अमीर-गरीब की खाई उजागर करता गलियारा

  • 25 सितंबर 2012
चिराग दिल्ली में बीआरटी कॉरीडोर

दिल्ली के भीषण ट्रैफिक जाम में बसों की आवाजाही को आसान करने के लिए बनाया गया विशेष गलियारा या बीआरटी कॉरीडोर अमीरों और गरीबों के बीच की खाई का प्रतीक बन गया है.

अंबेडकर नगर से मूलचंद के बीच 5.8 किलोमीटर तक बसों के लिए बनाए गए इस गलियारे में कार वालों को घुसने की इजाजत नहीं है.

पर इस व्यवस्था के खिलाफ़ कार वालों की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट में मुकद्दमा दायर करने वाले रिटायर्ड सैनिक अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल बीबी शरण मानते हैं कि सार्वजनिक वाहनों को सहूलियत देने के कारण कार वाले मुश्किलों का सामना कर रहे हैं.

बीबीसी हिंदी से एक बातचीत में उन्होंने कहा, “कार वाले दौलत पैदा करने वाले लोग हैं. क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ट्रैफिक जाम के दौरान अपनी कारों में बैठे बैठे ये लोग कितने थक जाते हैं और उसी हालत में दफ्तर पहुँचते हैं. क्या आप चाहते हैं कि वो घटिया काम करें?”

शरण की याचिका के बाद अदालत के कहने पर दिल्ली सरकार ने बीआरटी की उपयोगिता के बारे में एक अध्ययन करवाया. केंद्रीय सड़क अन्वेषण संस्था (सीआरआरआई) की ओर से किए गए इस अध्ययन में इस गलियारे को अव्यावहारिक बताया गया.

अव्यावहारिक?

लेकिन पर्यावरण के मामलों की जानकार और सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरमेंट (सीएसई) की प्रमुख सुनीता नारायण कहती हैं कि सीआरआरआई ने सिर्फ कार वालों से बातचीत के आधार पर बीआरटी को अव्यावहारिक बताया है.

'डाउन टू अर्थ' पत्रिका के ताजा अंक में नारायण ने लिखा है, “कार ज्यादा जगह घेरती हैं, सड़कों में भीड़ बढ़ाती हैं और कम लोगों को इधर से उधर ले जाती हैं. अगर हमारे शिक्षित सड़क योजनाकार गाड़ियों की बजाए लोगों की संख्या पर ध्यान देंगे तो उन्हें पता चलेगा कि क्या व्यावहारिक है और क्या नहीं.”

समाजशास्त्री मानते हैं कि सार्वजनिक बसों और निजी कारों को लेकर चल रही बहस उस मानसिकता को उजागर करती है जो दिल्ली शहर में मुगल काल से ही मौजूद है.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पुष्पेश पंत कहते हैं, ये जाति के आधार पर भेदभाव करने वाली उस मानसिकता का नतीजा है जो इस शहर को सामंती-अफसरशाही विरासत से मिला है.

उनका कहना है कि ये पूरी बहस दिल्ली शहर की उस स्थिति को उजागर करता है जिसमें कार को एक सुविधा की बजाए सामाजिक रुतबे और रुआब की वस्तु के तौर पर देखा जाता है.

दिल्ली में बसों के लिए खास गलियारा बनाने का विचार इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के कुछ प्रोफेसरों और सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों ने 1995 में सामने रखा. इस टीम की एक सदस्य प्रोफेसर गीतम तिवारी ने बीबीसी हिंदी सेवा को बताया कि इसकी प्रेरणा ब्राजील के क्यूरितिबा शहर से मिली जहाँ 1975 से ही बीआरटी का इस्तेमाल किया जा रहा था.

एक ही रास्ता

लेकिन केंद्र सरकार ने इसके एक दशक बाद ही शहरी यातायात नीति बनाई और इसके जरिए सड़कों पर वाहनों की बजाए लोगों को प्राथमिकता देने का फैसला किया.

इसके तहत दिल्ली शहर में सार्वजनिक वाहनों के लिए 14 विशेष गलियारे बनाए जाने की योजना थी लेकिन पहला प्रयोग ही अदालत के विवाद में फँस गया.

प्रोफेसर गीतम तिवारी कार वालों के पक्ष में अभियान चलाने वालों से असहमति जताते हुए कहती हैं कि “आम जनता” की परिभाषा में सिर्फ कार वाले ही नहीं बल्कि पैदल चलने वाले और साइकिल से चलने वालों को भी शामिल किया जाना चाहिए.

प्रोफेसर तिवारी कहती हैं,"कार वालों की समस्या को मीडिया में आम जन की समस्या के तौर पर पेश किया जा रहा है. सच तो ये है कि दिल्ली में दस प्रतिशत से भी कम लोग कार का इस्तेमाल करते हैं. तैंतीस प्रतिशत से ज्यादा लोग बस से सफर करते हैं और तीस प्रतिशत पैदल चलते हैं."

लेकिन बीआरटी के खिलाफ अभियान चलाने वाले बीबी शरण कहते हैं कि कार से सफर करने वाले महत्वपूर्ण लोग होते हैं इसलिए उन्हें प्राथमिकता दी जानी चाहिए. शरण कहते हैं, “जब सेना आदेश लेने के लिए इंतजार कर रही हो तब आप सेनापति को ट्रैफिक में रोक कर नहीं रख सकते. अगर एक चपरासी दफ्तर पाँच मिनट देर से भी पहुँचे तो क्या फर्क पड़ने वाला है.”

भेदभाव की व्यवस्था?

लेकिन दिल्ली शहर में बस से सफर करने वालों का विचार अलग है.

बिहार से आकर दिल्ली में एअरकंडीशनरों की मरम्मत करने जीविका चलाने वाले सलमान बसों में सफर करते हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, नौकरी पर रखते समय हमें बताया जाता है कि हमें सुबह दस बजे से पहले काम पर पहुँचना है. ऐसा क्यों कहा जाता है? क्योकि मालिक हमसे काम लेना चाहता है. इसलिए हमारा वक्त पर दफ्तर पहुँचना ज्यादा जरूरी है क्योंकि काम तो हम ही करते हैं, वो नहीं.

दिल्ली के एक और निवासी अविनाश चौधरी भी बस से ही सफर करते हैं. वो कहते हैं कि भारत सिर्फ़ अमीरों का है, गरीबों को यहाँ कोई नहीं पूछता.

उन्होंने कहा, “कार में सफर करने वाले आम तौर पर बड़े अधिकारी या प्रभावशाली लोग होते हैं. अगर वो चार घंटे देरी से भी पहुँचे तो कोई उन्हें गैरहाजिर नहीं कहेगा. पर डेढ़ सौ रुपए कमाने वाला दिहाड़ी मजदूर अगर समय पर नहीं पहुँचता तो उसे अनुपस्थित मान लिया जाता है.”

अदालत के बाहर चल रही इस बहस के बीच दिल्ली हाईकोर्ट ने कुछ समय पहले हुई सुनवाई के दौरान सिद्धांतत: बसों को विशेष गलियारा दिए जाने का समर्थन किया है. अदालत ने सरकार से कहा है कि बीआरटी को बचाने के लिए कोई रास्ता ढूँढा जाना चाहिए.

मगर अदालत में मुकद्दमा लड़ रहे लोग अंत तक लड़ाई लड़ने की बात कहते हैं क्योंकि वो मानते हैं कि उनके मुताबिक दिल्ली में कार वालों के साथ अन्याय किया जा रहा है.