ग्लोबल गांव में हिंदी

 बुधवार, 12 सितंबर, 2012 को 11:03 IST तक के समाचार
ग्लोबल गांव में हिंदी

भूमंडलीकरण का पहला प्रहार भाषा पर होता है- प्रभु जोशी

भारत में 1991 में अपनाई गई नई आर्थिक नीति से भूमंडलीकरण की शुरुआत हुई.

भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के नए आर्थिक परिदृश्य ने सूचना क्रांति की मदद से पूरी दुनिया को एक गांव में तब्दील कर दिया. इंटरनेट ने दुनिया के एक कोने को दूसरे कोने से जोड़ दिया, भौगोलिक दूरी के मायने धुंधले हो गए.

दुनिया का ज्ञान सुलभ हुआ तो सभ्यताओं के बीच संवाद में भी तेज़ी आई. भारत भी इससे अछूता नहीं रहा.

भूमंडलीकरण ने भारत का आर्थिक माहौल बदला तो साथ ही इसने यहां के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को भी प्रभावित किया.

विदेशी फिल्में, भाषा, साहित्य, खानपान, वेशभूषा, आचार-व्यवहार सब आपस में घुलने-मिलने लगे. लेकिन इसका भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी और उसके साहित्य पर क्या असर हुआ. क्या वो समृद्ध हुई या फिर अंग्रेज़ी के सामने कहीं पिछड़ने लगी?

एक भाषा की शर्त

"भूमंडलीकरण की जो सैद्धांतिकी है वो एकरुपता के पक्ष में जाती है. वो मानती है कि अगर एक भाषा होगी तो भूमंडलीकरण के विस्तार में मददगार साबित होगी"

प्रभु जोशी, सामाजिक विश्लेषक

भाषा पर भूमंडलीकरण के प्रभाव का अध्ययन करने वाले विद्वान प्रभु जोशी कहते हैं, “भूमंडलीकरण की जो सैद्धांतिकी है वो एकरुपता के पक्ष में जाती है. वो मानती है कि अगर एक भाषा होगी तो भूमंडलीकरण के विस्तार में मददगार साबित होगी.”

वो आगे समझाते हैं कि भारत एक बहुभाषा-बोली वाला देश है और साथ ही ये एक बहुत बड़ा बाज़ार है. यहां बाज़ार के विस्तार की एक बहुत बड़ी शर्त है कि लोग एक ही भाषा में संवाद करें, इसीलिए एक सोची समझी रणनीति के तहत अंग्रेज़ी का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है. इसे ज्ञान-विज्ञान और तरक्की की भाषा के रूप में पेश किया जा रहा है.

प्रभु जोशी के मुताबिक़ भूमंडलीकरण का प्रसार करनेवाले लोगों की कोशिश ये है कि एक ही पीढ़ी में भाषा बदल दी जाए नहीं तो ऐसा हो सकता है कि अगली पीढ़ी अतीत की ओर मुड़कर अपने जड़ों की तलाश करने लगे और उनके उद्देश्य पूरे न हो पाएं.

विज्ञापन की भाषा

धर्मवीर भारती का ये उपन्यास चेतन भगत के उपन्यासों की तरह ही लोकप्रिय हुआ था

ये तो हुई भाषा के स्तर पर भूमंडलीकरण के असर की एक व्याख्या लेकिन क्या हिंदी का साहित्य भी इससे प्रभावित हुआ है.

इलाहाबाद में रहनेवाले हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार बद्रीनारायण कहते हैं, “भूमंडलीकरण ने हिंदी को बाज़ार तो दिया है लेकिन वो बाज़ार में सिर्फ विज्ञापन की भाषा होकर रह जा रही है. साहित्य और संस्कृति की भाषा के रूप में जो हिंदी थी उसकी संभावनाओं और क्षमता को इस भूमंडलीकृत बाज़ार ने मारा है. इससे हिंदी साहित्य हाशिए पर पहुंचता जा रहा है.”

बद्रीनारायण आगे कहते हैं कि पहले दूरदर्शन पर, समाचार पत्रों में, पत्रिकाओं में कविता-कहानी की एक जगह हुआ करती थी लेकिन अब धीरे-धीरे इसका स्पेस कम होता जा रहा है.

लेकिन इस कम होते स्पेस का नतीजा क्या निकलेगा. क्या हिंदी का साहित्य खत्म हो जाएगा या फिर उसका स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा.

