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तीस हज़ार में बैल, लड़कियाँ दो हज़ार में

 मंगलवार, 9 अक्तूबर, 2012 को 11:48 IST तक के समाचार
सिमडेगा का एक गाँव

गाँव वालों का कहना है कि कितनी ही लड़कियों के बारे में कोई जानकारी नहीं है

यहां एक जोड़ी बैल की कीमत है 30 हज़ार रूपए और एक पुरानी मोटर साइकिल भी 20 हज़ार से कम की नहीं मिलती.

लेकिन यहां की आदिवासी लड़कियों का कोई मोल नहीं. वे दो - चार हज़ार रुपए तक में मिल जाती हैं.

ये है झारखंड की राजधानी राँची से ढाई सौ किलोमीटर दूर आदिवासी बहुल सिमडेगा ज़िले का बाकचट्टा गाँव.

स्थानीय पंचायत ज़िला परिषद के एक सदस्य नील जस्टिन बेक मुझसे कहते हैं, "यहां एक जोड़ी बैल महंगा है जबकि लड़की सस्ती. इसके लिए हमारा समाज भी कम दोषी नहीं है."

यहाँ की आदिवासी लड़कियों को बड़े शहर में अच्छी नौकरी का लालच देकर बिचौलिए अपने साथ ले जाते हैं और उन्हें प्लेसमेंट एजेसियों या जिस्म की मंडियों में बेच देते हैं.

लंबा सफर तय करके सिमडेगा के बाकचट्टा गाँव में पहुँचता हूँ तो वहाँ इन्हीं मुद्दों को लेकर पंचायत बैठी है.

यह पंचायत खाप पंचायतों जैसी नहीं है क्योंकि इस पंचायत में शामिल लोग बेबस और लाचार हैं. इतने कि इनकी बातों या फैसलों का किसी पर कुछ ख़ास असर नहीं है.

यहाँ आदिवासी ग्रामीणों की भीड़ लगी है. लोग ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला-चिल्ला कर गांव की उन लड़कियों का नाम ले रहे हैं जो पिछले कई सालों से ग़ायब हैं.

मकड़जाल

पुलिकर करकेट्टा

पुलिकर करकेट्टा की बेटी आश्रिता का कुछ पता नहीं चला

पंचायत में ऐसे लोगों को पेश किया जा रहा है जिन पर लड़कियों की दलाली करने के आरोप लगाए गए हैं. यहां के गांव वालों ने चार ऐसे लोगों को पकड़ा है और उनसे उन लड़कियों के बारे में पूछताछ कर रहे हैं जिन्हें दिल्ली में बेच दिए जाने का शक है.

इनमें से एक आरोपी एनोस कुजूर को पंचायत के सामने पेश किया गया है.

पकड़े गए लोगों ने स्वीकार किया है कि उन्होंने लड़कियों को प्लेसमेंट एजेंसी के हवाले किया है और बदले में उन्हें पैसे भी मिले हैं.

ज़िला परिषद के सदस्य नील जस्टिन बेक और उप-मुखिया विजय एक्का की अगुवाई में लगी इस पंचायत में एनोस सबके सामने ये स्वीकार करता है कि उसने गांव की चार लड़कियों को दिल्ली में प्लेसमेंट एजेंसी के लोगों को बेचा है.

भरी पंचायत में उसने ये माना कि उसे दो लड़कियों के बदले प्लेसमेंट एजेंसी से 10 हज़ार रूपए मिले.

पंचायत में मौजूद सरपंच विजय ने इन दलालों पर पंचायत सदस्यों को धमकाने का भी आरोप लगाया.

यहां के लोग कहते हैं कि एनोस ने सिर्फ खिंडा पंचायत की आठ से नौ लड़कियों को बेचा है.

पंचायत के दौरान ही बाकचट्टा गांव के पुलिकर करकेट्टा बताते हैं कि, उनकी बेटी आश्रिता का आज तक कोई अता-पता नहीं.

