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कोयले में जल रही है मजदूरों की ज़िंदगी

 बुधवार, 12 सितंबर, 2012 को 07:52 IST तक के समाचार
कोयला खदान

धू-धू कर जलती हुई आग की लपटें और उस पर ज़हरीली गैस का रिसाव. चारों तरफ काली धूल की चादर और अँधेरा.

ज़मीन के गर्भ में धधकती आग के बीच हजारों मज़दूर रात दिन कोयला निकालने का काम कर रहे हैं. एक तो खदान के अंदर बड़ी गर्मी और उमस, दूसरे इनमें ज़हरीली गैस का रिसाव.

यह है भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) का एरिया नंबर दस. यह पूरे कोयलांचल का सबसे संवेदनशील इलाका है क्योंकि इस पूरे इलाके को निगल रही है एक सदी से भी ज्यादा से धधक रही भूमिगत खदानों में लगी आग.

तीन पालियों में एक दल खदान से ऊपर आता है तो दूसरा नीचे गहरी खोह में जाने को तैयार. लेकिन मज़दूरों के काम करने की जगह जितनी कठिनाइयों से भरी है उतनी ही उपेक्षा से भी.

इनमे से एक राजेश नोनिया ने कहा, "कोयले का नाम आते ही लाखों करोड़ों रूपए की बात होती है. बड़े-बड़े लोग इससे मुनाफा कमाते हैं. मगर ये कोयला हम निकलते हैं. हमारा क्या है. रोज़ अपनी जान हथेली पर रख कर हम कोयला निकलते हैं. जब घर से निकलते हैं तो यह पता नहीं होता कि जिंदा वापस लौटेंगे भी या नहीं. अगर लौट आए तो ये एक पुनर्जन्म जैसा है. हमारा रोज़ पुनर्जन्म होता है."

खोखले हेलमेट

"कोयले का नाम आते ही लाखों करोड़ों रूपए की बात होती है. बड़े-बड़े लोग इससे मुनाफा कमाते हैं. मगर ये कोयला हम निकलते हैं. हमारा क्या है. रोज़ अपनी जान हथेली पर रख कर हम कोयला निकलते हैं. जब घर से निकलते हैं तो यह पता नहीं होता कि जिंदा वापस लौटेंगे भी या नहीं. अगर लौट आए तो ये एक पुनर्जन्म जैसा है. हमारा रोज़ पुनर्जन्म होता है"

राजेश नोनिया

राजेश नोनिया से मेरी मुलाक़ात हुई लोदना खदान के मुहाने पर. उनके साथ अशोक यादव, राधे पासवान, सुखसेव और इनके कई साथी कोयला मज़दूर थे जो खदान के अंदर जाने के लिए डोली का इंतज़ार कर रहे थे.

तभी उनमे से एक ने मुझे अपना हेलमेट दिखाया जो अंदर से खोखला था. दूसरे मजदूरों ने बताया कि किस तरह वह सर पर लगाने वाली लाइट के बैटरियां हाथों में पकड़ कर ले जाते हैं या फिर उन्हें रस्सी से अपनी कमर में बाँध कर जाते हैं क्योंकि कई सालों से ना उन्हें जूते मिले हैं और ना ही बैटरी लगाने के लिए बेल्ट.

धनबाद कोयलांचल में कोयले की खदानों का हाल सब जगह एक जैसा है. धनसार कोलियरी में बड़ी तादाद में मजदूर जमा थे. पता चला कि यहाँ काम ठप हुआ पड़ा है क्योंकि मजदूरों नें खदान के अंदर जाने से इनकार कर दिया है.

उनकी बहुत सारी मांगें थीं जिनमे सुरक्षित जूतों से लेकर खदान के अंदर सुरक्षा के उपाय शामिल हैं. शोर-शराबा होता रहा और यह सब कुछ काफी देर तक चला.

ज़िंदगी

कोयला मजदूर

कोयला मजदूरों की बस्ती सुविधाविहीन है

कोयले का तो मोल है. वह बाज़ार में बिक कर खूब पैसे हासिल करता है. लेकिन एक कोयला मज़दूर की ज़िंदगी स्याह काल कोठरी से शुरू होती है और उसी में ख़त्म हो जाती है.

घरों और दुकानों में लगे बल्ब ऐसे जल रहे हैं मानो मोमबत्ती जल रही हो. इन कच्ची सड़कों पर चल रहे कोयले से लदे बड़े-बड़े डम्पर और ट्रक धूल उड़ाते हुए फर्राटे भर रहे हैं.

ये यहाँ का खजाना लेकर देश के दूसरे हिस्सों में जा रहे हैं. इस खजाने से कितने ही विद्युत संयंत्र और इस्पात कारखाने चल रहे हैं.

एक दिन अगर इस कोयले का खनन नहीं हुआ तो वे सभी संयंत्र बंद हो जाएँगे या बंदी के कगार पर पहुँच जाएँगे. इन्हें चलाते रहने के लिए कोयला ज़रूरी है.

कोल गेट विवाद के बीच धनबाद का कोयला मजदूर आज भी अपने आप को वहीं खड़ा पाता है, जहां वह कई साल पहले था. आज भी भूमिगत खदानों में सुरक्षा के उपाय कम या नहीं के बराबर हैं. आज भी उसके सर पर छँटनी की तलवार लटक रही है.

छल

मजदूर

मजदूरों को मिलने वाले हेलमेट खोखले हैं

काले हीरे के नाम से जाने जाने वाले कोयले को निकलने में लगे मजदूर बदहाली और उपेक्षा का शिकार हैं बावजूद इसके कि यहाँ ट्रेड यूनियन की आड़ में दशकों तक माफिया गिरी का बोल बाला रहा.

यही वजह है कि इनकी आवाज़ उठाने वाला अब कोई नहीं. इनकी गंदी बस्तियां आज भी मरम्मत की बाट जो रहीं हैं.

भारतीय मजदूर संघ से जुड़े नंदलाल पासवान इस बात को स्वीकार करते हैं कि ट्रेड यूनियनों नें कोयला मजदूरों को छला है. उनका कहना है कि जिस उद्देश्य के साथ सत्तर के दशक में कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण हुआ था वह उल्टा हो गया.

वे कहते हैं, "आज आउटसोर्सिंग के नाम पर फिर यह उद्योग निजी हाथों में जा रहा है. इस आऊट सोर्सिंग में एक बार फिर कोल माफिया हावी हो चुका है. अब औने पौने में मजदूरों से निजी कंपनियाँ खदानों में काम करवा रहीं हैं."

वही जनता मजदूर संघ के नेता नीरज सिंह ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि उनका संगठन कोयलांचल का सबसे पुराना ट्रेड यूनियन है जो मजदूरों की आवाज़ उठाता आ रहा है.

वे कहते हैं कि यूनियनों की उदासीनता ने कोयला मजदूर की ज़िंदगी को और ज़्यादा मुश्किल और जोखिम भरा बना दिया है.

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