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विभाजन के बाद का पागलपन इधर भी, उधर भी

 मंगलवार, 20 नवंबर, 2012 को 11:35 IST तक के समाचार
विभाजन

विभाजन भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है

आप सआदत हसन मंटो की रचना 'टोबा टेक सिंह' से वाकिफ होंगे जो लाहौर मेंटल अस्पताल के एक बज़ुर्ग सिख मरीज़ की कहानी है.

कहानी में विभाजन के समय साफ हो जाता है कि केवल लोगों या ज़मीन का विभाजन नहीं होगा बल्कि मानसिक रोगियों का भी विभाजन होगा. इस मरीज़ की हालत की तुलना अक्सर हकीकत से की जाती है.

मंटो के जन्मशती वर्ष में दिल्ली के सीएसडीएस सेमीनार हॉल में सोमवार को एक गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका शीर्षक था 'द पार्टीशन ऑफ मैडनेस एंड द मैडनेस ऑफ पार्टीशन' यानी 'पागलपन का विभाजन और विभाजन का पागलपन'

उद्देश्य था उन सभी पागलखानों के बारे में जानना जिनका विभाजन हुआ, 'पागलपन' की कहानियों की बात करना और जानना कि इनका समाज पर क्या असर हुआ और समाज का इन मानसिक तौर पर बीमार लोगों के प्रति क्या रवैया था.

कहां गए वो लोग?

पंजाब के लुधियाना से आए मनोरोग चिकित्सक डॉ अनिरुद्ध काला ने बताया कि विभाजन से पहले भारत में 30 मनोचिकित्सालय थे जिनमें से विभाजन के बाद 27 भारत के हिस्से आए और बाकी तीन पाकिस्तान के.

लंबे पत्राचार के बाद दिसंबर 1950 में 450 ग़ैर मुसलमान मरीज़ों को पाकिस्तान के तीन अस्पतालों से भारत भेजा गया.

"संभव है ये लोग लेबल कर दिए होंगे कि उन्हें पाकिस्तान या भारत भेजा जाना हैं. लोग अलग अलग धर्मों से थे और फिर बाहर से मिलने वाली खबरों से यहां भी लोग उत्तेजित होते थे"

मनोरोग चिकित्सक अनिरुद्ध काला

ऐसे ही भारत के अस्पतालों से 233 मुसलमान मरीज़ों को पाकिस्तान में लाहौर भेजा गया.

भारत सरकार ने उस समय आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में गैर मुसलमान मरीज़ लापरवाही की वजह से विभाजन के बाद ही मारे गए.

एक भारतीय अधिकारी ने लिखा कि लाहौर के अस्पताल में 650 मरीज़ थे लेकिन वहां से केवल 317 ही आए.

अस्पतालों में क्या हुआ?

बीबीसी से बातचीत में डॉ काला ने कहा, ''पहली बात यह कि जितनी संख्या में लोग लाहौर से आए इसके दोगुनी संख्या में लोग आने चाहिए थे. आधे से ज्यादा लोग इन तीन सालों में मारे गए. किसी भी अस्पताल में ऐसा नहीं होता.''

''इतने वर्षों के बाद जो शहरों में हुआ वो शर्मनाक तो है लेकिन जो अस्पतालों में हुआ वो और भी ज़्यादा शर्मनाक है. हमें गौर करना होगा कि ऐसी लापरवाही कभी न हो.''

आखिर क्या हुआ होगा? इस सवाल पर डॉ काला बताते हैं, ''संभव है ये लोग लेबल कर दिए होंगे कि उन्हें पाकिस्तान या भारत भेजा जाना हैं. लोग अलग अलग धर्मों से थे और फिर बाहर से मिलने वाली खबरों से यहां भी लोग उत्तेजित होते थे.''

वो कहते हैं, ''ये लोग बूढ़ों और छोटे बच्चों की तरह होते हैं जो दूसरों पर निर्भर होते हैं. इन्हें मारने की ज़रूरत नहीं होती. इन पर आप ज़रा सा भी कम ध्यान दें तो ये मर जाएंगे.''

जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी की संयुक्त प्रोफेसर मोशमी बासु ने भारत और पाकिस्तान की बजाय यूगोस्लाविया का उदाहरण दिया कि वहां पर कैसे 1990 के दशक में लोगों को चुन चुन कर मारा गया.

इस चर्चा में कई सवाल उठाए गए जिनके जवाब इतने सालों बाद भी मिलने मुश्किल हैं. इनके बारे में कुछ कर पाना भी बहुत कठिन है.

लेकिन जैसा कि कई वक्ताओं ने कहा कि ऐसे कदम ज़रूर उठाने होंगे ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि ऐसा कुछ दोबारा न हो.

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