कैसा होता है अल्ज़ाइमर के साथ जीना?

  • 20 नवंबर 2012
अलज़ाईमर सेंटर

मुझे आजकल नाम भूलने की आदत सी हो गई है. लोगों का चेहरा तो याद रहता है पर नाम भूल जाती हूं.

पहले मैंने इस पर ध्यान नहीं दिया, फिर एक दिन कहीं पढ़ने को मिला कि लगातार चीज़ें भूलना अल्ज़ाइमर का लक्षण है. मैं भागे-भागे डॉक्टर के पास गई. वहां उन्होंने मुझे बताया कि ज्य़ादा काम और व्यस्तता के कारण मैं थकान की शिकार हूं.

खुशी की बात ये है कि मुझे अल्ज़ाइमर नहीं है.

तभी मेरी एक दोस्त ने कहा कि दक्षिणी दिल्ली के तुग़लकाबाद एक्सटेंशन इलाके में अल्ज़ाइमर के मरीज़ों के लिए एक डे-केयर होम है जहां उनकी देखभाल की जाती है.

और मैं पहुंच गई तुग़लकाबाद स्थित 'एआरडीएसआई' यानी 'अल्ज़ाइमर एंड रिलेटेड डिसऑर्डर्स सोसायटी ऑफ इंडिया' के डे-केयर सेंटर पर.

डे-केयर

डे-केयर सेंटर का माहौल बिल्कुल वैसा नहीं था जैसा मैंने सोचा था. एक टेबल पर दो बुज़ुर्ग बैठे थे, जिन्हें 20-22 की उम्र के दो लड़के कैरम खेलना सिखा रहे थे.

इनमें से एक 79 वर्षीय विदेश सेवा में पूर्व अधिकारी शिवशरण दास गुप्ता और दूसरे रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी आशीष मित्रा थे.

मिसेज़ डावर
मिसेज़ डावर जीवन भर कॉलेज में शिक्षिका रहीं हैं लेकिन अब वे पहली की किताब भी नहीं पढ़ पातीं

गुप्ता रिटायर होने के बाद नैचरोपैथी क्लीनिक चलाने लगे. उनके काम में उनकी बेटी नीरू अग्रवाल भी साथ दिया करती थी.

नीरू बताती हैं कि एक दिन उनके पिता मरीज़ की पर्ची में दवाई का नाम नहीं लिख पाए. बेटी को लगा थकान है, आराम करेंगे तो ठीक हो जाएगा.

उसी रात गुप्ता ने अपनी बेटी से रात का खाना खाने के बाद दोबारा खाना मांगा और उन्होंने नीरू से कहा कि उन्हें खाना क्यों नहीं दिया गया है?

नीरू खुद भी डॉक्टर हैं, इसलिए पिता को तुरंत न्यूरोलॉजिस्ट के पास ले गईं जहां उन्हें पता चला कि उनके पिता माइल्ड स्टेज की अल्ज़ाइमर से पीड़ित हैं.

शिवशरण गुप्ता पूरी दुनिया घूम चुके हैं जो वो भूले नहीं हैं लेकिन उन्हें उन जगहों के नाम याद नहीं है. उन्हें ये भी याद है कि नीरू उनकी बेटी है और ये भी कि उनका खुद पर पूरी तरह से नियंत्रण नहीं है.

वो जानते हैं कि वो कुछ भूल रहे हैं पर क्या, ये नहीं पता.

वे खाना खाकर भूल जाते हैं. घर के बाहर अकेले जाने से डरते हैं, फोन कैसे डायल करते हैं, ये भी भूल चुके हैं.

नीरू कहती हैं कि उनकी दुनिया बदल चुकी है.

यादों की भूलभुयैला

यहीं मेरी मुलाकात 88 साल की श्रीमती डावर से हुई. वो टीचर रहीं हैं. वे कॉलेज के छात्रों को अंग्रेज़ी और राजनीतिक विज्ञान पढ़ाया करती थीं. पढ़ना उन्हें अब भी पसंद है लेकिन अब वो पहली क्लास की किताबें भी बमुश्किल पढ़ पाती हैं.

डावर अब कठिन शब्दों को नहीं पहचान पातीं. अपनी बेटी को बहन सावित्री समझती हैं. लेकिन आज भी उन्हें कपड़े मैच करके पहनने का शौक है.

अल्ज़ाईमर
नीरू जानती हैं कि उनके पिता को विशेष देखभाल की जरूरत है

डावर और गुप्ता दोनों ही माईल्ड स्टेज के अल्ज़ाइमर से पीड़ित हैं. इसलिए फिलहाल पूरी तरह से किसी और पर निर्भर नहीं है.

लेकिन संतोष कनौड़िया को उनके पति रोज़ इस डे-केयर सेंटर में लाते हैं. वो कहते हैं कि जितनी देर संतोष यहां रहती हैं उतनी ही देर वो जगी रहती हैं, घर पर पूरे समय वो सोती हैं.

संतोष को पहले टीबी और हृदय की बीमारी थी. उनका गॉलब्लैडर भी सूख गया जिस कारण वे बीमार रहती थीं. एक-दो बार वो घर पर गिरीं भी, जिससे उनके सिर पर चोट लगी और सिर पर खून जम गया.

इस बीच उनका बेटा मां-बाप से अलग हो गया. इस आघात ने संतोष कनौड़िया को कुछ भी सोचने समझने लायक नहीं छोड़ा.

आज अगर वे धुले कपड़ों को तह लगा लें तो काफी है. वरना उन्हें ये भी याद नहीं रहता कि दिन है या रात.

संतोष के पति कहते हैं, ''वे दिन भर सोती हैं और जितनी बार जगती हैं उनके लिए एक नया दिन होता है. नए दिन के हिसाब से ही उनके क्रिया कलाप शुरू हो जाते हैं. मसलन ब्रश करना, नहाना, शौच के लिए जाना और नाश्ता करना.''

देखभाल की दरकार

एआरडीएसआई में स्वयंसेवी के तौर काम कर रहीं रेणु वोहरा बताती हैं कि उनके पास एक ऐसी मरीज़ आईं जो सिर्फ एक शब्द बोलती थीं, ढाका और लगातार रोती थीं. उनके शब्दकोश में हर चीज़ और भाव के लिए एक शब्द था ढाका.

वो बताती हैं, "यही सबसे बड़ी चुनौती होती है. ऐसे समय में हमें अपनी बॉडी लैंग्वेज का सहारा लेना चाहिए. क्योंकि अल्ज़ाइमर के मरीज़ मुस्कुराना नहीं भूलते, हंसना नहीं भूलते, हाथ के इशारे समझते हैं और आखों की भाषा भी."

वो एक बच्चे की तरह पूरी तरह आप पर निर्भर होते हैं.

एम्स में न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. मंजरी कहती हैं कि अल्ज़ाइमर धीरे से आने वाली बीमारी है. कई बार एक मरीज़ को थर्ड स्टेज के अल्ज़ाइमर तक पहुंचने के लिए दो साल का भी वक्त लग जाता है.

लेकिन कई ऐसे उपाय हैं जिनसे बुज़ुर्गों में इस बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है. इनमें उन्हें पूरा समय देना, संयुक्त परिवार का होना और घर में बच्चे और पालतू जानवर का होना शामिल है.

बढ़ती उम्र को तो रोका नहीं जा सकता है लेकिन अगर बुज़ुर्गों का ख़्याल रखा जाए, तो इस बीमारी को बढ़ने से काफी हद तक रोका जा सकता है.

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