नई पीढ़ी से संवाद की ज़रूरत

पुरुषोत्तम अग्रवाल, आलोचक

"भारत की 54 फीसदी आबादी 25 साल से कम उम्र के नौजवानों की है. भूमंडलीकरण ने उसकी आकांक्षाएं और चिंताएं बदली हैं"

हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं कि भूमंडलीकरण ने भारतीय जीवन को गहरे में जाकर प्रभावित किया है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हिंदी खत्म हो जाएगी और अंग्रेज़ी उसका स्थान ग्रहण कर लेगी.

बाज़ार की संस्कृति से अब भारत के छोटे-बड़े शहर और गांव भी अछूते नहीं रहे, लेकिन महानगरों के जीवन को देखकर हिंदी के भविष्य को लेकर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए.

वो कहते हैं, “भारत की 54 फीसदी आबादी 25 साल से कम उम्र के नौजवानों की है और भूमंडलीकरण ने उसकी आकांक्षाएं और चिंताएं बदली हैं. सूचना और आभासी दुनिया की नागरिकता के धरातल पर ग्वालियर, गुना और दिल्ली के युवा में ज़्यादा फर्क नहीं है. दोनों एक वर्चुअल वर्ल्ड में जी रहे हैं और रियल टाइम में चैट कर रहे हैं.”

प्रोफ़ेसर अग्रवाल कहते हैं कि टेलीविज़न के ज़रिए आज की पीढ़ी सारी दुनिया को अपने आसपास घटते देख रही है. इस क्रांति से जो कनेक्टिविटी का नया बोध उत्पन्न हुआ है, जो नई समस्याएं उत्पन्न हुई हैं और जो मर्यादा के नए प्रतिमान विकसित हुए हैं. उसे आज का हिंदी लेखक पकड़ नहीं पा रहा है. इस पीढ़ी से संवाद नहीं बना पा रहा है. इसीलिए आज के युवा किसी हिंदी लेखक को पढ़ने की बजाए चेतन भगत के उपन्यासों को मूल रूप में या उसके हिंदी अनुवाद को पढ़ना पसंद करते हैं.

"ये सच है कि अंग्रेज़ी का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है लेकिन साथ ही भाषा के स्तर पर एक नई शब्दावली का भी गठन हो रहा है जो आज के जीवन यथार्थ को पकड़ने में मददगार हो रही है और इस तरह हिंदी एक समृद्ध भाषा बन रही है"

अलका सरावगी, हिंदी लेखिका

ऐसे में हिंदी के सामने रास्ता क्या है. वो कैसे भूमंडलीय चुनौतियों का सामना कर सकती है.

इसका उत्तर देते हुए वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव कहते हैं, “हिंदी का लेखक आज की नब्ज़ को पकड़ने की बजाए महान साहित्य रचना चाहता है. जब वो इस ग्रंथि से आज़ाद हो जाएगा और वो उन विषयों की ओर जाएगा और उन संवेदनशीलताओं को पकड़ेगा जो आज के जीवन की सच्चाई है तो शायद ऐसी चीज़ लिखी जा सकेगी जिसे बड़े पैमाने पर पाठक पढ़ेंगे. हिंदी में क्षमता कम है ऐसा मैं नहीं मानता.”

हिंदी की इसी क्षमता और उसके उत्तरोत्तर सक्षम होने की ओर इशारा करते हुए ‘कलिकथा वाया बाइपास’ नामक उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखिका अलका सरावगी कहती हैं, “ये सच है कि अंग्रेज़ी का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है लेकिन साथ ही भाषा के स्तर पर एक नई शब्दावली का भी गठन हो रहा है जो आज के जीवन यथार्थ को पकड़ने में मददगार हो रही है और इस तरह हिंदी एक समृद्ध भाषा बन रही है.”

वो कहती हैं कि ज़रूरत इस बात की है कि सरकार के स्तर पर और लेखकीय स्तर पर भूमंडलीकरण के इस दौर को सकारात्मक रूप से लिया जाए.

दुनिया के साहित्य और अनुभवों से सीखा जाए और भारतीय साहित्य को वैश्विक बनाया जाए लेकिन ये तभी संभव है जब आज के लेखक वर्तमान समय की सच्चाइयों और प्रवृत्तियों को अपने अंदर पचाकर और उसकी परिणतियों को समझकर रचना करें.

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