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भारत के माधव चौहान को 'शिक्षा का नोबेल'

 मंगलवार, 13 नवंबर, 2012 को 16:50 IST तक के समाचार
माधव चौहान

माधव चौहान ने मुंबई की झोपड़पट्टियों से अपना काम शुरू किया था

भारत के लाखों ग़रीब परिवारों को शिक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले माधव चौहान को अंतरराष्ट्रीय शिक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़े पुरस्कारों में से एक वाइज पुरस्कार से सम्मानित किया है.

इस पुरस्कार को शिक्षा के क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार माना जाता है. क़तर में हुए वाइज सम्मेलन में उन्हें ये पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई.

मुंबई की झोपड़पट्टियों में रहने वाले लोगों के लिए शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के कारण माधव चौहान को ये सम्मान मिला है.

डॉक्टर चौहान ने न सिर्फ़ ग़रीब बच्चों बल्कि पिछड़े वयस्कों को भी शिक्षित करने की कोशिश की. इस पुरस्कार के तहत उन्हें पाँच लाख डॉलर की इनामी राशि दी गई है.

पुरस्कार स्वीकार करते हुए माधव चौहान ने कहा, "अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है."

सराहना

इस पुरस्कार के विजेता का फ़ैसला एक अंतरराष्ट्रीय जूरी करती है. इस जूरी में यूएस लाइब्रेरियन ऑफ़ कांग्रेस डॉक्टर जेम्स बिलिंगटन, पेकिंग यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष प्रोफेसर जोऊ कीफेंग, पूर्व संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त मैरी रॉबिन्सन और वाइज के चेयरमैन डॉक्टर अब्दुल्ला बिन अली अल थानी शामिल थे.

इस पुरस्कार की घोषणा क़तर की राजधानी दोहा में हुए सम्मेलन के दौरान हुई. इस सम्मेलन में डावोस की तरह प्लेटफ़ॉर्म देने की कोशिश की जा रही है, जिसमें विचार-विमर्श के साथ-साथ कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं ताकि शिक्षा के क्षेत्र में सुधार और नई कोशिश की जाती है.

सम्मेलन में जिन विषयों पर चर्चा होनी है, उनमें दुनियाभर के उन छह करोड़ 10 लाख बच्चों तक पहुँचना है, जिन्हें बुनियादी प्राथमिक शिक्षा भी नहीं मिल पाती है.

अमरीका से अपनी पढ़ाई पूरी करके भारत लौटने के बाद माधव चौहान ने अस्सी के दशक के आख़िर में मुंबई की झोपड़पट्टियों में रहने वाले अशिक्षित लोगों के बीच अपना काम शुरू किया था.

पहल

"क़रीब 25 साल पहले मैंने देखा था कि मेरे देश के लाखों ग़रीब लोगों के जीवन में सुधार के लिए नई सोच की आवश्यकता है. ये पुरस्कार एक बड़ी बात है, जो मुझे यह अहसास कराती है कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है. ये मेरे लिए बहुत बड़ा सम्मान है"

माधव चौहान

यूनिसेफ और अन्य सरकारी संस्थाओं के साथ मिलकर माधव चौहान ने एक कम ख़र्च पर बड़ी संख्या में लोगों को शिक्षित करने का नया तरीक़ा विकसित किया.

उनकी चैरिटी संस्था प्रथम मंदिरों और दफ़्तरों में क्लास चलाती है. साथ ही संस्था ने स्थानीय लोगों के बीच से वॉलिंटियर्स को भी नियुक्त किया है.

धीरे-धीरे ये अन्य शहरों और राज्यों में फैल गया और फिर ये भारत के वंचित बच्चों को शिक्षा प्रदान करने वाले सबसे बड़ा ग़ैर सरकारी संगठन बन गया.

ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक अपने काम का प्रसार करने के अलावा माधव चौहान ने शिक्षा की गुणवत्ता पर भी ज़ोर दिया. उन्होंने एक परियोजना बनाई ताकि उन बच्चों की समस्याओं पर भी ध्यान दिया जा सके, जो स्कूल तो जाते हैं, लेकिन उनकी शिक्षा का स्तर काफ़ी कम है.

उन्होंने शिक्षा परियोजनाओं के प्रभाव की निगरानी के लिए भी एक व्यवस्था बनाई ताकि आगे की कोशिशें सावधानीपूर्वक की जा सके.

वाइज पुरस्कार हासिल करते हुए उन्होंने कहा, "क़रीब 25 साल पहले मैंने देखा था कि मेरे देश के लाखों ग़रीब लोगों के जीवन में सुधार के लिए नई सोच की आवश्यकता है. ये पुरस्कार एक बड़ी बात है, जो मुझे यह अहसास कराती है कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है. ये मेरे लिए बहुत बड़ा सम्मान है."

डॉक्टर अब्दुल्ला बिन अली अल थानी ने कहा कि पुरस्कार विजेता माधव चौहान लाखों लोगों के जीवन में रोशनी लेकर आए हैं.

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