ठप पड़ी संसद: सब कुछ पहले जैसा ही

 शनिवार, 25 अगस्त, 2012 को 13:40 IST तक के समाचार

पिछले एक साल में संसद में कितनी बार हंगामा हुआ है उसकी गिनती करना भी अब मुश्किल है

भारतीय संसद में आजकल जो कुछ भी हो रहा है उसे देखकर ऐसा लगता है मानों ऐसा पहले भी कभी हमारी आँखों के सामने घट चुका है. इस अहसास को अंग्रेज़ी में डेज़ा वू कहते हैं यानी पुर्वानुभव.

पिछले साल संसद की कार्यवाही 73 दिन चली जो कि 800 घंटे के बराबर है.

स्वतंत्र रिसर्च कंपनी पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक इन 800 घंटों में से 30 प्रतिशत समय हंगामे की बलि चढ़ गया.

कुल 54 विधेयकों को कानून में परिवर्तित करने की योजना थी, जिनमें से केवल 28 पारित किए गए.

जब संसद की कार्यवाही खत्म हुई, तब 97 विधेयक लंबित थे.

लेकिन इस साल स्थिति में बदलाव आया और उम्मीद की एक किरण दिखाई दी.

पीआरएस के मुताबिक पिछले साल के सत्रों के मुकाबले इस साल के बजट सत्र (मार्च से मई) में करीब 90 प्रतिशत समय उपयोगी साबित हुआ.

12 विधेयक पारित किए गए और 17 नए विधेयक संसद में पेश किए गए. सत्र के अंत में 100 से ज़्यादा विधेयक लंबित थे.

काला साया

विश्लेषकों के मुताबिक संसद की बैठकों के दिन पहले की तुलना में घट गए हैं

और फिर अचानक बीते साल का काला साया संसद पर मंडराता हुआ नज़र आ रहा है.

वर्तमान मानसून सत्र में 20 दिनों की कार्यवाही हो चुकी है, लेकिन मुख्य विपक्षी दल भाजपा के हंगामे की वजह से एक बार फिर पिछले साल की यादें ताज़ा हो गई हैं.

कोयला घोटाले के सामने आने के बाद प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष ने संसद की कार्यवाही ठप कर दी है.

मीडिया में इस खबर पर रिपोर्ट करते हुए कुछ अखबारों ने ये भी लिखा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस विवाद पर बयान देना चाहा, लेकिन भाजपा ने वो भी सुनने से मना कर दिया क्योंकि उन्हें सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री का इस्तीफे चाहिए था.

भाजपा इस मुद्दे पर चर्चा तक के लिए तैयार नहीं है. पार्टी को हंगामा मंज़ूर है लेकिन बातचीत नहीं.

अब ये देखते हैं कि संसद की कार्यवाही भंग होने से भारत को किस तरह का नुकसान हो रहा है.

अहम विधेयक अधर में

कांग्रेस का विपक्षी दलों पर आरोप है कि वे जान-बूझ पर संसद की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ने देना चाहते

वर्तमान मानसून सत्र में करीब 29 विधेयक पेश किए जाने थे जिन्हें पारित कर कानून बनाया जाना था.

इनमें कुछ अहम विधेयक थे – जैसे कि भ्रष्टाचार-विरोधी कानून, कार्यालयों में महिलाओं के साथ यौन दुर्व्यवहार से लड़ने वाला कानून, व्हिसल ब्लोअर यानि किसी गलत काम के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों को सुरक्षा प्रदान करने वाला कानून, उच्च शिक्षा प्रणाली को दुरुस्त करने वाला कानून वगैरह वगैरह.

लेकिन वर्तमान हालात को देखते हुए ऐसा लगता नहीं है कि इन विधेयकों पर बहस भी हो पाएगी, इनका पारित होना तो दूर की बात है.

भारत में एक ओर ऐसी सरकार जो कि महत्वपूर्ण मामलों पर कड़े फैसले नहीं ले पा रही है और दूसरी ओर ऐसा विपक्षी दल जो कि अपने झगड़ालू रवैये से बाज़ नहीं आ रहा है.

इन विधेयकों के लिए एक तरफ कुआं है तो दूसरी ओर खाई. इससे अहसास होता है कि भारतीय लोकतंत्र खतरे में है.

लोकतंत्र को खतरा

भारतीय संसद के इतिहास में कई उतार-चढ़ाव आए हैं.

पहले 13 संसद के सत्रों में करीब 3,200 विधेयक पारित किए गए लेकिन 1990 में नियामक मशीनरी पर ब्रेक सा लग गया औऱ राजनीतिक अस्थिरता बढ़ने लगी.

अखबारों के संपादकीय लेखों में विश्लेषक देवेश कपूर और प्रतापभानु मेहता ने लिखा कि संसद में जारी विभाजन की वजह से भारत कई क्षेत्रों में पिछड़ रहा है.

उनका ये भी मानना है कि 1950 से लेकर अब तक संसद सत्रों की बैठकों की संख्या में एक-तिहाई गिरावट आई है, जिसका मतलब ये है कि भारत के सांसद अपने काम को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं.

विपक्ष का सरकार से कड़े सवाल करना एक स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है लेकिन संसद को इस तरह से निरर्थक बना देना कहां की समझदारी है?

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