केजरीवाल: फैलेगी अराजकता या आएगा बदलाव?

 बुधवार, 17 अक्तूबर, 2012 को 07:37 IST तक के समाचार

पिछले कुछ महीनों में अरविंद केजरीवाल का उदय जिस तरह से हुआ है उसे देखते हुए ज़हन में एक सवाल उठने लगा है कि क्या ये वो शख्स है जो आने वाले समय में भारतीय राजनीति का नया अध्याय लिखेगा.

अफसरशाही को तिलांजली देकर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर केजरीवाल अब राजनीति में दस्तक दे चुके हैं. केजरीवाल ने कुछ ही दिनों में जिस तरह से देश के बड़े राजनीतिक घरानों और नामचीन नेताओं को घेरे में लिया है उससे नेताओं और राजनीतिक दलों की नींद उड़ गई है.

केजरीवाल का कहना है कि ये तो अभी शुरुआत भर है. पिछले हफ़्ते केजरीवाल के निशाने पर थे बिज़नेसमैन रॉबर्ट वाड्रा जो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद हैं. केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि वाड्रा और एक रियल इस्टेट कंपनी के बीच संबंध थे और इन संबंधों के कारण वाड्रा को व्यापारिक फायदा हुआ. लेकिन डीएलएफ और वाड्रा दोनों आरोपों से इनकार करते हैं.

इसके कुछ दिन बाद ही केजरीवाल ने कानून मंत्री सलमान खुर्शीद को निशाने पर लिया. आरोप ये लगाया कि खुर्शीद और उनकी पत्नी ने उस धनराशि में धाँधली की है जो उनके एनजीओ को विकलांग लोगों के लिए दी गई थी. ग़ुस्साए खुर्शीद इन आरोपों को सिरे से नकार रहे हैं लेकिन केजरीवाल अपनी बात पर अड़े हुए हैं और जाँच की माँग कर रहे हैं.

ये बात स्पष्ट है कि धारणाओं की इस लड़ाई में केजरीवाल की जीत हो रही है क्योंकि कांग्रेस पहले से ही कई घोटालों के आरोपों से घिरी हुई है और बैकफुट पर है.

कई राजनेता केजरीवाल को पब्लिस्टी का भूखा व्यक्ति करार दे रहे हैं जो मीडिया की नज़रों के बीच रहकर राजनीतिक दांवपेंच खेलते हैं. पूरे घटनाक्रम से झल्लाए एक मंत्री का कहना था, "उन्हें लोकप्रियता चाहिए और वो इसके लिए मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं. वे नहीं जानते कि लोकतंत्र, संसदीय प्रकिया क्या होती है."

चुप्पी तोड़ना वाला चाहिए

स्वतंत्र राय रखने वाले टीकाकार भी केजरीवाल के काम करने के तरीके से थोड़ा असहज महसूस कर रहे हैं- उनकी कार्यप्रणाली को कीचड़ उछालने वाली और शोशेबाज़ी कहा जा रहा है.

अफसरशाह से राजनेता बने केजरीवाल को लेकर मेरी राय थोड़ी बँटी हुई है. केजरीवाल सदाचार का पाठ पढ़ाते हैं, वे बड़े नेताओं पर गंभीर आरोप लगाते हैं और वो भी ऐसे तथ्यों के आधार पर जो उनकी नज़र में ठोस सबूत हैं...और इससे पहले कि एक मामला किसी छोर पर पहुँचे वो अगले व्यक्ति पर निशाना कसने में लग जाते हैं.

सवाल ये है कि क्या ग़लत कामों में लिप्त होने के शक के आधार पर नेताओं के खिलाफ़ अदालत के बजाए सड़कों पर आंदोलन करना अराजकता नहीं फैलाएगा? पर साथ ही ये सवाल भी ज़हन में आता है कि क्या भारत को थोड़ी अराजकता की ज़रूरत है ताकि लोग नींद से जागें और न्यायपालिका और पुलिस जैसे संस्थानों को बचाने के लिए कुछ करें जो सड़ रहे हैं.

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि केजरीवाल ने चुप्पी साधे रहने के पुराने नियम को तोड़ा है. उन्होंने ऐसे रसूखदार लोगों के खिलाफ आवाज़ उठाई है जिन्होंने उनकी नज़र में अपनी सीमाएँ लांघी हैं.

बहुत सारी उम्मीदें

देश के एक नामचीन आर्थिक अखबार ने रॉबर्ट वाड्रा के व्यापारिक लेन-देन पर जबरदस्त रिपोर्ट छापी थी, लेकिन उस वक्त वाड्रा को लेकर इतना हंगामा नहीं मचा. यहाँ तक कि विपक्षी दल भाजपा ने भी इस मामले को तूल नहीं दिया. लेकिन जब इस मुद्दे पर पिछले हफ्ते केजरीवाल बोले तो ये ख़बर मीडिया में छा गई, देश में हर ओर इसी की चर्चा थी.

राजीतिक मामलों के टीकाकार योगेंद्र यादव कहते हैं कि किसी को तो आवाज़ उठानी पड़ेगी. उनका तर्क है, "चुप्पी साधे रहने से ग़लत काम करने वालों को संरक्षण मिलता है. बिज़नेस, राजनीति और बिज़नेस से जुड़ी आचारनीति यहाँ बड़े मसले हैं. मिसाल के तौर पर क्या देश के सबसे ताकतवर परिवार को ऐसे व्यापारिक लेन देन करने चाहिए जो सवालों के घेरे में हो?"

ये बात कही जा सकती है कि केजरीवाल स्ट्रीट फाइटर हैं जो अमीरों और ताकतवर लोगों के खिलाफ आवाज़ उठाकर राजनीति की पारंपरिक परिभाषा को बदलने की कोशिश कर रहे हैं.

टीकाकार आदित्य निगम मानते हैं कि अरविंद केजरीवाल की पार्टी दरअसल एंटी पार्टी होगी जहाँ सत्ता उसका एक मात्र लक्ष्य नहीं होगा.
अगर वो जीतते हैं तो इसका मतलब होगा कि भारत में अब तक होने वाली राजनीति का पतन. और अगर केजरीवाल का राजनीतिक अभियान विफल रहा तो भी ये एक ऐसे गणराज्य के विकास में छोटा से कदम होगा जहाँ लोकतंत्र केवल चुनावों में जीत तक सिमट कर न रह गया हो...उम्मीद तो यही है.

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