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पदोन्नति में आरक्षण पर अलग-अलग सुर

 बुधवार, 5 सितंबर, 2012 को 12:21 IST तक के समाचार

सरकारी नौकरियों में प्रमोशन (पदोन्नति) में आरक्षण दिए जाने के प्रस्ताव को भारतीय कैबिनेट ने मंज़ूर दे दी है. कई राजनीतिक विश्लेषक इसे कोयला घोटाले से ध्यान हटाने की सरकारी कोशिश के रूप में देख रहे हैं.

चूँकि ये मुद्दा सीधे जनाधार और वोट से जुड़ा है इसलिए हर राजनीतिक पार्टी सावधानी बरत रही है.

इस मुद्दे पर उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था, जिसके बाद बहुजन समाज पार्टी ने इसे संसद में उठाकर संविधान संशोधन के जरिए लागू करवाना चाहा. राजेश जोशी डाल रहे हैं एक नजर

राजनीतिक पार्टियों की राय

कांग्रेस – सत्तारूढ़ पार्टी ने अपने सभी राज्यसभा सदस्यों को व्हिप जारी करके आज सदन में मौजूद रहने को कहा है. कोयला खदान आवंटन के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन पिछले दस दिन से संसद नहीं चलने दे रहा है.

अब आरक्षण के मुद्दे पर काँग्रेस उन्हें पशोपेश में डालना चाहती है, क्योंकि अगर भाजपा प्रधानमंत्री के इस्तीफे की माँग को लेकर संसद की कार्यवाही में रुकावट डालेगी तो काँग्रेस के लिए उसे ‘आरक्षण-विरोधी’ और इस तरह दलित-विरोधी करार देने में आसानी होगी.

इस विधेयक के जरिए काँग्रेस खुद को दलितों और आदिवासियों की खैरख्वाह के तौर पर भी स्थापित करना चाहती है.

भारतीय जनता पार्टी

अभी तक पार्टी नेताओं ने बहुत उत्साह से इस मुद्दे पर कुछ नहीं कहा है, बल्कि वो अपनी रणनीति स्पष्ट करने से बचते रहे हैं.

ऐसा लगता है कि इस मामले में बीजेपी किसी जल्दबाजी में नहीं है. मंगलवार को बहुजन समाज पार्टी की मायावती ने बीजेपी की सुषमा स्वराज और अरुण जेतली से मिलकर अपील की थी कि वो उस समय तक सदन चलने दें जब कि आरक्षण विधेयक पारित नहीं हो जाता.

चूँकि भारतीय जनता पार्टी का आधार अगड़ी जातियों में ज्यादा है, जो कि पहले से ही आरक्षण विरोधी हैं, इसलिए बीजेपी का आकलन है कि चुप्पी से उसे कोई खास नुकसान नहीं होने वाला. लेकिन वो प्रकट तौर पर अनुसूचित जातियों के विरोध में खड़ी नहीं दिखना चाहती.

समाजवादी पार्टी

हाल ही में उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल करने वाली पार्टी ने बहुत स्पष्ट तौर पर नौकरियों में आरक्षण तय करने वाले विधेयक का विरोध किया है. लेकिन समाजवादी पार्टी भी ये नहीं कह रही कि उसे अनुसूचित जातियों और जनजातियों को तरक्की में आरक्षण देने पर ऐतराज है.

उसकी माँग है कि ये सुविधा पिछड़े और अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) के कर्मचारियों को भी दी जाए. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा है कि उनकी सरकार सिर्फ सुप्रीम कोर्ट का फैसला मानेगी और उसने राज्य में सामान्य वर्ग के कर्मचारियों की तरक्की की प्रक्रिया शुरू कर दी है.

पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई रामगोपाल यादव ने इस विधेयक को असंवैधानिक बताया है. दरअसल समाजवादी पार्टी इस विधेयक के खिलाफ स्पष्ट रुख लेकर अपने समर्थन का आधार मजबूत कर रही है.

बहुजन समाज पार्टी

दलितों और अनुसूचित जातियों में पार्टी का आधार होने के कारण इस मुद्दे का सबसे ज़्यादा राजनीतिक फायदा बहुजन समाज पार्टी को ही होना है. सुप्रीम कोर्ट में मात खाने के बाद पार्टी नेता मायावती इसे संसद में लाईं. पार्टी के गणित में कोई पेचीदगियाँ नहीं हैं.

उसे मालूम है कि अनुसूचित जाति को फायदा पहुँचाने वाले विधेयक का साफ साफ विरोध करने की हिम्मत किसी पार्टी में नहीं है. चुप्पी का भी नुकसान ही होगा. इसलिए सबसे खुश मायावती हैं.

लोगों की राय

गोपाल जी गोपाल, शोधकर्ता, जेएनयू

सरकार अभी संकट में फँसी हुई है- टू जी घोटाला, कोलगेट..ऐसे में सरकार क्या करेगी. यही सब करेगी ताकि सरकार बची रहे. क्या सरकार सही में इन लोगों का भला चाहती है. सरकार की मंशा में ईमानदारी नहीं है.

अगर पदोन्नति में आरक्षण होता है तो कुछ ही लोगों को प्रमोशन मिलेगा. लेकिन देश के करोड़ों लोगों को इससे क्या फायदा होगा यही मेरा सवाल है. यहाँ मैं ये भी कहना चाहूँगा कि अनुसूचित जाति और जनजातियों में भी बहुत सारे वर्ग है.

मेरा मानना है कि कुछ वर्ग ही आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं जबकि अनुसूचित जाति के बाकी वर्गों को आरक्षण नहीं मिल पा रहा है. मैं ये पूछना चाहता हूँ कि अगर एडमिशन के समय आरक्षण मिल गया है और व्यक्ति अब अच्छी संस्था में पढ़ रहा है तो इसके आगे उसे नौकरी और प्रमोशन में भी आरक्षण मिलना चाहिए?

ये तो बड़ी विडंबना है. कोई आईआईटी, जएनयू में पढ़ चुका है और फिर भी इसे आरक्षण चाहिए तो ये बड़ा हास्यास्पद है.

गंगा सहाय मीणा, सहायक प्रोफेसर, जेएनयू

पद उन्नति में आरक्षण का सरकार का फैसला बहुत ही सही है जो बहुत पहले ही आ जाना चाहिए था.

भारतीय संविधान की मूल भावना है कि सब तबकों को उचित प्रतिनिधित्व मिले और सरकार का फैसला इसी के अनुरुप है. आज भी उच्च पदों पर अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों का उचित प्रतिनिधित्व नहीं है.

नौकरियों में बड़े अधिकारी उच्च जातियों के होते हैं और वे एससी-एसटी कर्मचारियों का सर्विस रिकॉर्ड खराब कर देते हैं जिस वजह से उन्हें प्रमोशन नहीं मिल पाता.

निजी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था ही नहीं है. निजी क्षेत्र में एससी-एसटी का प्रतिनिधित्व एक या दो फीसदी भी नहीं हो पा रहा है. ये बात सही है कि कुछ वर्ग आरक्षण का ज्यादा फायदा उठा रहे हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि आरक्षण की व्यवस्था ही गलत है. आरक्षण लागू करने के ढंग में जरूर कमी हो सकती है.

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