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सिवाकासी: पटाखों की गिरफ़्त में ज़िंदगी

 बुधवार, 12 सितंबर, 2012 को 18:23 IST तक के समाचार

पाँच सितंबर को पटाखा बनाने वाली एक फ़ैक्टरी में लगी आग से 39 लोगों की मौत के बाद क्या सिवकासी में बदलाव आएगा?

इस दुर्घटना के बाद सिवकासी के सरकारी अस्पताल में भर्ती हेराम, सेल्वी, सुबलक्ष्मी जैसे दूसरे मरीज सकते में हैं.

हेराम सामान उतारने और लादने का काम करते थे और उनका पाँव जल गया है. सुबलक्ष्मी बारूद से भरे पटाखों में पलीता लगाती थीं और सेल्वी पैकेजिंग डिपार्टमेंट में थीं.

महीने भर पहले रसायन मिलाते वक्त जल चुके पुम्मेराज, सालों से सांस की समस्या से जूझ रहे सुबैय्या और टीबी से पीड़ित चिन्नकन्ना भी अपना काम जारी रखने को मजबूर हैं.

सिवाकासी की दूसरी फैक्टरियों के मजदूर भी इस घटना से डरे हुए हैं, लेकिन सिवाकासी में गरीबों के लिए कोई दूसरा काम नहीं है. पेट भरना है तो यही काम करना पड़ेगा.

एक फ़ैक्टरी मालिक ने बताया कि विरुद्धनगर जिले के 15 लाख लोगों में से करीब साढ़े सात लाख लोग इस काम से जुड़े हैं. सिवकासी विरुद्धनगर जिले का हिस्सा है.

पटाखों की गिरफ़्त में ज़िंदगी

सिवकासी में पटाखों के पोस्टरों पर हैरी पॉटर के सितारों से लेकर स्वामी विवेकानंद की तस्वीरें भी मिल जाएंगी

लोगों को पता है कि काम में खतरा है, लेकिन पटाखों ने जैसे उनकी जिंदगी को जकड़ रखा है.

सिवाकासी की सड़कों के किनारे पटाखों की तस्वीरों से सजे बोर्ड, पोस्टर, कंपनियों के नाम पर स्कूल कॉलेज और शोरूम हैं.

पोस्टरों पर हैरी-पॉटर से लेकर फिल्मी सितारों और विवेकानंद की तस्वीरें हैं. हमें गाँवों में कई लोग पटाखों से जुड़े काम जैसे कागज के खोखे, कवर बनाते दिखे.

कई लोगों ने बताया कि फैक्टरी के धूल भरे माहौल में काम करने से उन्हें सांस लेने की शिकायत है. उन्हें टीबी और संक्रमण की भी शिकायत है. डॉक्टरों के मुताबिक फैक्टरियों में काम करने वालों को ये बीमारियाँ दूसरे लोगों से ज़्यादा होती हैं.

सिवाकासी कस्बे से थोड़ा बाहर जाकर मुख्य रास्ते से कटकर एक रास्ता गाँव सुक्रवारपट्टी की ओर जाता है.

पुम्मेराज का दर्द

सिवकासी

मज़दूरों को प्रशिक्षण देने जैसा कोई प्रावधान नहीं दिखा

रात हो चुकी थी और हम ढूँढ़ते हुए पहुँचे बाहर तख्त पर बैठे 48 साल के पुम्मेराज के पास.

सबसे पहले ध्यान गया उनके बाएँ हाथ और पीठ पर जल जाने के दाग पर. उनकी पत्नी और दो छोटे बच्चे बगल में शांत बैठे हुए थे.

एक महीने पहले ही सोनी फायरवर्क्स में सल्फर, पोटैशियम नाइट्रेट और चारकोल पाउडर को मिलाते वक्त आग लग गई थी जिसके उनका ये हाल हुआ. पटाखे के लिए रसायनों को मिलाना सबसे खतरनाक काम माना जाता है.

पुम्मेराज कुछ दिन अस्पताल में रहे, अभी घर में आराम कर रहे हैं, उसके बाद फिर पुराने काम पर जाएंगे.

पुम्मेराज कहते हैं, “क्या करूँ, और कोई दूसरा काम यहाँ नहीं है.” कई दूसरे मजदूरों की तरह ना ही उन्हें कोई प्रशिक्षण दिया गया, ना खतरों के बारे में बताया गया.

अभी दवाई चल रही है. कंपनी की ओर से हर दिन का 160 रुपए उन्हें घर पर मिल रहा है. शरीर पर लगाने के लिए तेल का खर्चा भी कंपनी दे रही है. इसी गाँव के सुबैय्या तो धमाकों से इतना डर गए हैं कि नौकरी छोड़कर मछली का व्यापार शुरू करना चाहते हैं, लेकिन कैसे करेंगे ये पता नहीं है.

