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साइबर क्राइम बनाम किशोर, दंड जरुरी है?

 सोमवार, 17 सितंबर, 2012 को 21:32 IST तक के समाचार

भारत के किशोर,युवावर्ग में तेजी से सोशल माडिया का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है.

भारत में इंटरनेट और खासकर सोशल मीडिया पर किशोरों की तादाद लगातार बढ़ रही है.

जाहिर है किशोरों से सोशल मीडिया पर गलतियां भी होती हैं. ये गलतियां आपत्तिजनक तस्वीरें लगाने से लेकर अश्लील टिप्पणियां या वीडियो अपलोड करने तक शामिल होती हैं जिसका खामियाजा कई बार अन्य लोगों को भुगतना पड़ा है.

भारत के सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत ये मामले साइबर क्राइम यानि साइबर अपराध के होते हैं जिसके तहत कड़ी सज़ा का प्रावधान है. लेकिन सवाल ये है कि क्या किशोर बच्चों को सज़ा दी जानी चाहिए या उनके साथ नरम रवैया अख्तियार करना चाहिए.

सरकार इस तरह के एक मसौदे पर विचार कर रही है जिससे पहले हमने क्लिक करें बीबीसी के फेसबुक पन्ने पर लोगों के विचार जानने की कोशिश की.

नैतिक शिक्षा का पाठ

इस बहस में हिस्सा लेते हुए आर पुष्प कहते है कि नैतिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में नेट पर अनुशासित रहने का पाठ भी शामिल किया जाना चाहिए.

हालांकि कृष्ण कुमार की राय थोड़ी अलग है वो कहते हैं कि नाबालिग होने के नाते उन्हें कोई कड़ी सजा नही मिलती चाहे वो बलात्कार या फिर हत्या ही क्यों न करें, उन्हें ये बताना होगा कि इंटरनेट पर गलत क्या है और सही क्या है.

हरिशंकर साथी का कहना है कि भारतीय समाज की अगर बात करें तो यहाँ का युवक हर तरफ केवल सैक्सुअली ही सोच रहा है. यौन मादकता का खुमार उनकी आँखों में हैं. बड़े शहरो से लेकर छोटे गाँव कस्बों तक के युवाओं में नारी देह के प्रति एक तरह का आकर्षण कुंठित कर चुका है. ऐसे उदहारण है कि जिले में यदि महिला अधिकारी डीएम जैसे ऊँचे पद पर होती है तब भी वहाँ के इलाकों में उसके काम से ज्यादा चर्चा महिला अधिकारी के व्यक्तिगत बातों की होती है. इस प्रकार के युवा मानस को जब निर्बाध स्वतंत्रता के साथ इन्टरनेट मिलता है है तो उससे उनकी वही कुंठाएं बाहर आने लगती है. जिसका रूप इस तरह की सामग्रियों में आ रहा है.

प्रवीन नारायण चतुर्वेदी कहते हैं कि उम्र के हिसाब से गुण और दोष आना स्वाभाविक है. किशोरों में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण भी स्वाभाविक ही है. इसलिए अभिभावकों को अपने बच्चों (किशोरों) के प्रति सतर्क रहकर उन्हें ऐसे माहौल में पालें जिससे उनकी प्रवृत्तियाँ सार्थक कार्य की ओर ज्यादा हों न कि निरर्थक अश्लील तस्वीर और भद्दे टिप्पणियों से इन्टरनेट का दुरुपयोग के तरफ. किशोरों को समुचित शिक्षा देकर इसके बुराइयों से दूर रखा जा सकता है.

कानून की जानकारी

महेंद्र सिंह इस बात को मानते हैं कि गलतियाँ हो रही है लेकिन ये सब अनजाने में हो रहा है , कानून की सही जानकारी का होना इसके लिये बहुत जरुरी है, कानून की जानकारी न होना माफी लायक नहीं है.

नीरज कुमार इंटरनेट को नियंत्रित किए जाने की बात कहते हैं, उनका मानना है कि कुछ चीजें प्रशासकीय हस्तक्षेप के जरिए नियंत्रित होनी ही चाहिए..इंटरनेट की सर्वसुलभता किसी की निजता को भंग करने या आधुनिकता का लबादा ओढ़कर मनचाहा उन्मुक्त आचरण के लिए नहीं हैं.

सुशील मौर्य कहते हैं कि आज के बच्चों को जितना समझाओ वो उसे समझेंगे तो जरुर लेकिन बिनी गलती किए नही.

फिल्टरेशन की जरुरत

अभिमन्यु कुमार एक सुझाव देते है कि फेसबुक के सॉफ्टवेयर में कुछ सुधार कर ऐसा करना चाहिए कि अश्लील चित्र अपलोड ही न हो सकें.

जगजीत सिंह का मानना है कि किशोर अपरिपक्व होते हैँ, गलत टिप्पणियां कर देते हैँ, इससे महौल तो खराब होता ही है, सोशल मीडिया पर ये नहीं देखा जाता कि टिप्पणी करने वाला बच्चा है या बडा. कुछ असामाजिक तत्व सामाजिक समरसता व सद्‌भाव को बिगाङने कि कोशिश भी करते हैँ, अत: फिल्टरेशन होनी ही चाहिए.

अमित वर्मा भी प्रतिबंधों की वकालत करते हैं और कहते हैं कि आपत्तिजनक टिप्पणियोँ फोटो आदि पर रोक लगनी चाहिए चाहे उसके लिए थोड़े कड़े कदम ही क्योँ न उठाने पड़ेँ हाँ कटाक्ष या हास्य के शालीन माध्यम से अपनी बात रखने का अधिकार भी होना चाहिए आज पोर्न से ज्यादा खतरा धार्मिक भावनाओँ को भड़काने वाली टिप्पणियोँ और फोटो से से है जो देश का माहौल खराब कर सकते हैँ

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