जबकि मोदी अपनी छवि को सुधारने के लिए गुजरात के मुसलमानों सें संपर्क साधने की कोशिश कर रहें हैं.

मायावती, मुलायम

हिंदुत्व का लाभ चुनावों में ज़्यादा नहीं हो सका और यूपी में मायावती और मुलायम सिंह जैसे नेताओं का उदय हुआ

चुनावी मैदान में हिंदुत्व की राजनीति हमेशा विफल रही है. साल 2012 के शुरू में उत्तर प्रदेश में हुए विधान सभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने कट्टरपंथी छवि रखने वाली उमा भारती को मैदान में उतारा लेकिन भाजपा की ये चाल बुरी तरह नाकाम रही. यहां तक की अयोध्या की सीट भी भाजपा हार गई.

विकास का मुद्दा

वहां से जीते समाजवादी पार्टी के युवा नेता पवन पांडेय कहते हैं, ''आम आदमी मंदिर-मस्जिद की राजनीति में नहीं पड़ना चाहता. हर आदमी विकास और अच्छी सरकार चाहता है.''

भारत के राजनीतिक मानचित्र पर नज़र दौडाएं तो पता चलता है कि चुनावी मैदान में यहां जाति, क्षेत्र, भाषा जैसे मुद्दे धर्म के मुद्दे पर भारी पड़ते हैं.

"आम आदमी मंदिर-मस्जिद की राजनीति में नहीं पड़ना चाहता. हर आदमी विकास और अच्छी सरकार चाहता है."

पवन पांडेय, अयोध्या से समाजवादी पार्टी के विधायक

भारत की आर्थिक स्थिति में भी काफ़ी बदलाव हुआ है और युवा वर्ग मंदिर-मस्जिद की राजनीति के बजाए पैसे कमाने में ज़्यादा विश्वास रखता है.

जिस तरह की आशंका 1992 में जताई जा रही थी उसके विपरीत आज ऐसे कोई संकेत नहीं मिलते कि कोई इसे धार्मिक या फ़ासीवादी देश बनाना चाहता है.

हैरत की बात तो ये है कि इस्लाम के पुरातात्विक इतिहास को भारत के बजाए सउदी अरब में ज़्यादा ख़तरा है.

सउदी अरब

पिछले 20 वर्षों में सउदी अरब के मक्का और मदीना की कई ऐतिहासिक इमारतों को तोड़ दिया गया है.

मोदी, आडवाणी

मोदी और आडवाणी भी अपनी कट्टरवादी छवि को पिछे छोड़ना चाहते हैं

इस्लाम के आख़िरी पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद की पत्नी ख़दीजा के घर को तोड़कर वहां पर शौचालय बनवा दिया गया है. पैग़ंबर मोहम्मद के पोते की मस्जिद को तोड़ दिया गया, मदीना शहर से थोड़े बाहर बनी पांच ऐतिहासिक मस्जिदों को तोड़ दिया गया है.

सउदी अधिकारियों ने कई मज़ारों और दरगाहों को नष्ट कर दिया है. उनका मानना है कि इस्लाम में इसकी इजाज़त नहीं और फिर इससे मूर्ति पूजा की संभावना बढ़ जाती है.

बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने के 20 वर्षों बाद हिंदू और मुसलमानों के आपसी रिश्ते न तो ख़राब हुए हैं और न अच्छे हुए हैं.

मुसलमान आज भी भेद-भाव के शिकार हैं और सरकारी क्षेत्र में उनकी उपस्थिति बहुत कम है.

सिविल सेवा जैसे क्षेत्रो में तो वे बहुत कम हैं. लेकिन दोनों के बीच के रिश्ते और एक दूसरे पर निर्भरता पहले की तरह बने हुए हैं जिस पर दर असल भारत का निर्माण टिका हुआ है.

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