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'कलावती' के साथ-साथ सहारा पर सुप्रीम कोर्ट के सवाल

 सोमवार, 3 सितंबर, 2012 को 17:01 IST तक के समाचार
सहारा

चाहे वो क्रिकेट, हॉकी या रेसिंग, सहारा की उपस्थिति हर जगह है

एक छोटी कस्बाई चिटफंड संस्था से कुछ ही समय में खरबों रुपए की कॉरपोरेट कंपनी बन जाने वाली सहारा इंडिया के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मुश्किलें खड़ी हो गई हैं.

इस मामले में शेयर बाजार की नियामक संस्था सेबी की तारीफ तो हो रही है, लेकिन उसकी कथित देरी से की गई कार्रवाई पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने सहारा को निवेशकों के 24,000 करोड़ रुपए वापस करने का आदेश दिया है और बेहद तीखी भाषा में इस कंपनी के काम काज पर सवाल उठाए हैं.

क्या है मामला

  • सहारा पर आरोप कि उसने सेबी के नियमों का उल्लंघन करते हुए लोगों से धन इकट्ठा किया.
  • कंपनी ने ओएफसीडी यानी ऑप्शनली फुली कन्वर्टिबल डिबेंचर्स
    के माध्यम से करोड़ो रुपए जमा किए.
  • सहारा ने कहा स्कीम
    कंपनी से जुड़े लोगों के लिए, एक निजी मामला, सेबी से कोई लेना-देना नहीं.
  • सेबी: कंपनियों के कई निवेशक फर्जी हैं.
  • सहारा का आरोपों से इंकार.

इस फैसले की हर जगह तारीफ हो रही है, लेकिन अब कई कठिन सवालों के जवाब सेबी को भी देने पड़ेंगे क्योंकि किसी भी आर्थिक गड़बड़ी पर नजर रखने की जिम्मेदारी सेबी की होती है और अगर वो ये काम मुस्तैदी से नहीं कर पाती तो सवाल उठने लाजमी हैं.

'लाखों एजेंट सक्रिय, सरकार सो रही थी?'

सवाल ये कि जब गाँव-गाँव, कस्बे-कस्बे में सहारा इंडिया के लाखों एजेंट जब कंपनी के लिए धन इकट्ठा कर रहे थे, तब सेबी क्या कर रही थी?

कोलकता स्थित लेखक और चार्टर्ड अकाउंटेंट विनोद कोठारी कहते हैं, “जब लोगों से 20,000 करोड़ इकट्ठा किए जा रहे थे तो प्रशासन क्यों सो रहा था? ये बात तो साफ है कि ये धन एक रात में इकट्ठा नहीं किए गए. अगर इस काम के लिए कंपनी ने करीब 10 लाख एजेंटों का इस्तेमाल किया तो ऐसा नहीं हो सकता कि सरकार को इसके बारे में पता नहीं हो?”

उनका कहना है कि ये मामला सिर्फ सहारा से जुड़ा नहीं है बल्कि ऐसी हज़ारों कंपनियाँ हैं जिन्होंने बाजार से किसी ना किसी कारण लोगों से धन लिया लेकिन सेबी ने उन पर कोई कदम नहीं उठाया.

वो एक दूसरी समस्या की ओर इशारा करते है: “हमारे प्रशासन में एक और गड़बड़ी ये है कि ये पता नहीं कि गलती करने वाले पर कार्रवाई कौन करेगा? क्या उस पर रजिस्ट्रार ऑफ़ कंपनीज कार्रवाई करेगा, या फिर पुलिस या सेबी?”

उधर सहारा ने अपना पक्ष सामने रखने के लिए अखबारों में विज्ञापन दिए हैं और दावा किया है उसने पहले भी निवेशकों का पैसा लौटाया है और इस बार भी उसे ऐसा करने में दिक्कत नहीं आएगी.

लेकिन अभी ये साफ नहीं है कि कंपनी अगले तीन महीने में इतनी बड़ी रकम कैसे लौटाएगी.

ये भी कहा जा रहा है कि कंपनी अदालत में पुनर्विचार याचिका भी दाखिल कर सकती है.

जब बीबीसी ने सेबी के पूर्व प्रमुख सीबी भावे से संपर्क किया तो उन्होंने बहुत कुछ कहने से तो मना कर दिया, लेकिन वो कहते हैं कि शुरुआत से ही सहारा ने जानकारी देने में कथित तौर पर आनाकानी बरती.

भावे 2008 से 2011 तक सेबी प्रमुख थे.

वो कहते हैं कि सहारा की कंपनियाँ कभी सेबी के पास नहीं आईं, इसलिए सेबी को पता ही नहीं चला कि सहारा की कंपनियों ने इतना धन इकट्ठा कर लिया है.

