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ज़ी न्यूज़ का लाइसेंस निलंबित करे सरकार: काटजू

 बुधवार, 28 नवंबर, 2012 को 21:03 IST तक के समाचार
नवीन जिंदल

कांग्रेस सांसद और उद्योगपति नवीन जिंदल (दाएं से दूसरे) मामले में शिकायतकर्ता हैं

ज़ी टीवी के दो वरिष्ठ पत्रकारों की उगाही के इलज़ाम में गिरफ़्तारी पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने बीबीसी से कहा कि सरकार को जांच पूरी होने तक ज़ी न्यूज़ का लाइसेंस निलंबित कर देना चाहिए.

इन दो वरिष्ठ पत्रकारों की गिरफ़्तारी के बाद भारतीय पत्रकारिता की नैतिकता पर भी सवाल उठने लगे हैं. जस्टिस काटजू का दावा है कि भारतीय पत्रकारिता में इस समय काफी गंदगी है जिसका सफाया होना ज़रूरी है.

उनका कहना है कि वो प्रेस की आज़ादी के पक्ष में ज़रूर हैं लेकिन प्रेस की अपनी कुछ जिम्मेदारियां भी होनी चाहिए.

"उन्हें पूरी आज़ादी नहीं देनी चाहिए. हमने प्रेस की आज़ादी के लिए खुद आवाज़ उठायी है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं. "

जस्टिस मार्कण्डेय काटजू

काटजू के मुताबिक, "उन्हें पूरी आज़ादी नहीं देनी चाहिए. हमने प्रेस की आज़ादी के लिए खुद आवाज़ उठायी है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं."

ज़ी न्यूज़ के प्रमुख सुधीर चौधरी और ज़ी बिजनेस के प्रमुख समीर अहलूवालिया पर आरोप है कि उन्होंने कांग्रेस सांसद और उद्योगपति नवीन जिंदल के ग्रुप से इस आधार पर 100 करोड़ रुपए मांगे थे कि वो ज़िंदल और कोयला घोटाले को जोड़ कर कोई रिपोर्ट नहीं करेंगे.

ज़ी न्यूज़ प्रबंधन के अनुसार ये गिरफ्तारियां ग़ैर कानूनी हैं और कोयला घोटाले से ध्यान हटाने के लिए यह गिरफ्तारियां की गई हैं. दूसरी तरफ़ दोनों संपादक की जमानत याचिक ख़ारिज हो गई. इसके बाद दिल्ली की एक अदालत ने इन दोनों को दो दिनों की पुलिस रिमांड में भेज दिया है.

जस्टिस काटजू ने कहा कि हाल में उन्होंने प्रधानमंत्री और बाद में भारतीय जनता की नेता सुषमा स्वराज को सलाह दी थी कि वो प्रेस काउंसिल की जगह मीडिया काउंसिल का गठन करें जिसको सज़ा देने का अधिकार हो. इस परिषद में प्रेस के सदस्यों का बहुमत हो तो मीडिया को व्यवस्थित किया जा सकता है.

उन्होंने कहा, "प्रधानमंत्री ने कहा वो इस पर गौर करेंगे लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ है. पता नहीं क्यूँ"

उनका कहना है कि मीडिया की छवि पर बुरा असर पड़ा है. लेकिन इसे ठीक किया जा सकता है. "मीडिया को कंट्रोल करना ग़लत होगा, इस पर निगरानी रखने की ज़रुरत है."

इन आरोपों का फैसला तो अब अदालत क़रेगी, लेकिन सवाल ये है कि क्या इन गिरफ्तारियों से भारतीय पत्रकारिता की छवि ख़राब होती है?

'असामान्य मामला'

"ये एक अकेला केस है. भारतीय पत्रकारिता में ऐसा नहीं होता. हमारी समिति की रिपोर्ट के बाद सुधीर चौधरी को संगठन के खजांची पद से ही नहीं बल्कि उसकी सदस्यता से भी हटा दिया गया है."

राष्ट्रीय प्रसारक संघ के महासचिव एनके सिंह

राष्ट्रीय प्रसारक संघ के महासचिव एनके सिंह कहते हैं ये एक असामान्य मामला है. "ये एक एक अकेला ममला है. भारतीय पत्रकारिता में ऐसा नहीं होता है. "

एनके सिंह के अनुसार उनके संगठन ने इस इलज़ाम के तुरंत बाद कदम उठाया और एक समिति का गठन किया. उन्होंने कहा, ''समिति की रिपोर्ट के बाद सुधीर चौधरी को संगठन के खजांची पद से ही नहीं बल्कि इसकी सदस्यता से भी हटा दिया गया.''

उन्होंने यह स्वीकार किया कि इन गिरफ्तारियों से टीवी पत्रकारों पर प्रशन चिन्ह ज़रूर लगेंगे लेकिन उन्होंने आश्वासन दिया कि वो ऐसे कई क़दम उठा रहे हैं जिससे इस तरह के मामले दोबारा न हों सकें.

उन्होंने कहा, "हम अपने ऊपर खुद निगरानी रखने के लिए ऐसे क़दम उठा रहे हैं जो यूरोपी देशों में भी नहीं हैं. हम चाहते हैं कि हमारे मामलों में सरकार का हस्तक्षेप कम हो."

चैनल का समर्थन

गिरफ्तार होने वाले पत्रकारों को उनके चैनल का पूरा समर्थन है. ज़ी न्यूज़ लिमिटेड के प्रमुख अलोक अग्रवाल ने बुधवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि जिंदल ग्रुप द्वारा सीडी के कुछ अंश ही जारी किए गए हैं.

जस्टिस मार्कण्डेय काटजू

जस्टिस मार्कण्डेय काटजू का कहना है कि इस मामले से मीडिया की छवि पर बुरा असर पड़ा है

वह इस बात से इनकार नहीं करते कि उनके पत्रकार जिंदल से मिले थे लेकिन पांच से छह घंटे चलने वाली इस मुलाक़ात के दौरान दोनों ने रिश्वत की मांग बिलकुल नहीं की बल्कि जिंदल ने इन पत्रकारों को रिश्वत देनी चाही.

उल्लेखनीय है कि जब सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया इस बारे में जिंदल ग्रुप के साथ बात कर रहे थे तब ज़िंदल ग्रुप ने उनकी एक सीडी बना ली थी.

क्या है सीडी में

इस सीडी में कथित तौर पर दिखाया गया था कि ये पत्रकार पैसों की मांग कर रहे थे और कह रहे थे कि अगर उन्हें ये पैसा मिला तो वो जिंदल ग्रुप के बारे में नकारात्मक खबरें नहीं करेंगे.

दोनों पत्रकारों ने भी अपने खिलाफ इलज़ाम को ग़लत बताया है. लेकिन क्या जांच जारी रहने तक इन्हें अपने पद से अलग हो जाना चाहिए.

एनके सिंह कहते हैं उनकी इस पर राय ये है कि ये फैसला व्यक्तिगत होगा और उनका संगठन उसके लिए उन पर दबाव नहीं डाल सकता.

हकीकत कुछ भी हो विशेषज्ञ कहते हैं कि पिछले कुछ सालों से आम धारणा बनती जा रही है कि कई पत्रकार बिकाऊ होते जा रहे हैं, ख़ास तौर से छोटे शहरों में. इन गिरफ्तारियों से इस धारणा को और बल मिल सकता है.

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