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वो पाँच मोहरे जो कभी बीजेपी का चेहरा रहे

 शुक्रवार, 30 नवंबर, 2012 को 13:46 IST तक के समाचार

ऐसे कई बड़े नाम हैं जो भारतीय जनता पार्टी छोड़ चुके हैं.

नेताओं का पार्टी छोड़ना, नई पार्टी बनाना और फिर वापस आना कोई नई बात नही है. देखा गया है कि शुरुआत पार्टी के खिलाफ़ बयानबाज़ी से होती है.

पहले अपनी मांगें मनवाने की कोशिश होती है लेकिन मांगे न माने जाने पर ये विद्रोह में बदल जाती है. नेता जोर शोर से नई पार्टी बनाते हैं, पर चंद नेता बड़ी पार्टी छोड़कर अपनी पहचान बनाए रख पाते हैं, पर कुछ गुम हो जाते हैं.

या फिर वो सालों बाद अपनी मूल पार्टी में वापस लौट आते हैं. इस बार येदियुरप्पा ने पार्टी छोड़ी है. जानिए उन पाँच नेताओं के बारे में जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी छोड़ी.

बीएस येदियुरप्पा

कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे बीएस येदियुरप्पा काफी समय से भारतीय जनता पार्टी छोड़ने की धमकी दे रहे थे.

उन्होंने कहा था कि वो इस बारे में अंतिम फैसला दिसम्बर में लेंगे और नई पार्टी बनाएंगे. येदियुरप्पा इस समय भ्रष्टाचार के कई मामलों से जूझ रहे हैं.

उनकी मांग थी कि पार्टी उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री बनाए या फिर राज्य में पार्टी प्रमुख का पद दे. पर पार्टी ने उनकी मांग ठुकरा दी.

चार साल पहले कर्नाटक मे भारतीय जनता पार्टी पहली बार सत्ता में आई थी और येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की कमान सौपी गई थी. लेकिन उन्हें खनन पट्टा आवंटन में रिश्वत लेने का आरोप लगने के बाद पद छोड़ना पड़ा था.

येदियुरप्पा के बाद सदानंद गौड़ा और उनके बाद शेट्टार को मुख्यमंत्री पद की कमान सौपी गई.

उमा भारती

राम मंदिर आंदोलन के अग्रदूतों में से एक रहीं उमा भारती एक समय न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी और हिंदुत्व का चेहरा तो थी हीं बल्कि सामाजिक न्याय का भी प्रतिनिधित्व किया करती थीं.

भारतीय जनता पार्टी की प्रमुख प्रचारकों में से एक रहीं उमा भारती अपने उग्र भाषणों के जरिए बार-बार पार्टी के लिए लोगों के वोट को खींचने का काम करती रहीं.

मध्य प्रदेश में सत्ताधारी कांग्रेस सरकार को बेदखल करने का श्रेय भी उमा भारती को ही जाता है. साल 2003 के चुनावों में भारी जीत हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी की ओर से उमा भारती मध्य-प्रदेश की मुख्यमंत्री बनाई गईं.

उमा भारती को दो बार भारतीय जनता पार्टी से निकाला गया. पहली बार साल 2004 में उन्होंने लाल कृष्ण आडवाणी के खिलाफ बयानबाजी की. हालांकि जल्द ही वर्ष 2005 में उनकी पार्टी में वापसी हो गई.

इसके बाद 2005 के अंत में पार्टी द्वारा शिवराज सिंह चौहान को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री निर्वाचित करने पर उन्होंने फिर भड़काऊ बयान दिए, जिसके कारण उन्हें एक बार से बाहर का रास्ता देखना पड़ा.

उन्होंने भारतीय जनशक्ति पार्टी का गठन किया. हालांकि उनकी यह पार्टी चुनावों में कोई सफल नतीजे हासिल नहीं कर पाई थी.

जून 2011 में उमा भारती को भारतीय जनता पार्टी में दोबारा शामिल कर लिया गया. लगभग छह साल के लंबे अंतराल के बाद उमा भारती की फिर से पार्टी मे वापसी हुई.

इस बार हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में उन्हें प्रभारी बनाया गया था.

कल्याण सिंह

भारतीय जनता पार्टी के सबसे कद्दावर नेताओं मे से एक रहे कल्याण सिंह उस वक्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई थी.

