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मजदूरों ने मांगी ममता से आत्महत्या की अनुमति

 सोमवार, 12 नवंबर, 2012 को 20:05 IST तक के समाचार

पश्चिम बंगाल के बंद हो चुके चाय बागानों के मज़दूरों का कहना है कि सरकारी मदद उनके परिवार के गुजारे के लिए काफ़ी नहीं है.

पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से में एक बंद पड़े चाय के बागान के 15 उम्रदराज़ मज़दूर, ग़रीबी की वजह से आत्महत्या करना चाहते हैं. इसके लिए इन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से अनुमति मांगी है.

इन मज़दूरों के लिए परिवार का गुज़ारा चलाना मुश्किल हो रहा है. उनका कहना है कि सरकार की तरफ से उन्हें कोई मदद नहीं मिल रही है.

लेकिन सरकार ने इसे ममता बनर्जी की छवि को खराब करने की एक कोशिश करार दिया है.

उत्तरी जलपाईगुड़ी ज़िले में ढेकालपाड़ा चाय बागान 10 साल से भी ज्यादा समय से बंद है और तब से अब तक बहुत से लोग 'भुखमरी के कारण' मारे गए हैं. सरकार की तरफ से इन मज़दूरों की बहुत ही मामूली मदद की जाती है.

कैसे भरूं परिवार का पेट?

इस बागान के एक मज़दूर कपिल लोहार ने बताया, "मेरे परिवार में पांच लोग है जिनका पेट भरना है. लेकिन सरकार हमें सिर्फ हर हफ्ते सिर्फ दो किलो चलाव और गेहूं देती है. इतने से अनाज से मैं कैसे अपने परिवार का पेट भरूं?"

लोहार ने फोन पर बीबीसी को बताया, "बंद पड़े उद्योगों के लिए सरकार की सहायता ख़त्म हो गई है और मेरी उम्र 58 साल से ज्यादा हो गई है. दूसरी तरफ़ वृद्धावस्था पेंशन तब तक शुरू नहीं होगी जब तक मैं 62 वर्ष का नहीं हो जाता हूं. तब तक मैं क्या करूं."

"मेरे परिवार में पांच लोग है जिनका पेट भरना है. लेकिन सरकार हमें सिर्फ हर हफ्ते सिर्फ दो किलो चलाव और गेहूं देती है. इतने से अनाज से मैं कैसे अपने परिवार का पेट भरूं?"

कपिल लोहार, ढेकालपाड़ा चाय बागान के मज़ूदर

मुख्यमंत्री से अपनी जीवनलीला समाप्त करने की अनुमति मांगने वाले पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में फुलु लोहतिया भी शामिल हैं.

उनका कहना है, "मैं बागान के अस्पताल में काम करता था. बागान 10 साल पहले बंद हो गया. मुझे सरकारी सहायता की सिर्फ दो किश्त मिली हैं. मैंने अधिकारियों से संपर्क किया तो मुझे बताया गया कि मुझे कुछ नहीं दिया जाएगा क्योंकि मैंने रिटायरमेंट की उम्र पार कर ली है. दूसरी तरफ वृद्धावस्था की पेंशन पाने के लिए अभी मुझे कुछ साल इंतजार करना होगा."

गांव के मुखिया सखी खरिया मानते हैं कि इस मज़दूरों की हालत बहुत खराब है.

उनका कहना है, "हम अपनी क्षमता के अनुसार इन मज़दूरों की पूरी मदद करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन अगर उच्चाधिकारी कदम नहीं उठा रहे हैं तो हम क्या कर सकते हैं?"

'पिछली सरकार का दोष'

मज़दूरों के आत्महत्या के लिए अनुमति मांगने को राज्य सरकार ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की छवि बिगाड़ने की कोशिश करार दिया है.

सरकार भी मानती है कि ये मज़दूर मुश्किलों में फंसे हैं. लेकिन मुख्यमंत्री से आत्महत्या की अनुमति मांगे जाने को अधिकारी ममता बनर्जी की छवि खराब करने की कोशिश मानते हैं.

उत्तरी बंगाल के मामलों के मंत्री गौतम देब का दावा है कि वो इस बागान का नियमित दौरा करते हैं. उनका कहना है कि कुछ मदद दी गई है और वो अच्छी तरह जानते हैं कि मज़दूरों की क्या हालत है. देब के मुताबिक प्रशासन मज़दूरो की मदद के लिए हर संभव कोशिश कर रहा है.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "बेशक मज़दूर कई सालों से मुश्किल में हैं. लेकिन इसके लिए हमें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है. ये गलतियां पिछली वाम मोर्चा सरकार ने की हैं. उसी सरकार ने नियम बनाया था कि बंद हो चुके चाय बागानों के मज़दूरों को 58 साल की उम्र तक ही मदद दी जाएगी और वृद्धावस्था पेंशन 62 साल की उम्र में शुरू होगी."

मज़दूरों के एक नेता स्वप्न समझार का कहना है कि मंत्री ने दावा किया था कि वो दीवाली से पहले बागान का दौरा करेंगे. लेकिन वो नहीं आए.

इसलिए उन्हें पिछले कई सालों की ही तरह एक और अंधेरी दीवाली गुजारनी पड़ेगी.

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