कांग्रेस की लाचारगी का नाम राहुल गाँधी?

  • 17 नवंबर 2012
राहुल गाँधी

राहुल गाँधी को कांग्रेस की चुनाव समन्वय समिति का सर्वेसर्वा बनाना कॉंग्रेस के सामने आखिरी चारा था. राहुल गांधी को मजबूरी कहना एकदम आसान नहीं है. उनकी पूरी पार्टी में ऐसा और कोई नहीं है जिसको राहुल से बेहतर उम्मीदवार बताया जा सके.

कांग्रेस पार्टी दो बार से सरकार चला रहे बुजुर्ग प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के चेहरे के साथ चुनाव में नहीं उतर सकती थे. ना ही उसके पास दूसरा कोई ऐसा नेता है जिसको आगे रख कर वो चुनाव के मैदान में आगे जा सके.

यह देर से हुई घोषणा है पर इसकी उम्मीद सबको लंबे समय से थी. लेकिन इस घोषणा भर से कॉंग्रेस को कोई लाभ मिलेगा....मुझे इसकी कोई संभावना नहीं नज़र आती.

इन्हें नहीं कोई और, उन्हें नहीं कोई ठौर

जो लोग राहुल गाँधी के बिहार और उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन की बात कर उनकी नई ज़िम्मेदारी से तुलना कर रहे हैं वो मुझे ठीक नहीं लगता.

एक तो इसलिए क्योंकि वो राज्यों के चुनाव थे. दूसरा उन राज्यों में पार्टी की हालत इतनी बुरी थी कि राहुल गाँधी की जगह कोई भी नेता होता तो पार्टी का यही हश्र होना तय था. इस मामले में तो राहुल गाँधी किसी दूसरे नेता से कमतर साबित हुए हों यह तो नहीं कहा जा सकता.

आज की तारीख़ में राहुल गांधी भले ही बहुत अच्छे नहीं साबित हुए हों लेकिन कॉंग्रेस की नैया के लिए सबसे बेहतर खेवनहार वही हैं.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने अभी तक कोई ज़िम्मेदारी सीधे अपने कन्धों पर नहीं ली है और इस नए पद के साथ यह पहली बार होगा कि कॉंग्रेस के चुनाव से जुड़ी हर चीज़ का ज़िम्मा उन पर होगा.

अगर वो अपनी ज़िम्मेदारी को पूरी तरह निभाना चाहते हैं तो उनकी पार्टी को उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करना होगा. आज तक उन्होंने कोई ज़िम्मेदारी नहीं ओढ़ी है और इसका खामियाजा पार्टी ने भुगता है. यही उत्तर प्रदेश में पार्टी के खराब प्रदर्शन की सबसे बड़ी वजह थी.

आम 42 साला अंग्रेजीदां

राहुल गाँधी के व्यक्तित्व की बात करें तो उनका चीज़ों को सुलझाने का तरीका अब तक बड़ा व्यापारिक प्रबंधन वाला रहा है. भारतीय राजनीति कोई व्यापार जगत की तरह नहीं है जहाँ मौजूदा संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल आपका लाभ बढ़ा देता हो.

यहाँ ज़मीनी हकीकत को समझना ज़रूरी होता है और यह राहुल गाँधी ने अब तक किया नहीं है.

एक बात और है कि गाँधी इस भूमिका में हैं यह महज़ इसलिए नहीं की पार्टी वंशवाद की चपेट में है. दरअसल कॉंग्रेस पार्टी नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी के नेतृत्व में चुनाव लड़ कर यह देख चुकी है कि अगर उनके आगे कोई नेहरु गाँधी परिवार का सदस्य ना हो तो जनता उनका साथ नहीं देती.

राहुल गाँधी 42 साल के बड़े ही सामान्य से अंग्रेज़ी बोलने वाले किसी भी अन्य उच्च वर्गीय आदमी की तरह हैं जिसका भारत की ज़मीनी हक़ीक़त से कोई ख़ास जुड़ाव नहीं है.

अब राहुल गाँधी चूंकि चुनाव समन्वय समिति के प्रमुख बन गए हैं तो उन्हें चुनाव में जाने के पहले कुछ मुद्दों का निपटारा करना होगा, खास तौर पर भ्रष्टाचार के मुद्दे का. अब तक जब भी इस मुद्दे पर बात उठती है तो कॉंग्रेस या तो इस पर बात नहीं करती या फिर शशि थरूर जैसे लोगों को दोबारा मंत्री बना देती है.

आम लोगों में उनके इस रुख पर बड़ा गुस्सा है. राहुल गांधी को यह समझना होगा और यही शायद उनकी पहली और सबसे बड़ी चुनौती है.

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