उस वक्त नारा हुआ करता था, अटल, आडवाणी और कल्याण.

पर कल्याण सिंह दो बार भारतीय जनता पार्टी छोड़ चुके हैं. पहली बार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मतभेद के चलते, तो दूसरी बार राज्य में अपनी उपेक्षा का आरोप लगाते हुए.

कल्याण सिंह ने राष्ट्रीय क्रांति पार्टी का गठन किया और राज्य में सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार भी खड़े किए पर उन्हें बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा.

पिछले लोक सभा चुनाव से पहले कल्याण सिंह की धूमधाम से पार्टी में वापसी कराई गई थी, लेकिन चुनाव से ठीक पहले उन्होंने भाजपा का दामन छोड़ कर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव से नजदीकियां बढ़ा ली थी.

अब एक बार फिर से पार्टी में उनकी वापसी की चर्चा गरम हैं, क्योंकि समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद भारतीय जनता पार्टी अपने खोते जनाधार को वापस पाना चाहती है. एक बार मंत्री, तीन बार मुख्‍यमंत्री और दस बार विधायक चुने जा चुके कल्‍याण सिंह की राजनीति आज हिलोरे लेती है यानी कभी इधर तो कभी उधर.

शंकर सिंह वाघेला

एक वक्त वो भी था जब गुजरात में भारतीय जनता पार्टी के नेता शंकर सिंह वाघेला की तूती बोलती थी. वाघेला 1996 से 1997 तक गुजरात के मुख्‍यमंत्री भी रहे चुके हैं. साथ ही केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं.

वे छठी लोकसभा के लिए साल 1977 में चुने गए थे. इसके बाद वाघेला 9वीं, 10वीं के बाद 13वीं और 14 वीं लोकसभा के भी सदस्य रहे हैं.

नरेंद्र मोदी के भारतीय जनता पार्टी में बढ़ते कद के कारण शंकर सिंह वाघेला ने पार्टी छोड़ने का मन बनाया और उसके बाद कांग्रेस का दामन थाम लिया.

हालांकि इसके बाद से उन्‍हें गुजरात में सत्ता के लिए काफी संघर्ष करना पड़ रहा है और साल 2001 से लेकर अभी तक वह विपक्ष में बैठकर प्रदेश की राजनीति में हाथ अजमा रहे हैं.

अगर इस बार गुजरात में कांग्रेस की सरकार आती है तो वाघेला सीएम पद के एक मजबूत उम्‍मीदवार होंगे.

वाघेला कांग्रेस में अकेले ऐसे नेता हैं जो मोदी और भाजपा पर प्रहार करने की क्षमता रखते हैं.

वाघेला पिछला लोकसभा चुनाव में हार गए थे और इस समय राज्य कांग्रेस की चुनाव प्रचार समिति के प्रमुख हैं.

केशू भाई पटेल

नब्बे के दशक में गुजरात में भाजपा के शासन का सूत्रपात करने वाले केशू भाई पटेल मार्च 1995 से अक्टूबर 1995 तक गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके है.

गुजरात के 84 वर्षीय इस लेहुआ पटेल नेता ने इस समय अपना पूरा जीवन नरेन्द्र मोदी को सत्ता से बाहर करने में झोंक रखा है.

एक ज़माने में नरेन्द्र मोदी केशु भाई पटेल के क़रीबी हुआ करते थे. केशुभाई के मुख्यमंत्रित्व काल में नरेन्द्र मोदी के बढ़ते प्रभाव के कारण वाघेला ने विद्रोह किया था.

इसी साल अगस्त महीने में पूर्व केंद्रीय मंत्री कांशीराम राणा के साथ पार्टी से इस्तीफा दे दिया और गुजरात परिवर्तन पार्टी का गठन किया.

केशू भाई पटेल ने ये कहते हुए भारतीय जनता पार्टी को छोड़ा कि मोदी के चलते पार्टी एक व्यक्ति का संगठन बन गई है और भाजपा के सिद्धांतों से दूर चली गई है.

गुजरात में हर कोई मानता है कि इस बार गुजरात चुनावों में केशुभाई अगर किंग-मेकर की भूमिका में हुए तो वो मोदी को हटाने की शर्त पर भाजपा को समर्थन देना पसंद करेंगे.

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