मीडिया की स्वतंत्रता के मामले में भारत फिसड्डी

  • 21 नवंबर 2012
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सोशल मीडिया पर अंकुश की लगातार बढ़ रही है कोशिश.

भारत में मीडिया की स्वतंत्रता पर अंकुश बढ़ता जा रहा है. बीते दो-तीन साल में यह मीडिया पर अंकुश लगातार बढ़ा है. यह मीडिया की अंतरराष्ट्रीय संस्था रिपोर्टर्स बिदाउट बॉर्डर (आरडब्ल्यूबी) की इस साल की रिपोर्ट यही बता रही है.

आरडब्ल्यूबी की साल 2012 की प्रेस फ्रीडम इंडेक्स (मीडिया स्वतंत्रता सूचकांक) के मुताबिक मीडिया की स्वतंत्रता के मसले पर भारत दुनिया भर में 131वें स्थान पर है. इस मामले में भारत अफ़्रीकी देश बरूंडी से नीचे और अंगोला से ठीक उपर है.2009 में इस सूचकांक में भारत 105वें और 2010 में 122वें स्थान पर मौजूद था.

वहीं इंटरनेटीय स्वतंत्रता के लिहाज से भी भारत की स्थिति कोई बेहतर नहीं है. भारत इस मसले पर अर्जेंटीना, दक्षिण अफ़्रीका और उक्रेन जैसे देशों से पीछे है.

दुनिया के सबसे बडे़ लोकतंत्र में मीडिया और आम लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगातार बढ़ रहा है. इसका पता हाल ही में बाल ठाकरे के निधन के बाद नजर आया. जब मुंबई की दो लड़कियों को सोशल मीडिया के सहारे अपनी अभिव्यक्ति जताने पर प्रशासन का कोपभाजन बनना पड़ा.

लगातार बढ़ रहा है अंकुश

आरडब्लूबी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में इंटरनेट पर अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाने की कोशिशें लगातार बढ़ रही है. वेबसाइट गूगल ट्रांसपरेंसी के मुताबिक भारत सरकार ने जुलाई से लेकर दिसंबर, 2010 के बीच कई बार यूट्यूब और अन्य ब्लॉगों पर मौजूद जुलाई करीब 282 कंटेंट (इनमें ज़्यादातर राजनेताओं के मजाक उड़ाने वाले वीडियो शामिल हैं) को हटाने के लिए कहा है. आरडब्लूबी की रिपोर्ट के मुताबिक गूगल ने इनमें से 22 फ़ीसदी वीडियो को हटाया है.

इंटरनेटीय स्वतंत्रता पर आयी फ्रीडम हाउस 2012 की एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बेव माध्यमों पर आंशिक स्वतंत्रता ही है. जबकि अमरीका, ब्राजील, अर्जेंटीना, दक्षिण अफ़्रीका और ऑस्ट्रेलिया इस मामले में पूरी तरह की आजादी देने वाले देश हैं.

आरडब्ल्यूबी के मुताबिक 2008 के मुंबई हमले के बाद भारतीय अधिकारियों ने इंटरनेट पर मौजूद सामाग्रियों पर नकेल कसने की कवायद बढ़ा दी है, जबकि वह सार्वजनिक तौर पर किसी भी तरह की सेंशरशिप का विरोध करता रहा है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के नाम पर इंटरनेट पर अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ति करने वाले लोगों की निजता दोनों को कमतर महत्व दिया जा रहा है.

सूचकांक पर उठते सवाल

हालांकि इस रैंकिंग को लेकर एक नयी बहस भी शुरू हो गई है. प्रेस की आजादी सूचकांक पर जैमका, नामिबिया और माली पहले 25 स्थानों में शामिल हैं, जबकि पापुआ न्यू गिनी, घाना और बोत्सवाना पहले 50 देशों में जगह बनाने में कामयाब रहे. जबकि अमरीका 47वें स्थान पर है.

ऐसे में ये सवाल उठ रहा है कि क्या माली और पापुया न्यू गिनी का मीडिया अमरीका और भारत के मुकाबले कहीं ज़्यादा स्वतंत्र है. हकीकत इसके उलट है. ऐसे में इस रैकिंग की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं.

हालांकि इस सूचकांक को कई पहलूओं के आधार पर तैयार किया जाता है, जिसमें सीधे पत्रकारों और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले लोगों से सीधे सवाल पूछे जाते हैं कि उनकी स्वतंत्रता का कब कब उल्लंघन हुआ है. इसमें प्रत्येक देशों के सेल्फ़ सेंशरशिप को भी आंका जाता है.

मीडिया किसी मुद्दे की छानबीन कहां तक करती है और सरकार की आलोचना कहां तक करती है, ये दोनों मुद्दे भी रैंकिंग तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं. कारपोरेट और वित्तीय दबाव का भी ख्याल रखा जाता है.

इस रैंकिंग को तैयार करने के दौरान मीडिया के लीगल फ्रेम वर्क और सार्वजनिक मीडिया की स्वतंत्रता को भी आंका जाता है. हालांकि रिपोर्ट जारी करने वाली संस्था ने कहा है कि इस सूचकांक को देश की मीडिया की गुणवत्ता का पैमाना नहीं माना जाए.

बावजूद इसके रैंकिंग में भारत की स्थिति निराश करने वाली हैं. देश के अंदर मीडिया पर अंकुश लगाने की कोशिशें भी लगातार बढ़ रही हैं.