भावे के मुताबिक उनके दौर में भी जब अधिकारियो को पता चला कि सहारा धन इकट्ठा कर रही है तब भी उन्होंने जानकारी इकट्ठा करने की कोशिश की थी लेकिन सहारा की ओर से कथित तौर पर जानकारी देने से मना कर दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट के सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कई सवाल उठाए हैं, और उनमें से एक सवाल निवेशकों की विश्वसनीयता को लेकर भी है.

अदालत ने कहा कि सहारा इंडिया रिएल इस्टेट कॉर्पोरेशन की ओर से दिए गए भारी भरकम दस्तावेजों के पहले पन्ने से आगे जाना लिए भी उनके लिए मुश्किल हो गया.

सुप्रीम कोर्ट ने कलावती नाम की एक निवेशक का जिक्र किया है जिसका नाम निवेशकों की सूची में है.

कलावती का सीरियल नंबर है 6603675, और कागजों के मुताबिक वो ‘उछारा, एसके नगर’ की रहने वाली है. कंपनी से उनका परिचय करवाने वाले का नाम ‘हरिद्वार’ है और वो बानी रोड कबीर नगर का रहने वाले हैं.

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक ये पता करना असंभव है कि कलावती को किस आधार पर सहारा की इस स्कीम से जोड़ा गया.

अदालत ने कहा, “कलावती बेहद सामान्य सा नाम है, और निवेशक के दिए गए पते पर एक से ज्यादा कलावती हो सकती हैं. ना ही उनके माता-पिता का नाम है ना ही पति का नाम कागजों में दिया गया है.”

अदालत ने आगे कहा, “भारतीय मूल के किसी व्यक्ति का नाम हरिद्वार हो, ये समझ के बाहर है. भारत में शहरों के नाम किसी व्यक्ति के नाम पर कभी भी आधारित नहीं हुए हैं. किसी भी व्यक्ति का नाम इलाहाबाद, आगरा, बैंगलोर, चेन्नई, तिरुपति नहीं होगा.”

अदालत ने कहा, “इस एकमात्र प्रस्तुति के आंकलन से ऐसा प्रतीत होता है कि ये पूरी तरह बनावटी है, और ये भी हो सकता है कि नकली और झूठा हो.”

अदालत ने आगे कहा कि ऐसा लगता है कि दोनो कंपनियों ने निवेषकों से धन तो जमा किया हो लेकिन उन्होंने धन के रेकॉर्ड्स को ध्यान से रखने में गैर-जिम्मेदाराना रवैया दिखाया.

अदालत का कहना था, “ये पूरा विवाद 40,000 करोड़ का है जिसमें भारत के गरीब इलाकों में रहने वाले लोगों से पैसा इकट्ठा किया गया.”

गौरतलब है कि भारत सरकार की ओर से ऐडिशनल सॉलिसिटर जनरल हरीन पी रावल ने सेबी के पक्ष का समर्थन किया.

अदालत ने सहारा इंडिया रिएल इस्टेट कॉर्पोरेशन से कहा कि उसने तीन करोड़ निवेशकों से संपर्क किया जिनमें से करीब सवा दो करोड़ लोगों ने ओएफसीडी के माध्यम से 20,000 रुपए जमा किए.

कंपनी ने इसके लिए अपने करीब 2900 शाखाओं औऱ सर्विस सेंटरों का इस्तेमाल किया.

अदालत ने सहारा के स्टॉक एक्सचेंज की सूची में शामिल नहीं होने पर भी सवाल उठाए हैं, खासकर जिस तरह से कंपनी ने लाखों लोगों से धन इकट्ठा किए हैं.

गौरतलब है कि सेबी का कहना रहा है कि सहारा की दोनो कंपनियों ने अपने काम काज में पारदर्शिता नहीं बरती है, और उन्हें ये नहीं बता रही है कि उन्हें अपने स्कीम के लिए कितनी प्रार्थना पत्र मिले और आवेदन करने वाले कौन हैं.

सहारा का जवाब

उधर सहारा ने कई अखबारों में पूरे पन्ने का अपना जवाब छापा है. अपने जवाब में सहारा ने निवेशकों से कहा है कि उन्हें घबराने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि सहारा ने हमेशा उनके धन की रक्षा की है.

सहारा ने कहा है कि पिछले 33 सालों में किसी ने भी पैसा वापस किए जाने पर कोई शिकायत नहीं की है कि कंपनी ने करीब 12 करोड़ निवशकों को 1,40,000 करोड़ दिए हैं.

सहारा कहता है, "लोगो को सहारा का तेजी़ से विकास बरदाश्त नहीं है. सहारा की तारीफ करने के बजाए अधिकारियों ने बार-बार हमारी आलोचना की है."

सहारा ने कहा कि उसके पास कोई भी बेनामी धन नहीं है और वो किसी भी अधिकारी को ये चुनौती देता है कि वो ऐसा साबित करके दिखाए.

सहारा के मुताबिक लोग एअरकंडीशन्ड कमरों में बैठकर अपनी सोच बना रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं.

कंपनी का कहना है कि अधिकारियों ने उसके मामले को गलत ढंग से पेश किया है.

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