दिल्ली को न्यूयॉर्क बनाने की तैयारी

  • 15 अक्तूबर 2012
हर साल बड़ी तादाद में दिल्ली आ रहे प्रवासी नालों के किनारे बसी झुग्गियों में रहने को मजबूर हैं

गगनचुम्बी इमारतों का पर्याय 'न्यूयॉर्क' शहर क्या दिल्ली के लिए आदर्श होना चाहिए? क्या दिल्ली उठा पाएगी इन गगनचुम्बी इमारतों का भार?

ये सवाल हाल ही में तब उठे जब शहरी विकास मंत्री कमल नाथ ने शहर में हर साल बढ़ रही लगभग पांच लाख की आबादी को आवास मुहैया कराने के लिए शहर में बड़ी संख्या में गगनचुम्बी इमारतें बनाने का प्रस्ताव रखा.

कमल नाथ ने बीबीसी से कहा, ''दिल्ली का वर्तमान ढांचा प्रवासियों को छत मुहैया कराने में अक्षम है. हर साल दिल्ली की तरफ़ बढ़ रही आबादी को तो दिल्ली आने से नहीं रोका जा सकता. ऐसे में अगर इमारतों को ऊँचा न किया गया तो रहने की जगह कहाँ से लाई जाए?''

आमतौर पर दिल्ली को लेकर दो ही प्रकार की छवियाँ मन में उभरती हैं.

साफ़ सुथरी चौड़ी सडकें, सड़कों के दोनों तरफ़ हरे भरे पेड़, पेड़ों के बराबर में कंधे से कन्धा मिलातीं इमारतें नई दिल्ली का आधुनिक नक्शा है.

दूसरी ओर है पुरानी दिल्ली का वो दृश्य जिसकी 1911 में नई दिल्ली बनाने में इस्तेमाल हुई मिटटी का सोंधापन, ब्रितानी अंदाज़ में बने नक्शों पर सधे पुराने बंगले, और पुरानी गलियों ने हमेशा से दुनिया भर को अपनी ओर लुभाया है.

लेकिन इन दोनों के बीच है एक ऐसी भी दिल्ली जो हर साल रोज़गार की तलाश में इस शहर की ओर प्रस्थान कर रहे लोगों को झोपड़ पट्टियों, रेलवे लाइन के किनारे टिन से ढके मकानों, गंदे पानी के नालों के किनारे खड़े छोटे छोटे कमरों में पनाह दे रही है.

राजेश और उनकी पत्नी पूनम जो कुछ साल पहले उत्तर प्रदेश से दिल्ली आए थे, दिहाड़ी पर काम करके जीवन यापन करते हैं. राजेश अपने परिवार के साथ एक कमरे में रहते हैं जहाँ वो अवैध बिजली और घर के बराबर से बह रहे नाले से पानी का इस्तेमाल करते हैं.

राजेश ने बीबीसी को बताया ''इससे पहले हम एक झुग्गी से दूसरी झुग्गी बदल बदल कर सालों रहते रहे और आख़िरकार अधिकारियों द्वारा झुग्गी नष्ट कर दिए जाने पर हमें रेलवे लाइन के किनारे इस कमरे में पनाह लेनी पडी. यहाँ गंदे नाले के बीच रहने की वजह से मच्छरों की भरमार है और मेरे बच्चे अक्सर बीमार पड़ जाते हैं.''

यह बात तो ज़ाहिर है की दिल्ली को आवश्यकता है राजेश और पूनम जैसे लोगों के लिए घर तैयार करने की जो सस्ते भी हों और बेहतर जीवन प्रदान कर सकें. लेकिन सवाल यह है कि कैसे?

क्या यह संभव है ?

वास्तुकार और नगर नियोजक एजीके मेनन मानते हैं की दिल्ली में न्यूयॉर्क जैसी ऊंची इमारतें बनाना एक बहुत बड़ी भूल होगी.

मेनन ने बीबीसी से कहा ''न्यूयॉर्क जैसे शहरों का ढांचा ऊंची इमारतों का भार सहने और उनकी पानी और बिजली की आवश्यक्तओं को पूरा करने के अनुरूप है. लेकिन दिल्ली के पास ये सुविधायें अभी नहीं हैं. कहाँ से आएगी इतनी बिजली और इतना पानी?''

ज़ाहिर है मांग और पूर्ती की इस खींच तान के बीच दिल्ली का प्रसार तो परिस्थिति की मांग है. सवाल यह रह जाता है कि यह प्रसार संभव किस रूप में है, लम्बवत या क्षैतिज?

संबंधित समाचार