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'कोलगेट' की तह में छिपे सवालों के जवाब

 मंगलवार, 4 सितंबर, 2012 को 07:49 IST तक के समाचार
कोयला आवंटन

कोयला आवंटन में गड़बड़ी के आरोपों से सरकार की छवि को नुकसान हुआ है.

कोयला आवंटन इस समय भारत की राजनीति का सबसे चर्चित मुद्दा है जिसके कारण संसद का मॉनसून सत्र हंगामे की भेंट चढ़ रहा है.

कोयला ब्लॉकों के आवंटन पर सीएजी की रिपोर्ट आने के बाद सरकार कथित तौर पर अब तक के सबसे बड़े घोटाले के आरोपों से घिर गई है.

इस मुद्दे से जुड़े आपके हर सवाल का जवाब दे रहे हैं आलम श्रीनिवास.

कोयले के ब्लॉक किसे कहते हैं और ये भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कैसे अहम है?

दुनिया भर में कोयला, तेल, प्राकृतिक गैस और अन्य खनिज और धातु जमीन के नीचे प्राकृतिक संसधानों के रूप में पाई जाती हैं.

भारत में ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे पूर्वी राज्यों के अलावा मध्य और दक्षिण भारत में कोयला प्रचूर मात्रा में पाया जाता है.

कोयला वाले इलाके को ब्लॉकों में विभाजित किया जाता है जिसके बाद उन्हें खनन करने वालों को लीज़ यानी किराए पर दिया जाता है.

कोयले से भारत में ऊर्जा की आधी से अधिक वाणिज्यिक ज़रूरतें पूरी होती हैं. इसलिए बिजली, स्टील और सीमेंट जैसे व्यवसायों में इसकी मांग बहुत अधिक है.

सरकार ने वर्ष 2006 से 2009 के बीच, वर्ष 1993 से 2005 के बीच की तुलना में दोगुने कोयला ब्लॉक क्यों आवंटित किए?

वर्ष 1973 में भारत सरकार ने कोयले के खनन को अपने हाथों में ले लिया था. सरकारी कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड दुनिया की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक है और भारत में कोयला बेचने की एकमात्र एजेंसी भी है.

लेकिन वर्ष 1976 में लोहे और इस्पात के निजी उत्पादकों को अपने आंतरिक इस्तेमाल के लिए कोयले की खदान दी जाने लगीं. ऐसी खदानों को ‘कैप्टिव खदान’ कहते हैं. और इनका इस्तेमाल सिर्फ़ उन्हीं कारखानों के लिए किया जा सकता है जिनके लिए इन्हें आवंटित किया गया हो.

कोयला आवंटन

भारत के लिए कोयला ऊर्जा की जरूरत को पूरा करने का महत्वपूर्ण माध्यम है.

इस श्रेणी में वर्ष 1993 में बिजली और अन्य व्यवसायों से जुड़ी कंपनियों को भी शामिल कर लिया गया.

क्या हमें मालूम है कि 1993 से लेकर 2005 तक कितनी ‘कैप्टिव खदान’ आवंटित की गईं?

वर्ष 1993 से 2005 के बीच निजी कंपनियों को 41 कैप्टिव खदान आवंटित की गई. इसी अवधि में सरकारी कंपनियों को 29 कोयला खदानें दी गईं.

2003 में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने 2012 तक सभी को बिजली देने की मिशन की घोषणा की. इसके लिए एक लाख मैगावॉट अतिरिक्त बिजली के उत्पादन का लक्ष्य रखा गया.

लेकिन जब 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता में आया तो उसे लगा कि कोल इंडिया इतने बड़े पैमाने पर कोयले का उत्पादन नहीं कर पाएगी.

योजना आयोग ने अनुमान लगाया कि कोयले की भारी कमी होगी जिसे आयात के ज़रिए पूरा करना होगा.

इसलिए सरकार ने निजी और सरकारी कंपनियों को अधिक कैप्टिव खदान आवंटित करने का निर्णय लिया.

साल 2006 से 2009 के बीच निजी कंपनियों को 75 और सरकारी कंपनियों को 70 कोयला ब्लॉक आवंटित किए गए.

साल 2006 से 2009 के बीच खदान आवंटन की नीति में क्या ख़ामियां थीं?

ये आवंटन कोयला मंत्रालय ने किए जो इस दौरान प्रधानमंत्री के पास था. मंत्रालय ने इन आवंटनों के लिए एक स्क्रीनिंग कमेटी बनाई थी.

ये समिति 1992 में बनाई गई थी और इसमें तीन बार – 2005, 2006 और 2008 में बदलाव किए गए.

श्री प्रकाश जायसवाल

कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल सरकार का बचाव करते हैं.

लेकिन बाद में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक यानी सीएजी ने कहा कि कोयले के ब्लॉकों को लीज़ पर दिए जाने में जिन दिशा-निर्देशों का पालन किया गया वो पारदर्शी नहीं थे.

वर्ष 2004 में सरकार ने पहले कैप्टिव खदानों की नीलामी का सुझाव दिया.

इसमें तर्क ये था कि जिसे भी कैप्टिव खदान मिलेगी उसकी तो चांदी हो जाएगी क्योंकि कोल इंडिया से खरीदने या आयात करने की तुलना में अपनी खदान से कोयला काफ़ी सस्ता पड़ेगा.

