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करोड़ों में मिल पाईं गाँधी की चिट्ठियां

 मंगलवार, 18 सितंबर, 2012 को 08:13 IST तक के समाचार
महात्मा गांधी

हमेशा कटौती का समर्थन करने वाले महात्मा गांधी इस बारे में न जाने क्या कहते.

सात करोड़ 59 लाख 50 हज़ार 719 रुपए- ये वो राशि है जो भारत सरकार ने महात्मा गांधी और उनके मित्र हर्मन कालेनबाख से जुड़े अभिलेखों को इसराइल में मौजूद कालेनबाख की एक रिश्तेदार से हासिल करने के लिए चुकाई है.

बीबीसी ने सरकारी फ़ाइलों में पाया है कि जब भारत सरकार ने पहली बार ये दस्तावेज़ हासिल करने के बारे में सोचा तो वो 40 से 50 हज़ार डॉलर (यानी लगभग 20 से 30 लाख रुपए) ख़र्च करना चाहती थी और किसी भी हालत में नहीं चाहती थी कि यह एक लाख डॉलर (यानी लगभग 55 लाख) से अधिक हो.

मगर जब सरकार कालेबनाख की प्रपौत्री से इन दस्तावेज़ों के लिए मोल-भाव करना पड़ा तो अंत में उसे अपने अनुमान से कई गुना ज़्यादा क़ीमत अदा करनी पड़ गई.

पिछले महीने यानी एक अगस्त को वर्जिन एयरलाइंस की एक उड़ान से इन दस्तावेज़ों से लदा हुआ लगभग 50 किलो का एक पैकेट दिल्ली पहुंचा था.

बीबीसी को मिले दस्तावेज़ों के मुताबिक़ पाउंड में इनकी क़ीमत आठ लाख 25 हज़ार 250 दिखाई गई थी.

ऐसा माना जाता है कि इनमें महात्मा गांधी और एक यहूदी आर्किटेक्ट हर्मन कालेनबाख की दोस्ती का विवरण देने वाले कुछ दस्तावेज़ भी शामिल हैं.

कहां मिले दस्तावेज़

केंद्रीय संस्‍कृति मंत्री कुमारी शैलजा

"सारिद परिवार ने इन अभिलेखों के लिए पांच मिलियन डॉलर की राशि रखी थी. भारत सरकार ने यह पेशकश विचारार्थ स्‍वीकार कर ली. आखिरकार इसके लिए 825,250 पाउंड की राशि तय हुई, जो महज 1.28 मिलियन डॉलर के बराबर है."

साल 2011 में इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने इन चिट्ठियों को सबसे पहले इसराइल में कालेनबाख की प्रपौत्री इसा सारिद के पास देखा और सरकार को इस बारे में जानकारी दी. उन्होंने कहा कि इसमें कई ऐतिहासिक दस्तावेज़ हैं.

भारत सरकार इसके बाद हरकत में आ गई और इसराइल में भारत के राजदूत नवतेज सरना सरकार के लिए सारिद परिवार से बातचीत करने लगे और इसमें राजनीति के विशेषज्ञ प्रोफेसर सुनील खिलनानी की भी मदद ली गई.

गुहा और खिलनानी की राय जानने के बाद सरकार की ओर से सारिद परिवार को 40 से 50 हज़ार डॉलर तक का प्रस्ताव दिया गया. बाद मे इसे बढ़ा कर 70 हज़ार डॉलर और फिर एक लाख डॉलर कर दिया गया लेकिन सारिद परिवार की मांग कई गुना ज़्यादा थी. उन्होंने 50 लाख डॉलर यानी कि लगभग 27 करोड़ रुपए की मांग रखी थी.

क्या कहा पीएम ने

कैसे हुआ इतना खर्च

6 जुलाई को करार हुआ तो कुल कीमत थी 8,25,250 पाउंड

तब पाउंड की कीमत 86.34 रुपए थी लेकिन 9 जुलाई को इसमें 52 पैसे वृद्धि हो गई थी

इस तरह भारत को चार लाख 38 हज़ार रुपए अतिरिक्त चुकाने पड़े. यानी कुल सात करोड़ 59 लाख 50 हज़ार 719 रुपए

लेकिन बाद में कस्टम विभाग ने 42.53 लाख रुपए की डयूटी माफ कर दी

केंद्रीय सांस्कृतिक मंत्री कुमारी शैलजा ने अधिकारियों और गुहा तथा खिलनानी जैसे विशेषज्ञों की राय जानने के बाद इस मांग को 'बहुत अधिक' क़रार दिया. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी कहा था कि यह बहुत अधिक है और भारत को इतना पैसा नहीं देना चाहिए.

यह तय किया गया कि भारत इतना पैसा नहीं देगा और नौबत बातचीत ख़त्म होने तक पहुंच गई.

सारिद परिवार ने तो सारे कागज़ ब्रिटेन के नीलामी घर सदबी को दे दिए थे. इसका मतलब यह था कि अब भारत सरकार को सदबी और सारिद दोनों से बातचीत करनी पड़ी.

सारिद परिवार ने अपनी मांग कम कर दी और आख़िरकार लगभग 12.8 लाख डॉलर में यह क़रार हो गया. सारिद परिवार को दी गई रक़म के अलावा भारत को सदबी को एक करोड़ रुपए से अधिक कमीशन भी देना पड़ा.

छह जुलाई को समझौता होने पर सरकार ने अपनी पीठ थपथपाते हुए यह तो कह दिया कि उसने मांगी गई रक़म से कहीं कम में यह क़रार किया है लेकिन सरकार यह भूल गई कि दी गई रक़म उसके अपने अनुमानों और तय की गई रक़म से कहीं अधिक थी.

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