बिहार में लालू-नीतीश की ताज़ा सियासी कुश्ती

 शनिवार, 6 अक्तूबर, 2012 को 09:02 IST तक के समाचार
नीतीश कुमार

नीतीश कुमार से सुशासन पर लालू सवाल उठा रहे हैं

बिहार में आजकल सियासी यात्राओं का खासा जोर है. एक तरफ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की 'अधिकार यात्रा' तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव की 'परिवर्तन यात्रा' चल रही है.

नीतीश कहते हैं कि जनता दल यूनाइटेड (जदयू) की इस मुहिम का मकसद बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के लिए जन समर्थन बढ़ाना है.

उधर लालू प्रसाद का कहना है कि 'सुशासन' की डींग हांकने वाले नीतीश कुमार के कुशासन' पर चोट करना उनकी इस यात्रा का मुख्य मकसद है.

लेकिन इन यात्राओं के पीछे इन दोनों नेताओं का असली मकसद क्या हैं, इस सवाल पर अब यहां राजनीतिक चर्चा ज़ोर पकड़ने लगी है.

छिपा हुआ मकसद

एक पक्ष ये मानता है कि लालू बिहार में अपने बुरे शासन की वजह से गंवाई सत्ता फिर हासिल करने या आगामी लोकसभा चुनाव में स्थिति सुधारने की कोशिश में जुट गए हैं.

दूसरा पक्ष 'विशेष राज्य' वाली मुहिम को ढकोसला मानते हुए कहता है कि नीतीश अपने शासन की विफलताओं से लोगों का ध्यान हंटाने के लिए ‘प्रपंच’ रच रहे हैं.

"चुनौती क़बूल है लालू को. आओ मैदान में पटका-पटकी हो जाए. क्या समझ लिया है कि विकास का फ़र्ज़ी प्रचार और 'विशेष राज्य दर्जा' वाला ढोंग रचा के गैंगरेप, घूसखोरी, हत्या, लूट और अपहरण की बढ़ती घटनाओं पर परदा डाल देंगे?"

लालू प्रसाद यादव, राजद अध्यक्ष

हालांकि सत्ता की राजनीति में माहिर नेताओं के अपने-अपने स्वार्थी अंध समर्थक या चाटूकार दल भी होते हैं, जो चिल्ला-चिल्ला कर झूठ बताते और सच छिपाते रहते हैं.

इसी तरह का आरोप यहां पिछले छह सात वर्षों में विकसित हुई एक ख़ास तरह की 'मीडिया मंडी' के विरुद्ध भी लगाया जा रहा है.

काट खाने जैसा रुख़

मुख्यमंत्री की 'अधिकार यात्रा' के दौरान हाल ही में जैसा तीखा या आक्रामक जन-विरोध उभरा, उस पर सत्ता पक्ष की वैसी ही जवाबी प्रतिक्रिया भी देखने को मिली.

मधुबनी और दरभंगा की जनसभाओं में शिक्षकों के विरोध प्रदर्शन पर नीतीश कुमार का क्रोध बेक़ाबू हो उठा. इसके साथ ही कचूमर निकलवा देने या बाहर फेंकवा देने जैसी धमकी सुनी गई.

बेगुसराय में काले झंडे और अंडे दिखाते-फेंकते छात्रों पर पुलिस की लाठियां बरसीं. फिर खगडिया में तो ये विरोध आगजनी और पथराव तक जा पहुंचा.

रणवीर कांड

हद तब हो गई, जब जदयू की एक महिला विधायक के पति और आपराधिक मामले में सज़ायाफ्ता पूर्व विधायक रणवीर यादव खगडिया में लोगों पर टूट पड़े.

"सुशासन और विकास देखकर जलन से कुछ लोगों की छाती फटती रहती है. बेचैनी की सुई लेकर घूमने वाले को उकसाने-भड़काने का काम यही लोग करते हैं. देश ही नहीं, दुनिया भर को पता है कि बिहार अंधकार से रोशनी की तरफ़ बढ़ा है"

नीतीश कुमार, बिहार के मुख्यमंत्री

एक पुलिसकर्मी से कारबाइन छीनकर उसे हवा में लहराते, गोलियां चलाते और प्रदर्शनकारियों को लाठी से पीटते हुए उन्हें साफ़ साफ़ टेलीविज़न चैनल पर दिखाया गया.

उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई तो दूर, नीतीश कुमार और शरद यादव, दोनों ने रणवीर यादव का ना सिर्फ बचाव किया, बल्कि ऐसी बहादुरी दिखाने के लिए उन्हें शाबाशी दी.

दूसरी तरफ़ वहाँ के 11 पुलिसकर्मियों को इसलिए निलंबित कर दिया गया, क्योंकि उन्हें मुख्यमंत्री के काफ़िले की सुरक्षा में लापरवाही बरतने का जिम्मेदार ठहराया गया.

वहीं मुख्यमंत्री के काफ़िले में राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) समेत कई बड़े पुलिस अधिकारी शामिल थे.

लालू और विपक्ष को मिला मौक़ा

रणवीर यादव के बचाव को नीतीश सरकार का सबसे शर्मनाक ग़ैर क़ानूनी रवैया क़रार देते हुए लालू प्रसाद अपनी हरेक जनसभा में इस घटना का ज़िक्र करते हैं.

मुंगेर में उन्होंने कहा, ''चूड़ियाँ पहन लें नीतीश कुमार, क्योंकि उन्हें अब अपनी सुरक्षा के लिए रणवीर यादव जैसे आपराधिक छवि वाले की मदद लेनी पड़ी. डीजीपी समेत किसी भी पुलिस अधिकारी पर उन्हें भरोसा नहीं रहा. भला बताइए, मुख्यमंत्री ख़ुद बोले कि रणवीर और उनके लोग नहीं होते तो सभा-स्थल पर वो नहीं पहुँच पाते. शर्म करिए!''

नीतीश की यात्रा

नीतीश को कई जगहों पर विरोध भी झेलना पड़ा है

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने इसी मुद्दे पर नीतीश सरकार के ख़िलाफ़ गुरुवार को खगडिया बंद का आयोजन किया.

पार्टी नेताओं का आरोप है कि ये सरकार अपराधी को शाबाशी और वेतन की मांग करने वाले शिक्षकों को सज़ा दे रही है.

उधर नीतीश कुमार अपनी जनसभाओं में लालू प्रसाद का सीधे नाम लिए बिना ऐसे विरोध प्रदर्शनों के पीछे उनकी भूमिका बताते हैं.

बयानों से पटका-पटकी

इस बाबत मुख्यमंत्री के कई जुमले चर्चित हो उठे है. मसलन,'' सुशासन और विकास देखकर जलन से कुछ लोगों की छाती फटती रहती है. बेचैनी की सुई लेकर घूमने वाले को उकसाने-भड़काने का काम यही लोग करते हैं. देश ही नहीं, दुनिया भर को पता है कि बिहार अंधकार से रोशनी की तरफ़ बढ़ा है, पर ये सब इन्हें नहीं सूझता. लाठी रैली करने वालों का ज़माना गया.''

कटाक्ष भरी इन बातों की प्रतिक्रिया में लालू प्रसाद भी गंवई अंदाज़ वाली बातों के गोले दागते रहते हैं, ''चुनौती क़बूल है लालू को. आओ मैदान में पटका-पटकी हो जाए. क्या समझ लिया है कि विकास का फ़र्ज़ी प्रचार और 'विशेष राज्य दर्जा' वाला ढोंग रचा के गैंगरेप, घूसखोरी, हत्या, लूट और अपहरण की बढ़ती घटनाओं पर परदा डाल देंगे?''

ज़ाहिर है कि लालू यादव इस बीच नीतीश कुमार की प्रचारित छवि को कई मामलों में लगे आघात का राजनीतिक लाभ लेने निकल पड़े हैं. लेकिन ख़ुद की पुरानी छवि ही उनकी सबसे बड़ी मुश्किल बन जाती है.

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