'कइयों को मरते देखा है...'

"चार साल पहले एक फ़ैक्टरी में धमाके के बाद मैने अपनी आखों से एक बूढ़े व्यक्ति की खोपड़ी को बारूद से उड़ते हुए देखा. पास एक लड़की जिंदगी का आखिरी सांसे गिन रही थी. बगल में पड़े एक व्यक्ति के अंग बिखरे थे."

सुबैय्या

37 वर्षीय सुबैय्या से हमारी मुलाकात सिवाकासी के सरकारी अस्पताल में हुई. दुबले पतले सुबैय्या ने सफेद कमीज पहनी थी. मुस्कुराते हुए उन्होंने हमारा स्वागत किया.

वो पिछले 17 सालों से पटाखे की फ़ैक्टरी में काम कर रहे हैं. कई सालों से सांस लेने में समस्या है. पूरे शरीर में दर्द भी रहता है.

हफ्ते के सातों दिन कंपनी की बस से सुबह आठ बजे फ़ैक्टरी पहुँचना और शाम पाँच बजे तक पसीना बहाना, फिर शाम को सा़ढ़े सात बजे घर पहुँचना. वो ये सब-कुछ दिन के 150 रुपए के लिए करते हैं.

इन 17 सालों में कई बार लोगों को मरते देख चुके हैं.

आठवीं कक्षा तक पढ़े सुबैय्या कहते हैं, “चार साल पहले एक फ़ैक्टरी में धमाके के बाद मैने अपनी आखों से एक बूढ़े व्यक्ति की खोपड़ी को बारूद से उड़ते हुए देखा. पास एक लड़की जिंदगी की आखिरी सांसे गिन रही थी. बगल में पड़े एक व्यक्ति के अंग बिखरे थे.”

इतनी भयावह घटना का जिक्र करते वक्त भी उनके चेहरे पर सामान्य भाव थे.

फ़ैक्टरी में उनका काम था बिना किसी दस्ताने के सल्फर, कोयले के बुरादे और पोटाश को मिलाकर छानना, उसे बोरे में डालकर फिर दूसरे सेक्शन को दे देना. काम के कुछ साल बाद ही उन्हें सांस लेने में शिकायत होने लगी. डॉ़क्टरों ने सख्त मना किया, लेकिन काम जारी रहा.

बिना ट्रेनिंग के काम

मुर्गेश्वरी और दुर्गा

मुर्गेश्वरी और उनकी बेटी दुर्गा सिवकासी में हुई ताज़ा दुर्घटना के बाद डरी हुई हैं.

धीरे-धीरे पता चला कि सल्फर, अमोनियम नाइट्रेट, अल्युमीनियम पाउडर, क्यूप्रिक ऑक्साइड जैसे रसायन कितने खतरनाक हैं. डर लगा, लेकिन काम जारी रहा.

क्या उन्हें कोई प्रशिक्षण दिया गया? सुबैय्या कहते हैं, “नहीं. काम करते-करते सीख गया. जब सुपरवाइज़र को नहीं पता तो वो क्या सिखाएगा?”

ये कह कर वो जोर-जोर से हंसने लगे.

सुबैय्या ने हमें अगले दिन अपने घर पर बुलाया. कहा और लोगों से मिलवाएँगे जो फ़ैक्टरी में घायल हुए लेकिन किसी तरह जिंदगी गुजार रहे हैं. लेकिन घर पहुँचने पर उन्होंने बताया कि लोग इतने डरे हुए हैं कि उन्होंने मिलने से मना कर दिया है.

सुबैय्या ने कहा, “अगर कंपनियों को पता चल गया कि मैं आपको इन लोगों से मिलवा रहा हूँ तो मेरे लिए मुश्किल हो जाएगी.”

इसी गाँव के चिन्नकन्ना ने पहले माचिस बनाने वाली फ़ैक्टरी में काम किया. अभी पटाखे की फ़ैक्टरी में काम कर रहे हैं. उन्हें कई सालों से टीबी है. वो भी मायूस हैं, लेकिन बार-बार दूसरा काम नहीं मिलने की मजबूरी की दुहाई देते हैं.

दीपलकक्ष्मी फायरवर्क्स फ़ैक्टरी में मेरी मुलाकात मुर्गेश्वरी और उनकी माँ दुर्गा से हुई. दोनो ही ताजा दुर्घटना से डरी हुई हैं.

दुर्गा कहती हैं कि हर फ़ैक्टरी की हालत खराब नहीं है औऱ कई बार घटनाओं के लिए जिम्मेदारी मजदूरों की भी होती है. उनके मुताबिक मजदूर कभी-कभी काम निपटाने के लिए जल्दी काम करते हैं जिससे दुर्घटना हो जाती हैं.

कई दूसरे उद्योगों की तरह इस उद्योग में भी जरा सी असावधानी भी घातक होती है.

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