"पूरे आदिवासी अंचल में लड़कियों की तस्करी एक बड़ी समस्या बन गयी है. उनका कहना है कि अज्ञानता और ग़रीबी के अलावा महानगरों की चकाचौंध के चक्कर में भी आदिवासी लड़कियां दलालों के चंगुल में फंस जाती हैं और फिर कभी वापस नहीं लौटती"

नील जस्टिन लेक, ज़िला पंचायत सदस्य

वहीं नेम्सस खेस खुशकिस्मत थे कि उन्होंने ओडिशा के झारसुगुड़ा जाकर अपनी बेटी को दलालों के चंगुल से बचा लिया.

लेकिन आज यहां लगी पंचायत के तेवर तल्ख़ हैं.

पंचायत नें इन सभी लोगों पर 15 हज़ार रूपए का अर्थ दंड लगाया है. इनमें एनोस की बहन भी शामिल है जिसपर भी कई लड़कियों को दिल्ली ले जाकर बेचने का आरोप लगाया गया है.

एक बार अगर ये लड़कियां इस दलदल में फंस जाती हैं तो उसके बाद उनका वहां से बच कर निकलना आसान नहीं होता. हारकर वो अपने हालात से समझौता कर लेती हैं.

मानव तस्करी

नील जस्टिन लेक

नील जस्टिन लेक कहते हैं कि जो कुछ हो रहा है उसके लिए समाज ही दोषी है

तमाम तरह की मानसिक, सामाजिक और शारीरिक तिरस्कार झेलने के बाद भी अगर ये लड़कियां अपने घर लौटती हैं तो वहां भी उनको हिस्से तिरस्कार ही आता है.

और यही वो कारण जिसकी वजह से झारखण्ड के आदिवासी बहुल इलाकों की सैकड़ों लड़कियों का आज तक कोई अता-पता नहीं है.

वह कहां और किस हाल में हैं... ये कोई नहीं जानता.

पंचायत में मौजूद नील जस्टिन बेक गाँव वालों को कहते हैं, "जिस दिन इस गांव में किसी को एड्स हो जाएगा उस दिन समझ में आएगा आपलोगों को. जिस औलाद को पैदा किया तुमने उसके पास भी नहीं जाना चाहोगे".

बाद में बीबीसी से बात करते हुए जस्टिन कहते हैं, ''पूरे आदिवासी अंचल में लड़कियों की तस्करी एक बड़ी समस्या बन गयी है. उनका कहना है कि अज्ञानता और ग़रीबी के अलावा महानगरों की चकाचौंध के चक्कर में भी आदिवासी लड़कियां दलालों के चंगुल में फंस जाती हैं और फिर कभी वापस नहीं लौटती.''

खिंडा पंचायत से निकलकर मैं सिमडेगा के पुलिस निरीक्षक विवेकानंद ठाकुर के पास गया जो सरकार द्वारा लड़कियों की तस्करी को रोकने के लिए बनाए गए टास्क फोर्स के संयोजक हैं.

ठाकुर कहते हैं, ''पुलिस नें दलालों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है और यही वजह है कि पिछले कुछ महीनों में कई लड़कियों को इनके चंगुल से बचाने में पुलिस कामयाब हुई है.''

मैं विवेकानंद ठाकुर से बात कर निकल ही रहा था कि तभी ख़बर आई कि सिमडेगा के ही ठेठाईटांगर की बूटन तिर्की नाम की नाबालिग आदिवासी लड़की की संदेहास्पद परिस्थिति में मौत हो गयी है. आज उसका शव दिल्ली से गांव लाया गया है और पुलिस को शक है कि बूटन की बलात्कार करने के बाद हत्या की गयी है.

बूटन भी उन हज़ारों आदिवासी लड़कियों में से एक थी जो सुनहरे भविष्य और महानगर की चकाचौंध से आकर्षित होकर दलालों के चंगुल में जा फंसी थी.

आज उसके परिवार के पास बताने के लिए एक खौफ़नाक कहानी और पछतावे के अलावा कुछ नहीं बचा है.

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