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हैदराबाद में जैव विविधता को सहेजने की चुनौती पर सम्मेलन

 मंगलवार, 16 अक्तूबर, 2012 को 08:02 IST तक के समाचार

भारत की कुल आबादी एक अरब बीस करोड़ है जो कि विश्व जनसंख्या का लगभग 18 फ़ीसदी है. इस देश में इंसान और वन्य-जन जीवन के लिए विश्व भूमि का 2.4 हिस्सा ही उपलब्ध है.

ऐसे में दोनों के बीच संघर्ष होना लाज़िमी है. इस स्थिति में दोनों के बीच तनाव स्वाभाविक है. ज़ाहिर है कि आख़िर में नुक़सान हमेशा जैव विविधता को ही उठाना पड़ता है. यह भी सही है कि इंसान भी इसके बिना जीवित नहीं रह सकता.

40 अरब डॉलर की ज़रुरत

हैदराबाद में 190 देशों के 12 हज़ार से भी अधिक विशेषज्ञ इस बात पर विचार विमर्श कर रहे हैं कि विश्व के जीन पूल को कैसे बचाया जाए. इन सभी का मानना है कि विश्व की इस अनमोल धरोहर को बचाने के लिए 40 अरब डॉलर की राशि की ज़रूरत है.

जैव विविधता पर सम्मेलन

जैव विविधता पर है पूरी दुनिया में चिंता

पिछले दशक में भारत ने कम से कम पांच दुर्लभ जानवर लुप्त होते देखे हैं. इनमें इंडियन चीता, छोटे क़द का गैंडा, गुलाबी सिर वाली बत्तख़, जंगली उल्लू और हिमालयन बटेर शामिल है. ये सब इंसान के लालच और जगलों के कटाव के कारण हुआ है.

इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर (आईयूसीएन) ने चेताया है कि इस समय 929 दुर्लभ प्रजातियां ख़तरे में हैं. 2004 में यह संख्या 648 थी. विश्व धरोहर को गंवाने वाले देशों की शर्मनाक सूची में भारत चीन से ठीक बाद सातवें स्थान पर है.

संयुक्त राष्ट्र कंवेनशन ऑन बायोलॉजिकल डायवर्सेटी ( सीबीडी) संधि पर 193 देशों ने हस्ताक्षर करने के अलावा इस पर अमल किया है. लेकिन हैरानी की बात है कि अमरीका इसे मानने से इनकार कर चुका है. इस मसले पर सूडान भी अमरीका के साथ खड़ा है.

अमरीका का इनकार

अमरीका ने सीबीडी को 1994 से मानने से इनकार कर रखा है. अमरीका को इस संधि की उस सबसे अहम शर्त सहित कई बातों पर एतराज़ है जिसमें कहा गया है कि सभी देशों को विश्व वैविधता के बराबर के फ़ायदे मिलने चाहिएं. चूंकि भारत इस सम्मेलन का मेज़बानी कर रहा है, इसलिए उसे अमरीका को भी इस संधि के दायरे में लाने की कोशिश करनी चाहिए.

पर्यावरण मंत्री जंयती नटराजन ने कहा है कि वह इस बारे में अमरीका से बात करेंगी.

भारत में बाघों की संख्या पर अरसे से चिंता जताई जाती रही है.

सरकार की नेशनल वायोडायवर्सिटी अथारिटी (एनबीए) भारत के 70 फ़ीसदी हिस्से में पाए जाने वाले एक लाख 50 हज़ार दुर्लभ पौधों और जानवरों के ही आंकड़े एकत्र किए जा सके हैं. मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि अभी बहुत बड़ा अंतर हैं.

कौन जानता है कि अभी और कितनी दुर्लभ प्रजातियां और मिल सकती हैं और जिस तेज़ी से हम इन्हें खो रहे है, यह ठीक जीवन की लाइब्रेरी से किताबों को बिना पढ़े जला देने जैसा है.