मतलब ये कि जिसे भी कैप्टिव खदान मिलती, उसे बाज़ार से सीधे कोयला ख़रीदने वाली कंपनी से सस्ता कोयला मिलता.

लेकिन आने वाले वर्षों में नीलामी की ये योजना खटाई में पड़ती गई क्योंकि बिजली कंपनियों को इससे कोयले की कीमत बढ़ने का डर सताने लगा.

अक्तूबर 2008 में संसद में कोयले के ब्लॉकों की नीलामी पर एक नया विधेयक पेश किया गया जो सितंबर 2010 में कानून बन गया.

"कोयले के ब्लॉक आबंटित करने में कई स्तरों पर पारदर्शिता लाने की प्रक्रिया में कई जगह पर देर हुई. इससे निजी कंपनियों को 1,85591 करोड़ रुपयों का वित्तीय लाभ हुआ."

सीएजी

साल 2012 में सीएजी ने कहा, “कोयले के ब्लॉक आवंटित करने में कई स्तरों पर पारदर्शिता लाने की प्रक्रिया में कई जगह पर देर हुई. इससे निजी कंपनियों को 1,85591 करोड़ रुपयों का वित्तीय लाभ हुआ.”

अपने बचाव में सरकार कहती है कि गठबंधन सरकार में नीतिगत फ़ैसले लेने में कई साल लग जाते हैं जैसे कि खुदरा क्षेत्र में सीधे विदेशी निवेश का मामला.

सरकार का ये भी तर्क है कि विपक्षी भारतीय जनता पार्टी जिन राज्यों में सत्ता मे है, वहां की सरकारों ने भी नीलामी का विरोध किया था.

क्या कोयला ब्लॉक आवंटन पर सरकार की पहले की प्रक्रिया अपारदर्शी थी?

सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, “स्क्रीनिंग कमेटी ने पारदर्शी तरीका नहीं अपनाया.”

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बात का कहीं भी ज़िक्र नहीं है कि ब्लॉक के लिए आए आवेदनों का मूल्यांकन कैसे किया गया और किस तरह इन्हें सरकार ने मंजूर किया.

एक उदाहरण देते हुए सीएजी ने रिपोर्ट में लिखा कि एक ब्लॉक के लिए 108 आवेदन आए. ये सभी लोग स्क्रीनिंग कमेटी के सामने अपने दावे पेश करना चाहते थे. लेकिन कमेटी ने सिर्फ़ छह आवेदनों की ही अनुशंसा की.

कोयला आवंटन

भाजपा शासित राज्यों में भी कोयला आवंटन में गड़बड़ियों के आरोप लग रहे हैं.

ऐसी भी ख़बरें हैं कि मंत्रियों और कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने निजी कंपनियों के लिए पैरवी की. कुछ निजी कंपनियों को ऐसे ब्लॉक भी मिले जहां पर कोयले के भंडार उनकी कैप्टिव मांग से कहीं अधिक थे. कई निजी कंपनियों ने कोयले को ग़ैर-क़ानूनी रूप से खुले बाज़ार में भी बेचा.

सबसे अहम बात ये है कि सीएजी के अनुसार कोयले के ब्लॉकों को आवंटित करने के पीछे 2012 तक सभी को बिजली देने का लक्ष्य था और उसे पूरा नहीं किया गया. बहुत-सी कंपनियां तो सिर्फ़ ब्लॉक लेने के बाद हाथ पर हाथ धर कर बैठी रहीं.

जिन 86 कोयला ब्लॉकों को साल 2010-11 तक उत्पादन शुरू करना था, उनमें से सिर्फ़ 28 ने ही 31 मार्च 2011 तक ऐसा किया.

मौजूदा कोयला मंत्री कहते हैं कि ज़रूरी नहीं है कि खनन में देरी जानबूझकर की गई हो. हो सकता है कि खनन के लिए ली जाने वाली सरकारी अनुमतियों में देरी की वजह से भी उत्पादन शुरू ना हुआ हो.

फ़रवरी 2012 में सरकार ने सीएजी को बताया था कि कोयले के ब्लॉक को उत्पादन स्तर तक पहुंचने में तीन से सात वर्ष का समय लग सकता है.

क्या नीलामी ही कोयले के ब्लॉक के आवंटन का सही तरीका है?

ये बहस बेमानी है क्योंकि सरकार ने साल 2010 में नीलामी का फ़ैसला कर लिया था. सुप्रीम कोर्ट ने 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में अपने फ़ैसले में नीलामी के फ़ायदों का ज़िक्र किया था.

लेकिन नीलामी से उपभोक्ता को अधिक दाम देने पड़ सकते हैं. इस तरह से सरकार को तो आमदनी हो जाएगी लेकिन उपभोक्ता के हित प्रभावित होंगे. प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी में सभी की लिफ़ाफ़ाबंद बोलियां सबकी उपस्थिती में खोली जाती हैं. लेकिन इस प्रक्रिया में भी छेड़छाड़ की संभावनाएं हैं.

इसलिए ज़रूरत पारदर्शी प्रक्रिया की है जिसके बारे में सभी को मालूम हो और जिसमें जारी प्रक्रिया के बीच में कोई परिवर्तन ना आए. सबसे अहम ये है कि नीति और प्रक्रिया के बारे में सारी जानकारी सार्वजनिक हो और उस पर रहस्य का कोई पर्दा ना रहे.

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