आदिवासी लड़कियाँ बन रही हैं बिनब्याही माँ

  • 8 अक्तूबर 2012
बिनब्याही मां
कुछ ही माएं हैं जो बच्चों के साथ रुक गई हैं

महानगरों की चकाचौंध और सुनहरे भविष्य का सपना लिए झारखण्ड की हज़ारों आदिवासी लड़कियां महानगरों का रुख तो कर रही हैं मगर वहां से वो लौटती हैं बीमारियां और गोद में बच्चे लेकर.

ग़ैर सरकारी संगठनों की ओर से किये गए अध्ययन के अनुसार झारखण्ड से महानगरों में जाने वाली लड़कियों की संख्या तो बढ़ ही रही है. मगर, इसके साथ साथ उन बच्चों की संख्या भी बढ़ रही हैं जिन्हें ये लड़कियां वापस लेकर आ रहीं हैं और राज्य के सुदूर जंगलों में स्थित अपने गावों में इन्हें छोड़ कर वापस चली जा रही हैं.

स्थिति इतनी खतरनाक हो गई है कि एक सामाजिक संगठन नें इन इलाकों में ऐसे बच्चों के लिए आश्रम खोलने शुरू कर दिए हैं.

सिमडेगा जिले का सांवर टुंगरीटोली गांव में मेरी मुलाक़ात छह वर्षीय पीटर से हुई.

पीटर की माँ दिल्ली में काम करती थी. फिर एक दिन वह गर्भवती होकर गाँव लौटी.

पीटर के नाना बताते हैं कि जन्म देने के कुछ ही महीनों के बाद वह फिर वापस चली गई और अब पांच साल हो गए हैं उसका कोई अता पता नहीं. ना उसने कभी फोन किया ना कोई चिठ्ठी भेजी और ना ही पैसा. वह कहाँ है किसी को नहीं पता. पीटर अपने नाना नानी को ही अपना माता पिता मानता है.

पीटर की तरह ही सिमडेगा के सुदूर इलाकों के गावों में कई ऐसे बच्चे हैं जो अपनी माँ का इंतज़ार कर रहे हैं. मगर उनका इंतज़ार काफी लंबा होता चला जा रहा है और इसकी संभावनाएं भी कम हैं कि उनकी माँ कभी वापस आएंगीं.

बिखरता बचपन

सिमडेगा के गाँव की स्थिति का जायजा लेते हुए मैं शहर के पास 'द मिरेकल फाऊंडेशन' पहुंचा तो इस बाल आश्रम के पालने में मौजूद बच्चों को देखकर आंखें भर आईं.

कहीं किलकारियों की आवाजें तो कहीं रोने चिलाने की आवाजें. ये आवाजें आज भी मुझे रह रह कर सता रहीं हैं.

इस आश्रम में लगभग 75 ऐसे बच्चे हैं जिनकी देखभाल की जा रही है जबकि झारखंड के बाल अधिकार सुरक्षा आयोग के अनुसार सिर्फ सिमडेगा ज़िले में ही ऐसे बच्चों की संख्या 200 से भी ज्यादा है.

ऐसा ही हाल गुमला, रांची और खूंटी जिलों का भी है. आश्रम की संचालिका प्रभा टेटे कहती हैं कि आश्रम में ना सिर्फ बच्चों की देखभाल की जाती है बल्कि समाज में तिरस्कृत ऐसी बिनब्याही गर्भवती आदिवासी लड़कियों की मदद की जाती है जो इससे पहले बच्चों को इधर उधर फ़ेंक दिया करती थीं.

आज आश्रम नें इस समस्या से निपटने के लिए सड़क के किनारे एक पलना भी रखा हुआ है जहाँ इस तरह की माएं बच्चों को रखकर चली जाती हैं. फिर आश्रम के कार्यकर्ता उन बच्चों की देखभाल करते हैं.

मगर सिमडेगा के ही गरजा खेदनटोली की नोमिता के बच्चे खुशकिस्मत हैं. उनकी माँ ने उनका साथ नहीं छोड़ा. नोमिता के तीनों बच्चे उसके साथ गांव में ही रहते हैं हालांकि उन्हें सामाजिक रूप से तिरस्कृत कर दिया गया है. नोमिता बीमार रहती है और शायद यही वजह है कि उसने दोबारा महानगर जाने की हिम्मत नहीं की.

गंभीर बीमारियाँ

झारखण्ड के बाल अधिकार सुरक्षा आयोग के उपाध्यक्ष संजय कुमार मिश्र कहते हैं कि बिनब्याही माओं और उनके द्वारा महानगरों से लाए गए बच्चों की समस्या विकराल रूप लेती जा रही है. उनका कहना है कि ये सभी लड़कियां शारीरिक शोषण का शिकार होती हैं.

बीबीसी से बात करते हुए मिश्र कहते हैं, "ज्यादातर लड़कियां दलालों के झांसे में आकर दिल्ली या दूसरे महानगर में मौजूद प्लेसमेंट एजेंसी पहुँच जाती हैं. सबसे पहले उनका शारीरिक शोषण वहां होता है. फिर जिन घरों में उन्हें काम करने भेजा जाता है, वहां पर वह शोषित होती हैं."

बिनब्याही माँ
आदिवासी लड़कियों के लिए कुछ संगठन जागरुकता कार्यक्रम संचालित कर रहे हैं

संजय कुमार मिश्र कहते हैं, ''झारखण्ड सरकार नें दिल्ली पुलिस और वहां मौजूद एक ग़ैर सरकारी संगठन के साथ मिलकर ऐसी लड़कियों को बचाने के लिए एक टास्क फ़ोर्स का गठन किया है. उनका कहना है कि हाल ही के दिनों में देश के विभिन्न इलाकों से कई लड़कियों को बचाने में वे लोग कामयाब हुए हैं. कई ऐसी प्रताड़ित लड़कियों को रांची के पास भारत किसान संघ द्वारा संचालित किये जा रहे आश्रम में रखा गया है.''

चूँकि सिमडेगा आदिवासी बहुल इलाका है इस लिए अब इस मामले को लेकर चर्च भी काफी गंभीर है. सिमडेगा की चर्च से जुड़ी नन एलिज़ाबेथ का कहना है कि सिर्फ बच्चे ही नहीं, कई लड़कियां गंभीर किस्म के यौन संक्रमण लेकर लौट रहीं हैं.

उन्होंने कई लड़कियों के नाम बताए जिसमें से एक लड़की की मौत एड्स हो गई.

अब चर्च नें भी लोगों में जागरूकता लाने के लिए अभियान शुरू किया है. इस अभियान में सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ साथ ननों को भी शामिल किया गया है जो गाँव-गाँव घूम कर आदिवासी समाज को जागरूक करने का काम कर रहे हैं.

हालांकि चर्च ने ये अभियान काफी पहले शुरु किया था लेकिन इलाके में पिछड़ेपन और रोज़गार के संसाधनों की कमी नें लोगों को पलायन करने पर मजबूर कर दिया है. पलायन करने वालों में ज्यादा संख्या आदिवासी लड़कियों की है.