BBC navigation

अब किताब में आलोचना से 'भड़कीं' ममता

 मंगलवार, 4 सितंबर, 2012 को 01:01 IST तक के समाचार
ममता पर किताब

इस किताब के आखिरी 10 अध्यायों में ममता सरकार की नीतियों की आलोचना की गई है.

कोलकाता के एक जाने माने प्रकाशक ने आरोप लगाया है कि उनकी एक किताब के कारण पुलिस उनका उत्पीड़न कर रही है. इस किताब में मुसलमानों के बारे में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की नीतियों की आलोचना की गई है.

इस किताब का नाम है ‘मुसलमानों को क्या करना चाहिए’ और इसके लेखक हैं डॉ. नजरुल इस्लाम जो वरिष्ठ पुलिस अफसर हैं और अभी सेवा में हैं. नजरुल इस्लाम को उनकी ईमानदारी के लिए जाना जाता है.

वो अभी अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक हैं और प्रशिक्षण के प्रभारी हैं.

मित्रा एंड घोष कोलकाता के सबसे प्रतिष्ठित प्रकाशकों में से एक हैं. इसी प्रकाशन ने ये किताब छापी है. प्रकाशन कंपनी की तरफ से इंद्राणी रॉय ने बीबीसी को बताया कि उनके पिता और कंपनी के मालिक सबीतेंद्रनाथ रॉय को रात 11 बजे पुलिस की तरफ से फोन आया और उनसे तुरंत किताब की एक प्रति मुहैया कराने को कहा गया.

पुलिस की धमकी

इंद्राणी कहती हैं, “अफसर ने ये भी आग्रह किया कि इस किताब की कोई भी प्रति न बेची जाए और बाजार में आई इसकी प्रतियों को वापस लिया जाए.”

"पुलिस की एक टीम ने हमारे दफ्तर और दुकान पर छापा मारा और दो घंटों से ज्यादा समय तक तलाशी होती रही. उन्होंने इसका कोई कारण नहीं बताया और उनके पास कोई तलाशी का वारंट भी नहीं था. उन्होंने हमारे स्टाफ को धमकी भी दी"

इंद्राणी रॉय, मित्रा एंड घोष प्रकाशन

वो आगे बताती हैं, “अगले दिन पुलिस की एक टीम ने हमारे दफ्तर और दुकान पर छापा मारा और दो घंटों से ज्यादा समय तक तलाशी होती रही. उन्होंने इसका कोई कारण नहीं बताया और उनके पास कोई तलाशी का वारंट भी नहीं था. उन्होंने हमारे स्टाफ को धमकी भी दी.”

किताब की कुछ प्रतियां लेने के बाद ही पुलिसकर्मी वहां से गए.

हालांकि किताब की ब्रिकी जारी है और सरकार ने भी इसे आधिकारिक तौर पर प्रतिबंधित नहीं किया है.

डॉ. नजरुल इस्लाम ने इस मुद्दे पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया है क्योंकि अभी वो सेवा में हैं. प्रकाशक का कहना है कि पुलिस ने सत्ताधारी पार्टी के इशारे पर ये कार्रवाई की है क्योंकि लेखक ने अपनी किताब में मुसलमानों के बारे में ममता बनर्जी की नीतियों की आलोचना की है.

'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला'

लेखकों और मानवाधिकार संगठनों ने पुलिस की कार्रवाई की आलोचना की है.

सुनील गांगुली

सुविख्यात बांग्ला लेखक सुनील गांगुली का कहना है कि पश्चिम बंगाल में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ.

बांग्ला के सर्वोत्तम लेखकों में से एक सुनील गांगुली ने बीबीसी को बताया, “ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है. ऐसा पहले इस राज्य में कभी नहीं हुआ कि एक किताब प्रकाशित करने के लिए किसी को प्रताड़ित किया गया हो. नजरुल इस्लाम बहुत अच्छे लेखक और एक ईमानदार पुलिस अफसर हैं. यही वजह है कि राजनेता कभी उनसे खुश नहीं रहते हैं.”

लेकिन सरकार का कहना है कि उन्हें लगता है कि नजरुल इस्लाम की किताब सांप्रदायिक तनाव और हिंदू व मुसलमानों के बीच नफरत फैला सकती है.

सरकार के सूत्रों का कहना है कि वे "सांप्रदायिक सौहार्द्र को बिगाड़ने वाली किसी कोशिश को बर्दाश्त नहीं करेंगे. अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब सांप्रदायिक सौहार्द्र को बिगाड़ना है तो ये सही नहीं है."

मुसलमानों की हालत

किताब के परिचय में नजरुल इस्लाम ने लिखा है, “पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की स्थिति चिंताजनक है. चाहे शिक्षा हो या फिर सरकारी नौकरियां, हम बहुत पीछे हैं. राजनेता हमारे विकास की खातिर रातों को जाग रहे हैं! हाल में एक नई पार्टी सत्ता में आई है, लेकिन मुसलमानों की स्थिति नहीं बदली है. क्या किया जाए?”

अपनी 40 अध्यायों वाली इस किताब में नजरुल ने राजनीतिक नेतृत्व का विश्लेषण करने की कोशिश की है- जिनमें ज्यादातर नेताओं का संबंध हिंदू समुदाय से है जो चुनाव जीतने के लिए मुस्लिम वोट बैंक का इस्तेमाल करते हैं लेकिन उनके विकास के लिए कुछ नहीं किया जाता है.

किताब के आखिरी 10 अध्यायों में ममता बनर्जी सरकार की आलोचना की गई है.

'तुनकमिजाज' ममता

ममता बनर्जी

ममता बनर्जी पर आरोप लगते रहे हैं कि उन्हें अपनी आलोचना बिल्कुल बर्दाश्त नहीं है.

ये पहला मौका नहीं है जब ममता बनर्जी पर अपने आलोचकों का मुंह बंद कराने के आरोप लग रहे हैं.

हाल ही में एक किसान को ममता बनर्जी से सवाल पूछने के लिए 14 दिन जेल में रहना पड़ा था. बनर्जी ने इस किसान को तुरंत माओवादी करार दे दिया और पुलिस को उन्हें गिरफ्तार करने का आदेश दिया.

बाद में पुलिस को माओवादियों से उनके कोई रिश्ते नहीं मिले तो उन्हें रिहा कर दिया गया.

इससे पहले एक राष्ट्रीय टीवी पर जब कुछ छात्राओं ने मुख्यमंत्री से सवाल पूछा तो वो बीच में ही शो छोड़ कर चली गईं. उन्होंने इन छात्रों को भी माओवादी करार दिया और पुलिस ने उनकी पृष्ठभूमि की छानबीन भी की.

इससे पहले एक यूनिवर्सिटी के अध्यापक अंबिका महापात्रा को ममता बनर्जी के कार्टून वितरित करने के लिए गिरफ्तार किया गया था.

इससे जुड़ी और सामग्रियाँ

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.