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भारत-पाक के बीच सेतु थे गुजराल

 शुक्रवार, 30 नवंबर, 2012 को 16:09 IST तक के समाचार
इंदर कुमार गुजराल

गुजराल विदेश मामलों पर अपनी समझ और घरेलू समस्याओं के समाधान के प्रति नज़रिए के लिए हमेशा याद किया जाएगा

इंदर कुमार गुजराल के निधन के साथ ही देश ने भारत और पाकिस्तान के बीच एक सेतु खो दिया है.

गुजराल ने दोनों देशों के लोगों के बीच सम्पर्क बढ़ाने के लिए काम किया.

उनका पाकिस्तान के नेताओं, वहां के जानेमाने विद्वानों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से घनिष्ठ सम्पर्क था.

गुजराल छोटे-छोटे से कार्यक्रम के बहाने पाकिस्तान का दौरा करते थे क्योंकि इसके जरिए वे वहां के आम लोगों से मुलाक़ात कर पाते थे.

दोनों देशों के बीच संबंधों को बेहतर बनाने की दिशा में उनकी गैर-मौज़ूदगी बहुत खलेगी.

बांग्लादेश और गुजराल

गुजराल के निधन का शोक बांग्लादेश में भी महसूस किया जाएगा क्योंकि वे बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में वहां के लोगों के साथ पहले दिन से जुड़े हुए थे.

वैसे तो पाकिस्तान और बांग्लादेश एक दूसरे के विरोधी रहे हैं लेकिन फिर भी दोनों ही मुल्क महसूस करते हैं कि गुजराल उनके करीबी मित्र थे.

विदेश मंत्री के तौर पर उनकी गुजराल-डॉक्ट्रिन को हमेशा याद किया जाएगा. उन्होंने भारत के खर्चे पर पड़ोसी मुल्कों को रियायतें दीं ताकि उनसे संबंधों में निकटता बढ़ाई जा सके.

इसके साथ ही उन्होंने ये साबित भी कर दिया कि भारत समय आने पर अपने पड़ोसियों की जरूरतें भी पूरा कर सकता है.

भावनात्मक लगाव

पड़ोसी मुल्क से साथ उनकी इन भावनाओं की जड़ें बहुत गहरी हैं.

उनके पिता अवतार नारायण गुजराल पाकिस्तान की संविधान सभा के सदस्य थे और वे अपने पिता के सहायक के तौर पर काम करते थे.

अविभाजित पंजाब के तमाम विधायकों ने उन्हें संविधान सभा के लिए नामित किया था.

उन्होंने मुझे बताया कि अल्पसंख्यकों के संबंध में प्रावधानों के लिए कैसे उनकी मुलाकात पाकिस्तान के संस्थापक क़ायदे-आज़म मोहम्मद अली जिन्ना से हुई.

अल्पसंख्यकों के प्रति गुजराल के योगदान को इस पृष्ठभूमि में देखा जा सकता है.

सिख समुदाय के प्रतिनिधि के तौर पर अकालियों को सरकार के करीब लाने के लिए उन्होंने 'पंजाब-ग्रुप' का गठन किया.

इसी तरह 'कश्मीर-ग्रुप' भी उन्हीं की पहल थी. कश्मीरियों पर हुआ अत्याचार उन्होंने उजागर किया.

कांग्रेस छोड़ी

इस प्रक्रिया में वे सरकार में अलग-थलग पड़ गए. चार दशक से ज्यादा समय तक कांग्रेस में रहने के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ना बेहतर समझा.

कांग्रेस से उनके दूर होने की शुरुआत आपातकाल के दौरान हुई. तब वे सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे. संजय गांधी सरकार में कहीं किसी पद पर नहीं थे और उन्होंने गुजराल को फोन करके आदेश दिया कि मीडिया से कैसे निपटना है.

गुजराल चुप रहने वाले नहीं थे, उन्हें संजय गांधी को पलटकर जबाव दे दिया.

इंदिरा गांधी ने गुजराल को पहले योजना आयोग दौड़ाया और फिर भारत का राजदूत बनाकर मॉस्को भेज दिया.

पहले कांग्रेस और फिर जनता पार्टी की सरकार में गुजराल वहां लम्बे समय तक रहे.

प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने गुजराल से आग्रह किया था कि वे इस पद पर बने रहें क्योंकि उन्होंने तत्कालीन सोवियत यूनियन और भारत को एक-दूसरे के करीब लाने की दिशा में अच्छा कार्य किया था.

कालों की पीड़ा का अनुभव

अक्तूबर 1977 में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका और मिस्र की यात्रा की. वे पीटरमेरिट्ज़बर्ग रेलवे स्टेशन भी गए थे जहां गांधी जी को रेल के पहले दर्जे से उतार दिया गया था.

वे इन दौरों के जरिए उस देश को देखना चाहते थे जहां गांधी जी ने अपना सत्याग्रह का प्रयोग किया था.

दक्षिण अफ्रीका के विभिन्न हिस्सों में घूमते हुए, खासतौर पर दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने महसूस किया कि यहां काले लोग अभी भी हाशिए पर हैं.

सच्चाई यही थी कि भेदभाव कहने को खत्म हो गया था और राजनीतिक सत्ता कालों के हाथ में आ गई थी, लेकिन हकीकत ये थी कि गोरे और काले यहां दो अलग-अलग दुनिया में रह रहे थे.

नेल्सन मंडेला से मुलाकात एक यादगार पल था. गुजराल के सम्मान में भोज का आयोजन किया गया था जहां मंडेला खुद को झूमने से नहीं रोक सके थे.

संवैधानिक संकट

गुजराल जब इस राजकीय दौर पर थे, भारत में संवैधानिक संकट उनकी राह देख रहा था.

तत्कालीन सीबीआई निदेशक जोगिंदर सिंह बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को गिरफ्तार करने के लिए प्रतिबद्ध थे क्योंकि पुलिस उपायुक्त ने उन्हें गिरफ्तार करने से इनकार कर दिया था.

वेतन आयोग की अनुशंसा पर सरकारी कर्मचारियों को गुजराल की तरफ से मिला तोहफा सरकारी खज़ाने के लिए भारी बोझ साबित हुआ क्योंकि भारत की आर्थिक सेहत उस समय बहुत अच्छी नहीं थी.

नौकरशाहों की तनख्वाह में 30 प्रतिशत कटौती और इस तरह की अन्य सिफारिशों को गुजराल मान लेते तो सरकारी खज़ाने के लिए कुछ संतुलन की स्थिति निर्मित हो सकती थी.

गुजराल पर ट्रेड यूनियनों और वाम दलों का भारी दबाव था. वेतन में बढ़ोत्तरी ने केंद्रीय बजट गड़बड़ा दिया और राज्यों के लिए इसका अनुसरण करना क्षमता से परे था.

प्रधानमंत्री के तौर पर उनका एक वर्ष का कार्यकाल बहुत ज्यादा नहीं कहा जा सकता लेकिन अपने पड़ोसी मुल्कों के साथ संबंधों पर उन्होंने जो असर छोड़ा, उसने उन्होंने नेताओं की कतार में सबसे अलग खड़ा दिया.

गुजराल को न केवल विदेश मामलों पर अपनी समझ बल्कि घरेलू समस्याओं का समाधान के प्रति नज़रिए के लिए भी हमेशा याद किया जाएगा.

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