कई लोगों को इस बात की हैरानी होगी कि अभी 2005 में अरुणाचल प्रदेश में दुर्लभ प्रजाति का बंदर मिला था. जियोलॉजिक्ल सर्वे आफ़ इंडिया के अनुसार 2011 में जानवरों की 193 नई प्रजातियां पाई गईं.

भारत शेर, बाघ, हाथी और गैंडे को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है. हालांकि इस बीच अफ़्रीक़ा से इंडियन चीते को लाने के प्रयास भी हुए हैं. लेकिन यह भी सच है कि देश शेरों के लिए उपयुक्त वैकल्पिक रिहाइश खोज पाने में सफल नहीं हो पा रहा है.

बाघ की संख्या बढ़ी

ये भी नहीं है कि भारत अपनी जैव विविधता को बचाने के लिए कोई कोशिश नहीं कर रहा. देश का 4.8 प्रतिशत भौगोलिक हिस्से को सुरक्षित क्षेत्र में रखा गया है. 2011 में देश भर में 1706 वयस्क बाघ गिने गए थे जबकि 2006 में यह संख्या सिर्फ़ 1411 थी.

मंत्रालय के अनुसार भारत इस समय जैव विविधता पर दो अरब डॉलर ख़र्च कर रहा है. इसके परिणाम भी सामने आने लगे हैं. आईयूसीएन ने शेर जैसी पूंछ वाले बंदर को 25 लुप्तप्राय जानवरों की सूची से हटा दिया है क्योंकि इसकी संख्या में इज़ाफ़ा हुआ है.

नटराजन ने इस बारे में कहा, " भारत इस मुद्दे पर काफ़ी मज़बूती के साथ बात करने की स्थिति में है क्योंकि अपने आर्थिक विकास, ग़रीबी उन्मूलन और जैव विविधता के संरक्षण के बीच संतुलन रखना उसकी ज़रुरत है. "

हालांकि ज़मीन की तुलना तटीय क्षेत्रों में ज़्यादा काम नहीं हो पाया है क्योंकि यहां सिर्फ़ एक प्रतिशत प्रजातियों का ही संरक्षण किया जा सका है. वैसे सीबीडी को किए गए भारत के वादे के मुताबिक़ यह लक्ष्य 10 फ़ीसदी होना था.

भारत के जलक्षेत्र में 13 हज़ार लुप्तप्राय प्रजातियों की गणना की गई है. आठ हज़ार किलोमीटर तटरेखा के आसपास बंदरगाह और बिजली घर जैसी विकास परियोजनाओं के कारण कई मछलियों और प्रवाल भिति ख़तरे में हैं.

भारत गेंहू और चावल जैसे खाद्यान्न के पौधों के मामले में एक बड़ा केंद्र है. दुनिया भर में तीन अरब लोग भारतीय चावल का स्वाद चखते हैं. भारत में चावल की क़रीब 50 हज़ार भिन्न क़िस्में हैं. इनमें से कई का दिल्ली स्थित नेशनल जीन बैंक के फ्रिजों में संरक्षित है.

भारतीय जंगली भूमि में सदियों से जंगली आम, चाय, ज्वार, बाजरा, दालों के पौधों से पटी पड़ी है. इसके अलावा जानवरों में भैंसा, गधा और बकरियां शामिल हैं. एनबीए के 2010 के अनुमान अनुसार भारत में 8850 करोड़ के जैव विविध निर्यात की संभावना है. इसमें घरेलू खपत शामिल नहीं है.

पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार देश के 23.4 प्रतिशत भाग में जंगल है. जबकि एक समय यह 33 फ़ीसदी होने की उम्मीद थी लेकिन जैसा की प्रयावरण मंत्री नटराजन ने कहा कि पिछले आंकड़ों में वास्तव मे गिरावट दर्शाते हैं.

वन क्षेत्र के किनारे तेज़ी से इंसानी ज़रुरतों की भेंट चढ़ रहे हैं. परिणामस्वरुप प्राकृतिक संपदा समाप्ति की ओर है.

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