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चरमपंथ पर मुसलमानों का नज़रिया

 सोमवार, 10 सितंबर, 2012 को 08:52 IST तक के समाचार
मुंबई हमले

भारत में चरमपंथी हमलों के बाद अल्पसंख्यक समुदाय में डर और दहशत फैल जाती है

कई वर्ष पहले मुंबई में लोकल ट्रेनों में बम हमले के बाद पुलिस ने बड़े पैमाने पर मुसलमानों की गिरफ्तारियां शुरू की थीं. इससे मुस्लिम बस्तियों में डर का माहौल था और हर तरफ बेचैनी फैल गई.

इसके बाद शहर के मुस्लिम उलेमा, महत्वपूर्ण व्यक्तियों और बुद्धिजीवियों का एक सम्मेलन हुआ. इसमें हमले के संदेह में मुसलमानों की अंधाधुंध गिरफ्तारियों पर गहरी चिंता जताई गई.

इस सम्मेलन में भिवंडी के एक नौजवान मजहबी आलम ने बम धमाके में लगभग डेढ़ सौ लोगों की मौत के बाद शहर के संयम और धैर्य की सराहना करते हुए मुसलमानों से कहा था, “मुसलमान अब ये देखें कि कहीं उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक तो नहीं रही है.”

इस घटना के बाद भारत के अलग-अलग शहरों में सैकड़ों बम धमाके हो चुके हैं और इनसे जुड़े मामलों में हजारों नहीं तो कम से कम सैकड़ों मुस्लिम युवाओं को गिरफ्तार किया जा चुका है. इन लोगों के खिलाफ आतंकवाद के आरोपों में मुकदमे चल रहे हैं. आम तौर पर हर धमाके के लिए अकसर किसी न किसी मुस्लिम संगठन पर ही आरोप लगते रहे हैं.

चरमपंथ का कितना है असर

"मुसलमान अब ये देखें कि कहीं उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक तो नहीं रही है."

मजहबी आलम, एक मुस्लिम युवा

इसके विपरीत देश में बहुत कम मुसलमान होंगे जो ये मानने के लिए तैयार हैं कि धमाकों में मुसलमानों का कोई हाथ है. ज्यादातर मुसलमानों का यही ख्याल है कि ‘भारत में मुसलमानों को पस्त करने के लिए सरकार और हिंदूवादी संगठनों की एक साजिश है.’ ऐसी सोच रखने वालों में समाज के सभी वर्गों के लोग शामिल हैं.

पिछले दो हफ्तों में कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश की पुलिस ने एक साझा कार्रवाई में लगभग बीस मुसलमानों को चरमपंथी कार्रवाइयां करने और साजिश रचने के संदेह में गिरफ्तार किया. इनमें से ज्यादातर का संबंध कर्नाटक राज्य से है. हिरासत में लिए गए लोगों में कई एमडी डॉक्टर, डीआरडीओ के इंजीनियर, एमबीए और दूसरे क्षेत्रों से जुड़े पढ़े-लिखे नौजवान शामिल हैं.

मुसलमानों में चरमपंथ

भारत में मुसलमान सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है.

अचानक किसी बम धमाके और तनाव बढ़ाने वाली घटना के बिना इन युवाओं की गिरफ्तारियों ने एक बार फिर मुसलमानों के दिमाग में बेचैनी और अविश्वास पैदा कर दिया है. इससे पहले इसी तरह की गिरफ्तारियां बिहार के कई इलाकों से की गई थीं. 2008 में दिल्ली के बटला हाउस एनकाउंटर के बाद आजमगढ़ में गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू हुआ था.

चरमपंथ को लेकर मुसलमानों का रवैया हमेशा इनकार और खंडन वाला रहा है. इसका एक कारण ये रहा है कि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था होने की वजह से धार्मिक चरमपंथी गुट कभी भारत के मुसलमानों की सामूहिक मानसिक चेतना को प्रभावित नहीं कर पाए हैं.

देश के धार्मिक संगठन और महत्वपूर्ण व्यक्ति आम तौर पर दकयानूसी और पारंपरिक सामाजिक और आर्थिक नजरिए के बावजूद कट्टरपंथी धार्मिकता को बढ़ावा देने से परहेज बरतते रहे हैं. इसलिए मनोवैज्ञानिक तौर पर कोई ये विश्वास नहीं कर पाता है कि आखिर मुसलमान किस तरह इस तरह की बर्बर कार्रवाइयों को अंजाम दे सकते हैं.

जांच एजेंसियों पर सवाल

खुद जांच एजेंसियों का रवैया और तौर तरीके भी मुसलमानों के शक और संदेह को बढ़ावा देते रहे हैं. पुलिस और खुफिया अधिकारियों में पेशेवर क्षमताओं की कमी और असंवेदनशील तौर तरीके के कारण बहुत से बेकसूर नौजवानों की जिंदगियां हमेशा के लिए तबाह हो गई हैं.

मुस्लिम बच्चे

कट्टरपंथी रुझान को दूर करना एक चुनौती है.

कई मामलों में हिंदू संगठन चरपंथी कार्रवाइयों में शामिल रहे हैं. इनमें से कई की गिरफ्तारियों और विस्फोट के मामले हल हो जाने के बावजूद दर्जनों मुसलमान वर्षों से कैद हैं जो भारत की जांच व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हैं.

इन सब बातों के बावजूद भारत के मुसलमान इस हकीकत को नजर अंदाज नहीं कर सकते हैं कि पाकिस्तान से लेकर अफगानिस्तान और इराक तक और चेचन्या से लेकर नाइजीरिया तक मुसलमानों में ऐसे चरमपंथी तत्व पैदा हो रहे हैं जो हर समस्या को सिर्फ अपने नजरिए से देखना चाहते हैं. और उनके पास हर मतभेद का जवाब सिर्फ हिंसा है.

ऐसे ही तत्व भारत के मुसलमानों के दिलो दिमाग पर असर डाल सकते हैं और बहुत संभव है कि बहुत से मुसलमान इसके खतरनाक चालों में आ जाएं.

इस पूरी पृष्ठभूमि में भिवंडी के उस नौजवान मजहबी आलम को बयान शिद्दत से याद आता है, “मुसलमान ये देखें कि कहीं उनके पैरों के नीचे से जमीन तो नहीं खिसक रही है.”

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